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जब साठ भये तब ठाठ भये!

शंभूनाथ शुक्ल 

माँ के निधन के बाद किसी ने मेरा जन्म दिन नहीं मनाया। वे हर साल माघ महीने के अंधियरे पाख की अष्टमी को सुबह उठते ही कढ़ी चढ़ा देतीं जो दोपहर तक बनकर तैयार हो पाती। साथ में गुलगुले भी। शहर कानपुर के गोविंद नगर में स्थित विद्यार्थी मार्केट में विलायती राम कपड़े वाले की दूकान में जाकर मेरे लिए बिन्नी का चारखाने वाला शर्टपीस लातीं और बगुले जैसे सफेद लंकलाठ का एक थान भी। जिससे मेरा पाजामा बनता और बाकी का दान दिया जाता। हर साल कहीं भी रहूं मैं कानपुर जाता जरूर था अपनी ड्रेस लेने। मैने उनसे कई बार कहा कि अम्मां मुझे पाजामा न बनवाया करो और बनवाओ तो भी यह चौड़ी मोहरी वाला नहीं। पर अम्मां नहीं मानतीं। वे तब भी यही कपड़े लाया करतीं जब मैने ब्रांडेड कपड़े पहनने शुरू कर दिए। मैं जब पैदा हुआ था तब अम्मां घोर बीमार पड़ीं और खटिया पकड़ ली इसलिए मुझे पाला मेरी अजिया और बुआ ने। वाकई मैने अपनी माँ का दूध नहीं पिया। मुझे दूध पिलाया था मेरी चाची (पिताजी के मित्र की पत्नी) ने जो दलित जाति की थीं। मेरी मां कृशकाय थीं और तीसरी जीवित संतान होने के कारण मुझे प्यार बहुत करतीं थीं। स्कूल से शिकायत आती या रिजल्ट कार्ड मिलता तो मैं मां को ही सामने करता। मेरी मां पढ़ी-लिखी नहीं थीं पर साइन कर लेती थीं और रामायण बांच लेती थीं। उनका साइन करना आना मेरी सेहत के लिए बहुत मुफीद था। तिमाही या छमाही परीक्षा में फेल होता तो रिजल्ट कार्ड पर अम्मां से साइन करवा लेता। अम्मां अपनी मृत्यु के कुछ महीने पहले घोर बीमार पड़ीं तब मैं कोलकाता में था और एक दिन शाम को जब मैं अपना मोबाइल अपने पीए को देकर आफिस से निकल कर हेस्टिंग्स की तरफ वाक को चला गया था तब ही कानपुर से Surendra Trivedi का अम्मां के निधन की सूचना का फोन आया। जब वापस आया तो पीए धनंजय चौबे ने कहा कि सर कानपुर बात कर लीजिए। तब तक सब कुछ फिनिश हो चुका था। रात के वक्त कोई ट्रेन नहीं। सुबह छह बजे एलायंस एअर लाइन्स पकड़कर लखनऊ पहुंचा और वहां से टैक्सी द्वारा कानपुर। अम्मां को बिठूर जाकर जार-ताप आए। रह गईं उनकी स्मृतियां। हर साल जन्म दिन पर अम्मां की खूब याद आती है। उनके गुलगुले और बिन्नी के कपड़े।
आज मैने साठ पूरे किए यानी एक तो सठिया गया और दूसरे और घूमने का मौका मिला करेगा। नियमत अब मुझे सीनियर सिटीजन की छूट मिला करेगी। लेकिन मजा देखिए कि इस फेसबुक ने तो मुझे बिल्कुल मां का सा प्यार दिया। हजारों साथियों ने मेरे इनबॉक्स पर जाकर मुझे बधाई दी। फोन पर एसएमएस किया और कुछ उत्साही मित्रों ने तो रात को फोन करना शुरू कर दिया था।  भले आप औपचारिक न होना चाहें और सैंटी भी नहीं पर इस आभासी दुनिया के मित्रों की यह आत्मीयता और प्यार देखकर यह तो लगता ही है कि रियल जीवन से यह आभासी दुनिया अधिक प्यारी, भोली और नफरत समाप्त करने वाली है। आप सब मित्रों को मेरा धन्यवाद और प्यार!
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