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संकट का संकेत है चैत में यह सावन

अंबरीश कुमार 

कुछ साल पहले तक ग्रामीण अंचल को छोड़कर भी सावन का बहुत बेसब्री से इंतजार होता था ।इस सावन पर फिल्मे बनती रही और गीत गूंजते रहे ।सावन यानी काले काले बादल और बरसात की झड़ी ,कभी फुहार वाली तो कभी मूसलाधार ।पर अब तो हर मौसम में सावन आ रहा है ।चैत में राजस्थान से लेकर उत्तर प्रदेश और आगे उतराखंड तक जिस तरह की बरसात हुई वह सावन में ही होती थी ।बेमौसम बरसात से देश के कई राज्यों में गेंहू की खड़ी फसल खराब हुई तो बड़ी संख्या में किसानो ने ख़ुदकुशी कर ली ।जिसके बाद यह मुद्दा राज्य से केंद्र तक गरमाया हुआ है ।अरबों का नुकसान हुआ है और यह बढ़ता जा रहा है ।इसका सीधा असर महंगाई और फिर आम आदमी पर पड़ना है ।पर्यावरण को लेकर पिछले दो दशक में देश में जो बहस चल रही थी अब वह जमीन पर दिखने लगी है ।पिछले वर्ष एक जनवरी को चेन्नई जैसे गर्म महानगर में सुबह सुबह कई  सैलानी मरीना बीच पर गए थे वे लौटे तो ठंढ के चलते बीमार पड़ गए ।इसी समय बगल के पांडिचेरी में जो सैलानी नया साल का जश्न मनाने समुद्र तट पर गए थे वे स्वीटर और जैकेट खरीदते दिखे और शहर में कंबल और रजाई की मांग बढ़ गई ।यह दक्षिण का वह इलाका है जहां साल के अंतिम दिनों में लोग उत्तर की कंपकंपाती ठंढ से बचने के लिए परिवार समेत छुट्टियों पर जाते रहे है ।पर जब यहां भी ठंढ पड़ने लगे तो इसे गंभीरता से लेना चाहिए ।साफ़ है देश का मौसम चक्र ही बदल रहा है ।समूचे उत्तर भारत में इस साल ठंढ का मौसम एक महीने से ज्यादा बढ़ गया ।जब ठंढ गई तो आंधी पानी के साथ सावन जैसा मौसम आ गया ।उतराखंड के गरुण में जनवरी में बर्फ के चलते गोमती और गरुण नदी में दिसंबर में मछलिया ठंड से मर गई ।इनमे महाशीर से लेकर ट्राउट तक थी ।लोगों ने कई दिनों तक इसकी दावत उड़ाई पर पुराने लोग इससे आशंकित थे ।जलवायु परिवर्तन का असर मैदान से लेकर पहाड़ पर भी कहर ढा रहा है ।फल फूल से लेकर अन्न तक सभी का चक्र बदल रहा है ।जो आम मैदान में होता था अब भीमताल तक चढ़ गया है ।और वह अकेले नहीं गया है पपीता केला से लेकर बांस तक साथ ले गया है ।अबतक पर्यावरण के जानकार जब जलवायु परिवर्तन की बात करते थे तो लोग उसे बहुत गंभीरता से नहीं लेते थे और इसे एक अकादमिक मुद्दा मानकर विद्वानों के लिए छोड़ देते थे ।पर अब किसान से लेकर बागवान तक तबाह होने लगा है ।अब चैत में सावन और बाढ़ से कश्मीर घाटी में तबाही आ रही है तो केदारनाथ का हादसा पहले ही चेतावनी दे चुका है ।जल जंगल और जमीन के साथ जो बर्ताव पिछले कुछ दशक में हुआ है उसके घातक नतीजों  की यह बानगी भर है ।नदियों को हम नाला बना रहे है ।तालाब और कुआं पाट रहे है ।जंगल का रकबा कम होता जा रहा है ।ऐसे में जलवायु में पहले बदलाव हुआ और अब जलवायु चक्र ही बदल रहा है ।उत्तर में स्वाइन फ्लू जैसी बीमारी इसी जलवायु के चलते इसबार ज्यादा कहर ढाने में कामयाब हुई ।गेंहू की फसल चौपट हुई तो दलहन भी नहीं बची और मौसमी सब्जियों की किल्लत बढ़ गई ।मौसम चक्र के बदलने से यह अभी शुरुआत भर है ।पर्यावरण को लेकर अगर अब गंभीर नहीं हुए तो यह हर कुछ दिन में तरह तरह से कहर ढाता नजर आएगा ।विकास की समूची अवधारणा पर अब नए सिरे से बहस का वक्त आ गया है ।इसे लेकर अब आम लोगों को गंभीरता से सोचना होगा वर्ना खतरा बढ़ता जा रहा है । इसलिए चैट में आए इस सावन से सबक लेने की जरुरत है । यह सुहावना मौसम बहुत घातक साबित हो सकता है । साभार -दैनिक हिन्दुस्तान 
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