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कौन भगवान दादा?

 वीर विनोद छाबड़ा

आज  भगवान दादा की पुण्य तिथि है। कौन भगवान दादा? वही जिसका विकट जीवन का संघर्ष। उसमें उठे तरह-तरह के उफान। सिफर से शिखर और फिर सिफर पर लौट कर औंधे मुंह गिरना। एक जीवंत और रोंगटे खड़े करने वाली कहानी। मनीबैक गारंटी है इस पर बनी फिल्म सुपर-डुपर हिट होगी। 
भगवान ने अपने अच्छे दिनों में खराब दिनों को इन शब्दों में याद किया- फारेस रोड से लैमिंग्टन रोड तक का सफर यों तो महज़ पंद्रह-बीस मिनट का है, मगर यह फासला तय करने में मेरे बारह साल खर्च हुए। पिता कपड़ा मिल में मामूली मजदूर। मगर बेटे भगवान ने चाल में रह कर महलों के ख्वाब देखने का गुनाह किया। मोटा थुलथुल जिस्म, चौड़ा चौखटा और ऊपर से छोटा कद। ये देख चाल को वालों को हंसी आती- पहलवान दिखते हो एक्टर नहीं। 
शौक और जुनून क्या कुछ नहीं कराता। छोटे-छोटे स्टंट और मजाकिया रोल करके कुछ धन जमा किया। कुछ उधार लिया। फिर चेंबूर में एक छोटा-मोटा जागृति स्टूडियो लिया किराये पर। कुल ६५००० रुपये मात्र की लागत से फिल्म बनाई- बहादुर किसान। स्पाट ब्याय से लेकर प्रोड्यूसर-डायरेक्टर का काम खुद किया। १९३८ से लेकर १९५१ तक ६५ ऐसी ही लो बजट फिल्में बनायीं। स्टंट व एक्शन- थोड़ा सा कॉमेडी का तड़का। चाल और झुग्गी-झोंपड़ियों में रहने वाले कामगारों-मजदूरों के मध्य खासी लोकप्रिय। इसमें तमिल की ‘वानी माहिनी’(१९४१) भी शामिल। नायक-नायिका तमिल के मशहूर एम०आर० राधा और श्रीलंकाई थावामनी देवी। एक सफल और लेंडमार्क फिल्म। लेकिन अफसोस वक़्त की मार इन सभी ६५ फिल्मों को खत्म कर गयी। इस दौर के भगवान दादा सिर्फ़ किस्सों में जिंदा हैं। 
भगवान दादा का फिल्मों के प्रति समर्पण और जुनून देख राज कपूर ने सोशल फिल्में बनाने का मश्विरा दिया। फिल्म क्या बनी एक इतिहास ही रच डाला। सुपर-डुपर हिट। गीताबाली के साथ भगवान खुद नायक। दिल के भोले और देखन में प्यारेलाल। फिल्म थी- अलबेला(१९५१)। राजेंद्र कृष्ण के गीत और चितलकर रामचंद्र की धुनों पर थिरकते भगवान दादा- शोला जो भड़के दिल मेरा धड़के....और ओ भोली सूरत, दिल के खोटे, नाम बड़े और दर्शन छोटे... आज भी इतिहास के सफे फाड़ कर जब-तब बाहर आकर गूंजते हैं। 
इन्हीं गानों में भगवान दादा का 'स्लोमोशन स्टेप-डांस' बहुत मक़बूल हुआ। इधर परदे पर भगवान दादा नाचते और उधर थिएटर में दर्शक। पहली फिल्म, जिसमें दर्शक थिएटर में नाचे थे। इसी 'स्लोमोशन स्टेप-डांस' को बाद में अभिताम बच्चन, मिथुन चक्रवर्ती और गोविंदा ने परिमार्जित किया। अभिनय सम्राट दिलीप कुमार भी भगवान दादा स्टाइल में ठुमके लगाने से पीछे नहीं रहे। दर्शक ओरीजनल को भूल कर नकलचियों में खो गये। यदि भगवान दादा ने इस स्टेप डांस की ईजाद नहीं की होती तो इसकी नक़ल कर आसमान छूने वाले कहां होते? यह भगवान दादा पहले ही थे जिन्होंने स्टंट सीन में ओरीजनल को कवर करने के लिये डुप्लीकेट इस्तेमाल किया । 
‘अलबेला’ की अपार सफलता के बाद ‘झमेला’ और ‘लाबेला’ बनायीं। बावेला मच गया। नहीं चला जादू। सुपर-डुपर फ्लाप। अति आत्मविश्वास ले डूबा। १९५६ में ‘भला आदमी’ से फिर कोशिश। बंदा धरातल पर ही रह गया। लगातार तीन फ्लाप शो। 
शुरू हुआ शिखर से सिफ़र तक का रिटर्न सफ़र। पहले चेंबूर में खड़ा दो मंज़िला जागृति स्टूडियो गया। जुहू में समन्दर को तकता पच्चीस कमरे का बंगला गया। अमीरों की शान बड़ी इंपाला सहित बीस कारों का फ्लीट भी एक-एक करके बिदा हुआ। इसके साथ ही भगवान दादा उसी चाल में वापस जहां से ऊपर की ओर चले थे।
भगवान दादा निराश जरूर हुए मगर टूटे नहीं। गौरवशाली अतीत को भुला कर बोले- यार, जुहू वाले बंगले में नींद नहीं आती थी। अब आराम से अपने लोगों के बीच अपने घर में खूब सोऊंगा। 
अगले दिन से वही पुराना भगवान दादा। स्टूडियो-स्टूडियो काम की तलाश में चक्कर लगाता हुआ। भाग्य चक्र उल्टा घूम गया। जिन्होंने कभी काम के लिये भगवान दादा के चक्कर लगाये, भगवान दादा काम के लिये उनके चक्कर लगा रहे थे। छोटा-मोटा जो भी रोल मिला लपक लिया। रोटी भर का इंतज़ाम जैसे-तैसे होता रहा। इस दौर में सिर्फ व्ही०शांताराम की ‘झनक झनक पायल बाजे’ और राजकपूर की ‘चोरी चोरी’ की दमदार भूमिकाएं ही यादगार हुईं। नाच-गाने वाले दृश्यों में जब वो स्लोमोशन में स्टेप डांस करते हुए ठुमके लगाते दिखते तो तमाशबीन कहते -वो देखो भगवान दादा, अलबेला वाला। कुछ अरसे बाद नई पीढ़ी आ गयी। सिर्फ पुरानी पीढ़ी के लोग ही भगवान दादा को भीड़ में पहचानते। कभी सातवें आसमान पर उड़ने वाला बंदा एक-दो शाट वाले रोल के लिये भी डायरेक्टर को झुक कर दिल से शुक्रिया अदा करता और फिर तपाक से सेल्यूट मारता- आज की रोटी को इंतज़ाम तो हुआ। 
उम्र बढ़ रही थी। बुढ़ापे के तमाम रोगों ने आ घेरा। बढ़िया इलाज के लिये जेब में पैसा नहीं। ऐसे बुरे हालात में भगवान से मिलने और मदद करने आये सिर्फ उनके पुराने साथी कामेडियन ओम प्रकाश, संगीतज्ञ सी० रामचंद्र और गीतकार-संवाद लेखक राजेंद्र कृष्ण। फिर वोदौर आया जब उनके हमदर्द भी एक एक कर दुनिया छोड़ गए। भगवान तनहा हो गए। बिलकुल टूटे और हताश। पैरालिसिस ने उन्हें व्हील चेयर तक सीमित कर दिया। सात बेटे-बेटियां उन्हें उनके हाल पर छोड़ कर चले गए। उन्हें जबरदस्त हार्ट अटैक आया। कोई अस्पताल भी नहीं ले गया। अपने एक कमरे वाली चाल में बड़ी फकीरी में आखिरी सांस ली। वो ०४ फरवरी २००२ थी। उम्र 89 साल । तकरीबन ४०० फिल्मों में काम कर चुके इस बंदे के आखिरी सफर में चाल के कुछ लोग थे। सिनेमा की कोई नामी हस्ती नहीं थी। भगवान दादा का भी शिखर से सिफ़र तक का सफ़र खत्म हुआ।अब तो भगवान दादा को पहचानने वाली पीढ़ी भी लगभग विदाई की कगार पर है। यह लेख इसलिए कि आने वाली पीढ़ी को सनद रहे कि इतिहास में एक अलबेला भगवान होता था, भगवान दादा। 
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