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राज्य सभा में बीते 24 अप्रैल को इतिहास रचा गया. एक महत्वपूर्ण निजी विधेयक को सर्वसम्मति से पारित हो गया. यह ट्रांसजेंडर(किन्नर) के हितों की पैरवी करेगा. इसे किन्नरों के अधिकार 2014 के नाम से जाना जाएगा. इसके पास होने से संसदीय इतिहास में 36 वर्षो का निजी बिल पारित होने का रिकॉर्ड भी टूटा. इस बिल के पारित हो जाने से किन्नर समुदाय में खुशी है. लेकिन किन्नर समुदाय इसे आधी जीत मानता है. उनका कहना है कि असली लड़ाई तो अभी बाकी है.
 
लखनऊ की किन्नर रेशमा, नादिया और शबनम अपने अधिकारों के मिलने की बात तो करती हैं. लेकिन इसके जमीन हकीकत बनने की सोच मायूस भी दिखती हैं. रेशमा पूछती हैं, ‘क्या इतनी आसानी से सब कुछ बदल जाएगा ? इतना आसान तो यह नहीं दिखता. लेकिन इन अधिकारों की बात सुनकर खुशी जरूर होती है’.किन्नर अपने अधिकारों के मिलने से खुश है. लेकिन वे थोड़े भी मायूस हो जाते है. खुशी तब उड़ जाती है, जब इन अधिकारों के जमीनी हकीकत बनने की बात याद आती है. नादिया कहती हैं कि यह आसान नहीं है. अधिकारों की लड़ाई से बड़ी लड़ाई हकों के मिलने की है.
 
 किन्नरों के इस अधिकारों की आवाज उठायी द्रमुक सांसद तिरुची शिवा ने. राज्यसभा में द्रमुक सांसद तिरुची शिवा ने किन्नरों के अधिकारों विधेयक को निजी विधेयक के रूप में पेश किया. इन अधिकारों के देने साथ ही भारत दुनिया के अग्रणी देशों में शुमार हो गया. अब तक अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, इटली, सिंगापुर सहित करीब 29 देशों में किन्नरों के अधिकारों को कानूनी मान्यता दी गई है.
 भारत में किन्नरों की संख्या करीब 30 लाख है. विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र होने के नाते सरकार की जिम्मेदारी है कि इनका हक इन्हें मिलें.
 विधेयक के प्रावधानों पर चर्चा के दौरान सांसद शिवा ने बिल वापस लेने से मना करते हुए इस पर मत विभाजन की मांग की. संसदीय परंपरा में अक्सर प्राइवेट मेंबर बिल को सरकार वापस लेने का दवाब देती है. इसके साथ उचित कदम उठाने का भरोसा देती है. इस बिल के साथ भी यह कोशिश हुई. लेकिन किन्नरों के प्रति संवेदना और आशा ने उन्हें तटस्थ रखा. बिल पर चर्चा के दौरान सदन की दर्शक दीर्घा बड़ी संख्या में किन्नर मौजूद रहे. इनकी मौजूदगी ने बिल पारित कराने में बड़ी भूमिका निभाई. साल 1979 के बाद यह पहला निजी विधेयक है जो किसी सदन से पारित हुआ . इससे पहले साल 1979 में ‘अलीगढ़ मुस्लिम यूनिर्वसटिी एक्ट, 1977’ राज्यसभा से पारित हुआ था. लेकिन लोकसभा से यह पारित नहीं हो सका. इस बार के विधेयक के प्रति आशा की जानी चाहिए कि दलगत राजनीति से ऊपर उठकर एक उपेक्षित समुदाय के कल्याण से संबंधित बिल कानूनी शक्ल लेगा.  
 
किन्नर अधिकारों के पारित बिल के दस अध्यायों में विभाजित 58 धाराएं किन्नरों के सामाजिक समावेशन, अधिकार और सुविधा, आर्थिक और कानूनी सहायता, शिक्षा, कौशल विकास,  हिंसा और शोषण रोकने का प्रावधान करती हैं. बिल में उनके लैंगिक समानता के अधिकार और शिक्षा और नौकरियों में आरक्षण की व्यवस्था है. किन्नरों के लिए एक राष्ट्रीय आयोग की बात भी है. हालांकि तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल सरकारों द्वारा उनके कल्याणार्थ एक वेलफेयर बोर्ड गठित है. लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर आयोग बनाये बगैर ये प्रयास नाकाफी हैं. यह विधेयक एक व्यापक और प्रभावी राष्ट्रीय नीति का उपबंध भी देता है जो किन्नरों के समग्र विकास और कल्याण को पोषित करने वाला हो. इसका मकसद किन्नरों को भी समाज की मुख्यधारा से जोड़ना, रुचि के आधार पर काम का अधिकार और भेदभाव रोकना और असमानता खत्म करना है.
 बिल में साफ कहा गया है किन्नरों के मामलों के लिए अलग से अधिकार न्यायालय की स्थापना और उनके त्वरित निपटारे की बात है.जिससे उनकी लैंगिग स्थिति बेहतर हो सके. बिल में इस समुदाय के बच्चों के लिए प्राथमिक, माध्यमिक और उच्चतर शिक्षा में आरक्षण का प्रावधान है. सरकारी नौकरियों में दो फीसद आरक्षण और किसी भी संस्थान में उनके प्रति भेदभाव रोकने का भी प्रावधान हैं. व्यावसायिक और स्वनियोजन प्रशिक्षण और कम दर पर ऋण की भी व्यवस्था दी गयी है. इनकी स्वास्थ्य समस्या को तरजीह देते हुए अलग से एचआई वी निगरानी केंद्र बनाने और दूसरी सुविधाएं देने का उपबंध भी है. विधेयक में किन्नरों के लिए ऐसे सामुदायिक केन्द्रों का विकास करने की बात है जो पोषण, स्वच्छता और स्वास्थ्य मानकों पर खरे हों. इसके अलावा उपेक्षित और वंचित किन्नरों के लिए बेरोजगारी भत्ते के साथ साथ पेंशन की भी व्यवस्था है. इसके लिए जागरूकता पर जोर दिए जाने की बात है.
 
यदि यह बिल कानूनी शक्ल अख्तियार करता है, तो बड़े सामाजिक बदलावों का वाहक बन सकेगा. वास्तव में मानवीय संवेदना और बहुविविध समाज में समानता के अधिकारों की यह नजीर की तरह होगा. हालांकि इस समुदाय के विकास और सामाजिक समावेशन की दिशा में पहले से सरकार सहित कई कल्याणकारी संस्थाएं कार्य करती रही हैं. हाल में सुप्रीम कोर्ट ने भी इनके शोषण और विकास की दिशा में अहम फैसला दिया था जिसने इस समुदाय के लोगों के लिए वास्तविक खुशी का कारण बना था. इसी वर्ष 15 अप्रैल को न्यायमूर्ति के एस राधाकृष्णन और ए के सीकरी की पीठ ने किन्नरों की पहचान के साथ कानूनी दर्जा की मांग करने वाली संस्थाओं की याचिका पर सुनवाई करते हुए केंद्र व राज्य सरकारों निर्देश भी दिए. इसमें किन्नरों को तीसरे लिंग के तौर पर शामिल करने और संविधान में मिले सभी अधिकार और संरक्षण दिए जाने की बात है. किन्नरों को उनके लिंग की पहचान तय करने,सामाजिक, शैक्षिक और नौकरियों में कानूनी हक दिए जाने की बात है. सुप्रीम कोर्ट के इस फैसलों से किन्नरों के कल्याण के कई रास्ते खुले और कई नये रास्तों के खुलने की उम्मीद है. 
किन्नर खुद को समाज और परिवार दोनों स्तर पर अपने को उपेक्षित महसूस करते है. ऐसे में योग्यता के बावजूद उनका आत्मविश्वास गुम सा नजर आता है. समाज में उनके प्रति एक शर्मनाक सोच है. जिसे समाज ढोता चला आ रहा है. शर्म, भय और शोषण का वह शिकार बनते रहे है. जैविक रूप से अलग तरह की शारीरिक संरचना में किन्नर का खुद का कोई हाथ नहीं होता. फिर भी वह सामाजिक ताने-बाने का शिकार हो रहे हैं.
 हालांकि भारतीय समाज में ऐसे लोगों के प्रति सम्मानजनक नजरिया भी रहा है. मांगलिक कार्यों में इनकी मौजूदगी शुभ मानी जाती है. इन्हें हिन्दू धर्म-दर्शन में भगवान शिव के रूप में देखा गया है. इसके बावजूद ये समाज में उपेक्षित और शोषित हैं. लेकिन सरकार का अब तक इनके प्रति रवैया भी निराशाजनक रहा है.
 बहरहाल, यदि सरकार किन्नरों के सामाजिक समावेशन के जरूरी प्रयास करे और उन्हें सामाजिक स्वीकृति मिल जाए तो एक वंचित, उपेक्षित, शोषित समुदाय का कल्याण व विकास सुनिश्चित किया जा सकता है.मानवाधिकारों संवेदनशील आज के युग में किन्नरों के प्रति नजरिए का बदलना समाज और समय दोनों की मांग है. एक मानव के रूप में उनको सभी अधिकार मिलने चाहिए. जिससे एक नये समाज की रचना हो. जिसमें सभी के लिए समानता हो
 
अलग नामों से है पहचान
ट्रांसजेंडर (किन्नर) को देश में अलग नामों जैसे- हिजड़ा, किन्नर, कोठी, अरावनी आदि से पुकारा जाता है.
यूनक-  पुरुष रूप में जन्म लिया हो और बाद में उसे कृत्रिम तरीकों से जननअक्षम बनाया जाता है. इसमें कभी-कभी गंभीर शारीरिक मुश्किलें पैदा हो जाती हैं। जन्म के समय जिनके जननांग पुरुषों की तरह होते हैं, वह श्रेणी आते हैं.
 
हिजड़ा- इसे अंग्रेजी भाषा के यूनक शब्द का ही पारसी है। लेकिन सभी हिजड़ों का जरूरी रूप से बधियाकरण नहीं होता है. यह स्त्री और पुरुष के बीच की कड़ी के तौर पर अपनी नई पहचान कायम करते हैं, उन्हें हिजड़ा कहते हैं. देश में हिजड़ों की पहचान रीति-रिवाजों और शादी-बारातों मे नाचने और बच्चों के जन्म के नेग लेने के तौर पर रही है. 
किन्नर- उत्तर भारत में हिजड़ों के लिए इस शब्द का इस्तेमाल होता है. महाराष्ट्र में अधिक शिक्षित हिजड़ों को भी किन्नर कहा जाता है.
 
अरावनी- तमिलनाडु में किन्नरों के लिए इस शब्द का इस्तेमाल करते हैं ये लोग अपने आप को पुरुष शरीर में बंधी स्त्रियां मानते हैं। कई अरावनी खुद को थिरुनंगी कहना पसंद करे हैं.
 
कोठी- यह उभरलिंगी होते है. ज्यादातर जनाना किरदार पसंद करते हैं। हालांकि सभी कोठियों को हिजड़ा या ट्रांसजेंडर नहीं कहा जा सकता.ये अलग सुमदाय में नहीं रहते. 
शिव-शक्ति- आंध्रप्रदेश में किन्नरों को इसी नाम से पुकारते हैं. यह खुद को भगवान शिव से विवाहित मानते हैं. ये धार्मिक रीति-रिवाजों में महिलाओं की वेश-भूषा में होते हैं. इनके हाव-भाव स्त्रियों से जैसे होते हैं.ये ज्योतिषी या आध्यात्मिक गुरु के रूप में भी कार्य करते हैं। 
 
जोगती - महाराष्ट्र और कर्नाटक के मंदिरों में किन्नर महिला और पुरुष दासों को जोगता और जोगती कहते है. पुरुष से महिला बने दासों को जोगती कहा जाता है।
 
‘संविधान में भेदभाव नहीं है’
ट्रांसजेंडर  और समलैंगिकों के अधिकारों के लिए काम करने वाली ‘अस्तित्व’ नाम की संस्था की संचालक किन्नर लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी से ‘शुक्रवार’ पत्रिका के अजय कमार पांडेय ने बातचीत की.
राज्य सभा में बिल पारित हो गया, क्या प्रतिक्रिया है.
खुशी है. इस बात की कोशिश लंबे समय से हो रही थी. आखिर कार डीएमके के  त्रिरुची शिवा की कोशिश का नतीजा सामने आया. लेकिन अभी लड़ाई जारी रहेगी. बहुत कुछ किया जाना बाकी है.
किन्नरों की समस्याओं के प्रति समाज उदासीन रहता है. इसे किस रूप में देखती है.
देखिए, संविधान में किसी तरह के भेदभाव को लेकर साफ मनाही है. फिर हम इस देश के है. हमारे साथ हर तरह का अंतर समाज में शुरू से होता आया है. लोगों में जागरुकता फैलेगी, तो सामाजिक स्तर पर भी बड़ा सुधार हो सकता है. शिक्षा, रोजगार और स्वास्थ्य के स्तर पर बड़ा अलगाव रहा है. जो नहीं होना चाहिए. यह बदलाव जरूरी है.
क्या लगता है कि न्यायालय के हस्तक्षेप के बाद आप के समुदाय की स्थिति बदली है.
हां बदलाव हो रहा है. लेकिन यह बहुत ही धीमा है. अभी हाल में एक ट्रांसजेंडर के न्यूज एंकर होने की खबर आप ने भी सुनी होगी. यह समाज में मिल रही मान्यता को ही बताता है. महिलाओं के अधिकारों की तरह हमारे अधिकार भी धीरे-धीरे ही मिलेंगे.
लैंगिकता को लेकर समाज को किस नजरिए से देखती है.
पुरुष और महिलाओं की तरह हम तीसरी तरह के है. हमें ट्रांसजेंडर की श्रेणी में रखा है. इसमें हमारी कोई गलती नहीं है. यह प्राकृतिक है. तो इसकी सजा हमें क्यों. प्रकृति सभी को समान अधिकार देती है. ठीक हमारे संविधान में किसी से अंतर नहीं रखने की बात की है. इसलिए लैंगिकता को लेकर भेदभाव बंद होना चाहिए. भेदभाव करना संवैधानिक रूप से सही नहीं है.
क्या बड़े बदलाव होने की उम्मीद है.
समाजिक न्याय मंत्रालय ने हमारे लिए तमाम तरह की सिफारिशें की है. बड़े स्तर पर स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार के लिए सभी जगहों पर आरक्षण की बात कही गई है. सरकार से हमें पूरी उम्मीद है कि हमें यह मिलेगा. हमारे लिए अलग चिकित्सालय, स्कूलों में शिक्षा की व्यवस्था और रोजगार की बात साफ तौर पर रखी गयी है. इसका पालन जरूरी है. बुजुर्ग किन्नरों को पेंशन आदि की भी व्यवस्था है.शुक्रवार 
 
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