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संजय गांधी ,तीतर और बाबू भाई

अंबरीश कुमार 

सुबह सिंधिया के वृंदावन आर्चिड पर चढ़ाई पर ही एक बुजुर्ग सज्जन ने आदाब किया तो उत्सुकतावश पूछ लिया कहा रहते है तो जवाब था यही दो महीने तक एक किराये के एक कमरे के मकान में परिवार के साथ रहता हूं .तब ध्यान आया घर के करीब पचास फुट आगे एक नया परिवार शाह जी के मकान के आगे बने हिस्से में दिखता है .दो तीन युवतियां भी जो अक्सर अंग्रेजी में बात करती है .कुछ हैरान जरुर हुआ क्योंकि इस कमरे में अक्सर बिहार से आए बढ़ई मिस्त्री आदि रुकते थे शायद महीने का करीब पांच सौ से हजार तक का किराया होगा .छोटा सा बाथरूम जिसका पानी सड़क पर बहता रहता है और खाना क्या बन रहा है यह सड़क वाला भी मसाले की खुशबु से जान जाता है .तो ये सज्जन उसी में रुके थे .कुछ दिलचस्प व्यक्ति नजर आये तो बातचीत शुरू की .तबतक सिंधिया के गेस्ट हाउस के सामने सेब आडू प्लम के बगीचे में मधुमक्खियों के शहद वाले डिब्बे नजर आये .छड़ी के सहारे सफ़ेद दाढ़ी वाले सज्जन थे बाबु भाई बहेड़ी वाले .मुझे रोक कर बोले -साहब यही जगह है जहां सन पचहत्तर में संजय गांधी ने तीतर का शिकार किया था वह भी पिस्टल से .जो मित्र लोग यहां आये है उन्हें इस जगह की सही लोकेशन बता दूं .जब सिंधिया के बगीचे से स्टेशन के लिए आगे बढ़ते है तो दाई तरफ गेस्ट हाउस दिखता है तो सड़क के बायें एक पत्थर का टूटा फूटा घर जिसके टिन की छत पर आजकल ढेरों खुबानियां गिरी नजर आती है .जरा सा आगे बढ़ने पर एक पुराना घर नजर आता है जिसमे पहले बागवानी विभाग वाले जैम जेली बनाते थे बाद में यहां फलों की पैकिंग होने लगी .इसके पीछे अखरोट का जंगल जैसा है .इसी मकान के आगे पहले घनी झाडियां थी .गर्मियों के दिन थे और संजय गांधी अपनी मंडली के साथ सिंधिया के अतिथिगृह में ठहरे थे.अचानक उन्हें झाड़ियों में एक बड़ा सा तीतर दिखा तो उन्होंने बाबू भाई यानी बाबू पहलवान से कहा कि एक डंडी लेकर झड़ी में से इस तीतर को ऊपर उड़ा दो .कुछ मशक्कत के बाद बाबू भाई को तीतर दिख गया और उसे उन्होंने उड़ा दिया .अचानक फायर की आवाज आई तो तीतर सेब के पेड़ पर गिरा नजर आया .संजय गांधी ने अचानक जेब से पिस्टल निकाली और फायर कर दिया .तीतर नीचे आ चुका था .

यह सब सुनाते हुये बाबू भाई की आंखे चमक रही थी .आगे बोले ,साहब तब शिकार का जमाना था और इस तरफ तीतर और जंगली मुर्गे का शिकार जमकर होता था .संजय गांधी को शिकार का शौक था और उनके लिये तब शाम तक तीतर या देशी जंगली मुर्गे का इंतजाम यहां होता था या नीचे से डंपी भाई के फार्म हाउस से आगे के जंगल से हिरन का शिकार होता था .बाबू भी ने आगे कहा ,डंपी भी ने उस समय लंदन से सीए की पढाई की थी .उनके वालिद और मेरे वालिद दोस्त थे तभी से साथ है डंपी भाई का .तब विजया राजे सिंधिया यहां आती थी .मुझे कहा की इतनी जमीन है इसी में घर बना लो ,पर अपनी कोई इच्छा नहीं थी बहेड़ी छोड़ने की .खेती परिवार वही था .बाद में वसुंधरा राजे सिंधिया भी यहां आती रही उनसे भी पारिवारिक संबंध रहा .हम सब इसी गेस्ट हाउस में रहते थे .डंपी ज्यादा समय रहते थे .संजय गांधी बीच बीच में आते रहते थे .मेनका गांधी के आने के बाद शिकार बंद हो गया .पर रामगढ़ का यह इलाका संजय गांधी को बहुत पसंद था .अब हम भी सोच रहे है इधर बस जायें .बाबू भाई वाकई रोचक व्यक्ति निकले .दुसरे वे पहले व्यक्ति मिले जो जुलाई तक यहां रहने वाले थे .बरसात ठीक से हो जाने के बाद ही वे जायेंगे .

 
 
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