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सरकार और संघ परिवार

सतीश पेडणेकर

 कहते हैं मनुष्य इतिहास से सीखता है। इस को बखूबी मोदी सरकार ने अपनाने की कोशिश की है। संघ परिवार ने वाजपेयी सरकार के दौरान हुई गलतियों से बहुत कुछ सीखा है। मोदी सरकार को बने साल भर पूरा हो जाएगा। इस दौरान मोदी सरकार और संघ परिवार के बीच सब कुछ शांति से चलता रहा। कोई बड़ा विवाद उभरकर नहीं आया। ऐसा नहीं है कि संघ परिवार के कई संगठनों के बीच मतभेद नहीं हैं। कई मौकों पर वे मतभेद जताते भी रहते हैं। लेकिन मतभेदों लेकर कोई महाभारत नहीं हुआ। इन्हें बातचीत के जरिए सुलझाने की कोशिश चल रही है। हालांकि मतभेद ऐसे नहीं है कि वे आसानी से सुलझ जाएं। खासकर स्वदेशी जागरण मंच, भारतीय मजदूर संघ, भारतीय किसान संघ और कुछ हद तक विश्व हिंदू परिषद के मोदी सरकार से कई मुद्दों पर मतभेद हैं। यह बात जगजाहिर है। इसके बावजूद भी मोदी सरकार के खिलाफ कोई तीखा विरोधी स्वर कहीं से सुनाई नहीं दिया। ऐसा लगता है कि मोदी और संघ के बीच ज्यादा अच्छा तालमेल है। जो मतभेदों के तिल का ताड़ बनने से रोकता है।
इसका बिल्कुल उलट दृश्य अटल बिहारी की सरकार के कार्यकाल में रहा। हालत यह थी कि अपने अनुशासन की दम पर पहचाना जाने वाला संघ परिवार इससे परे दिखाई देता रहा। प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नेताओं के बीच सामंजस्य का अभाव था। दूसरी तरफ संघ परिवार के कई संगठन वाजपेयी सरकार की नीतियों के सख्त खिलाफ थे। विशेषकर संघ परिवार के वरिष्ठ नेता, भारतीय मजदूर संघ और भारतीय किसान संघ के संस्थापक और स्वदेशी जागरण मंच के प्रेरक दत्तोपंत ठेंगडी तो वाजपेयी सरकार की नीतियों के सख्त खिलाफ थे। आर्थिक मुद्दों पर तो हर मुद्दे पर टकराव था। यह टकराव होना लाजिमी था क्योंकि वाजपेयी सरकार के कई मंत्री आर्थिक उदारवाद में विश्वास करनेवाले थे। दूसरी तरफ था स्वदेशी जागरण मंच जो स्वदेशी की बात करता था। हर विदेशी वस्तु और विदेशी पूंजी से उसे परहेज था। आर्थिक उदारवाद और वैश्वीकरण के दौर में कोई भी सरकार स्वदेशी जागरण मंच की विचारधारा पर अमल नहीं कर सकती थी। जाहिर है वाजपेयी सरकार भी उस पर अमल करने को तैयार नहीं हुई। इसे लेकर संघ परिवार में भयंकर विवाद हुआ। दत्तोपंत ठेंगडी तो संघ परिवार में विपक्ष के नेता बन गए थे, जो अटल सरकार की नीतियों की तीखी आलोचना करते थे। लेकिन वाजपेयी सरकार ने अपने कार्यकाल में आर्थिक उदारवादी नीतियों को ही लागू किया। स्वदेशी जागरण मंच हाशिए पर छूट गया। अब तो स्वदेशी जागरण मंच नाममात्र है। यह संघ परिवार का एक हिस्सा है। इसलिए महत्व दिया जाता रहा, वरना आज उसकी विचारधारा हाशिए पर है। जिन मुद्दों पर जागरण मंच के वाजपेयी सरकार से मतभेद थे उनसे तो मोदी सरकार बहुत आगे जा चुकी है।  इससे स्पष्ट है कि मोदी के आर्थिक सलाहकारों में एक भी स्वदेशी समर्थक नहीं है। इन सलाहकारों में फ्री इकॉनामी वाले भगवती, पानगढिया, विवेक देवराय आदि। यहां तक कि मोदी का मेक इन इंडिया कार्यक्रम तो मंच के स्वदेशी कायर्क्रम के ठीक विपरीत है। मंच के नेता कहते हैं कि इसमें विदेशी पूंजी और निवेश की बड़ी भूमिका है। जबकि 'मेक इन इंडिया' के बजाय 'मेड बाई इंडिया' या 'मेड बाई इंडियंस' और 'मेड फॉर इंडिया' की नीति होनी चाहिए। निर्माण केंद्र का चीनी मॉडल नाकाम हो रहा है। इसके अलावा निर्यात के आधार पर बना आर्थिक विकास का मॉडल भी कामयाब नहीं हो रहा । दूसरी तरफ भारतीय किसान संघ का कहना है कि ‘मेक इन इंडिया’ के लिए किसान ही क़ुर्बानी क्यों दें। मंच की इन आपत्तियों को मोदी सरकार गंभीरता से लेगी, ऐसा नहीं लगता। किसान संघ की चाहे जो सोच हो, भूमि अधिग्रहण के मुद्दे पर तो संघ मोदी सरकार के साथ दिखता है। हाल ही में संघ की कार्यकारणी की बैठक के बाद संघ ने भूमि अधिग्रहण का समर्थन किया। संघ ने मोदी सरकार से कहा है कि बिल पर अमल करते समय किसानों की हितों की रक्षा का भी ध्यान  रखा जाए। इसके बाद किसान संघ की आपत्ति बहुत महत्वपूर्ण नहीं रह जाती। इससे एक बात साफ है कि संघ का नेतृत्व नई अर्थव्यवस्था की मजबूरियों को समझता है। दूसरी तरफ नरेंद्र मोदी विरोधियों के लगातार आरोप के बावजूद यह कोशिश करते रहे हैं कि उनकी सरकार को गरीबों का हितैषी माना जाए।
इस सरकार में एक फर्क साफ दिखता है कि विश्व हिंदू परिषद चुप्पी साधे है। उसका कहना है कि वह तीन-चार साल राम मंदिर का मुद्दा नहीं उठाएगी। जबकि वाजपेयी सरकार में विश्व हिंदू परिषद की राम मंदिर निर्माण की मांग काफी सिरदर्द बन गयी थी। दरअसल धर्मांतरण के मुद्दे को लेकर मोदी सरकार और संघ परिवार में तकरार हो सकती थी। लेकिन इस मुद्दे पर दोनों ने सूझबूझ से काम लिया। विपक्षी दलों ने इस मुद्दे को उछालने की कोशिश की लेकिन उन्हें कोई कामयाबी नहीं मिली।
मोदी सरकार के साल भर पूरे होने के बाद भी संघ परिवार सरकार के साथ है तो इसकी वजह मोदी सरकार को संघ परिवार की जरूरत है। इसके अलावा संघ को भी अपने प्रभाव और विस्तार में मोदी के चेहरे की चमक चाहिए। संघ परिवार के कुछ वरिष्ठ नेताओं का कहना है कि परिवार के कई घटकों में एक बात की सहमति थी कि अनावश्यक मुद्दों को उठाकर सरकार को परेशान करना अपने पांवों में कुल्हाड़ी मारना होगा। मतभेदों को अपने ही सरकार के खिलाफ आंदोलन करके तूल देने के बजाए उन्हें बातचीत के जरिए हल किया जाए। कहना होगा अब तक तो संघ परिवार के ज्यादातर घटक और दूसरी तरफ मोदी सरकार इसी सहमति से चल रही है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि संघ मोदी के हर काम से खुश है। मोदी के काम के तरीके से संघ परिवार में नाराजगी है। संघ हमेशा चाहता था कि जो भी प्रधानमंत्री बने वह सबको साथ लेकर चले। पर उसे इस मामले में उसके दोनों ही प्रधानमंत्रियों से निराश होना पड़ा। वाजपेयी संघ परिवार के घटकों को साथ लेकर नहीं चल पाए। मोदी संघ परिवार के घटकों को साथ लेकर चलने की कोशिश में हैं। लेकिन भाजपा के सभी वर्गों को अपने साथ लेकर नहीं चल पा रहे हैं। पार्टी और सरकार में सामूहिक नेतृत्व होना चाहिए, जिसका अभाव सबसे ज्यादा खटकता है।  शुक्रवार 
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