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सुनीता शाही

प्रधानमंत्री मोदी के गंगा के सफाई के लिए अभियान चलाने के बाद नदियों पर राजनीति तेज होती दिख रही है. गंगा के तर्ज पर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने गोमती के सफाई अभियान की शुरुआत कर दी है. इसके लिए बाकायदा एक बड़ी राशि भी जारी की गयी है. अखिलेश सरकार गोमती रिवरफ्रंट को विकसित करना चाहती है. ऐसे में यदि साल 2017 के उत्तर प्रदेश का विधानसभा चुनावों में नदियां चुनावी मुद्दा बने तो अचरज मत करिएगा.
बीते साल 2014 के आम चुनावों में मोदी ने गंगा की सफाई को मुद्दा बनाया था. जनता भी गंगा की सफाई को लेकर जागरूक हुई है. ऐसे में वह इस मुद्दे को भूलने वाली नहीं है. अपने दूसरे कार्यकाल की तैयारी में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव गोमती की सफाई के जरिये प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समेत दूसरी पार्टियों को चुनौती देने वाले हैं. ऐसे में अब इन नदियों की सफाई चुनावों का बड़ा मुद्दा बन गयी है.
करीब 2,252 किलोमीटर तक फैली गंगा नदी का करीब हजार किलोमीटर भाग कन्नौज, फरूर्खाबाद, वाराणसी, इलाहाबाद और कानपुर से लगा होता है. इन हिस्सों में यह सबसे ज्यादा प्रदूषित है. इसे साफ़ कर पाना एक बड़ी चुनौती है. इसी वजह से उमा भारती ने कानपुर के चमड़ा कारखानों को बंद करने का फरमान दिया है. फरमान तो जारी हो गया. लेकिन सियासत शुरू हो गयी. प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने मामले पर तंज कसा कि क्या अब केंद्रीय मंत्री चमड़े का जूता-चप्पल पहनना बंद कर देंगे. इस बयान के बाद नदियों पर सियासत गरमाती दिखी.
इन हालात में उत्तर प्रदेश चुनावों में गंगा-महिमा बहाली एक अहम मुद्दा बनता दिख रहा है. मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने साल 2017 के चुनावों में  ‘मुख्यमंत्री नदी बनाम प्रधानमंत्री नदी’ को मुद्दा बनाने का फैसला किया है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोकसभा चुनाव अभियान के दौरान वाराणसी में कहा था, ‘गंगा मां ने उन्हें यहां बुलाया है’. उन्होंने गंगा को जल्द साफ़ करने का वायदा भी किया था. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी गंगा की सफाई के लिए हरसंभव कोशिश में लगे हैं. मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने गोमती रिवरफ्रंट विकास परियोजना बनाने का फैसला लिया है. हाल ही में इसके लिए 656 करोड़ रुपये जारी कर दिये गये. इससे तीस किलोमीटर तक गोमती नदी की सफाई की जायेगी. नदी के किनारे साइकिल और तांगे के लिए ट्रैक बनेगा. इसके साथ डायाफ्राम वाल और सांस्कृतिक कार्यक्रम के आयोजन स्थल बनाये जायेंगे.
गोमती रिवर फ्रंट बनाने के मुद्दे पर मुख्यमंत्री अखिलेश यादव कहते है कि इससे पहले गोमती नदी के लिए कोई काम नहीं किया गया. पर सपा सरकार अवध की विरासत बचाये रखने की दिशा में काम करती रहेगी. गोमती महान नदी है यह अपने में कई इतिहास समेटे हुए है. पुराने समय में लोग इसका इस्तेमाल व्यापार और परिवहन के लिए करते रहे हैं.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के गंगा सफाई अभियान को मुख्यमंत्री अखिलेश यादव सांप्रदायिक ताकतों का खेल बताते हैं. मुख्यमंत्री कहते हैं कि कुछ लोग गंगा को धर्म से जोड़ रहे हैं. पर वास्तव में गंगा और यमुना धर्मनिरपेक्ष नदियां है.वे सभी जातियों और धर्मों से होती हुई समाजवादी धारा में बहती है.’
प्रधानमंत्री मोदी गंगा नदी और वाराणसी को क्यूटो के तर्ज पर विकसित करने की बात करते हैं तो राज्य के मुख्यमंत्री गोमती को टोक्यो की तमा रिवरफ्रंट की तरह बनाने की योजना बताते हैं. वे गोमती को शारदा नहर से जोड़ने की योजना बना रहे हैं. इतना ही नहीं इसे साल 2017 से पहले खत्म करने की कोशिश भी की जायेगी.
नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने से पहले नदियां कभी भी चुनावी मुद्दा नहीं रहीं. भवरा क्षेत्र में एसटीपी से गोमती में करीब 23 नालों का पानी मिलता है. इससे पहले मुलायम सिंह ने अपने तीन कार्यकालों में गोमती की सफाई का वायदा किया था. पर इसे गंभीरता से नहीं लिया गया.  लेकिन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव इसमें प्रभावी ढंग से जुटे हैं. गोमती के लिए करीब छह सौ करोड़ रुपये की राशि तय की गयी है. कई मशीनों का इंतजाम किया गया है. मलजल उपचार का काम भी शुरू किया गया है. सरकार इसमें कोई ढिलाई बरतना चाहती इसके निर्देश भी अफसरों को दे दिये गये हैं.
नदियों के सफाई के मुद्दे पर भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष विजय बहादुर पाठक कहते हैं कि मलजल सुधार योजना के तहत तीन साल पहले तीन इकाइयां बनायी गयीं थीं. तीन साल पहले कूड़ा ट्रीटमेंट प्लान तैयार हो चुका था. साल 2012 में अखिलेश ने मुख्यमंत्री की कुर्सी संभाली. वह गोमती को लेकर गंभीर हैं. पहले गोमती लखनऊ में चार से पांच महीनों तक सूखी रहती थी. पूर्व मुख्यमंत्री मायावती ने पार्क और स्मारक बनवाकर गोमती की धारा को सीमित कर दिया. मुख्यमंत्री गंगा की सफाई को भी ज़रूरी मानते हैं क्योंकि गंगा भी जीवनदायिनी है. इससे पहले भी सभी सरकारों ने गंगा की सफाई का वायदा किया था. पर उस पर अमल नहीं हो पाया. कांग्रेस सरकार ने करीब हज़ार करोड़ रुपये गंगा एक्शन प्लान के नाम खर्च किये. पर गंगा मैली ही रही. वाराणसी नरेंद मोदी का संसदीय क्षेत्र है जो अध्यात्म और संस्कृति का केंद्र है. यहां दुनिया भर के पर्यटक आते है.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की गंगा की सफाई की गति अब धीमी होती दिख रही है. मोदी के बुलावे पर गंगा घाटों को गोद लेने के लिए तैयार हुए तमाम सामाजिक संगठन अब ठंडे होते दिख रहे हैं. आठ नवंबर 2014 को नरेंद्र मोदी ने वाराणसी के अस्सी घाट से सफाई अभियान की शुरुआत की थी. ये अभियान सिर्फ यहीं पर थम गया. बाकी के करीब 83 घाटों की हालत अब भी जस की तस है. सबसे खराब हालत गंगा महल घाट और रीवा घाट की है जहां से प्रधानमंत्री मोदी ने इस अभियान की नींव रखी थी. वाराणसी के अतिरिक्त नगरपालिका आयुक्त बीके द्विवेदी ने कहा कि सभी सामाजिक संगठनों ने अपना पैर पीछे खींच लिया है. पर अब इसका जिम्मा नगर पालिका ने लिया है. वाराणसी के मेयर रामगोपाल मोहले और नरेंद्र मोदी के करीबी सहयोगी ने भी इसपर अपना असंतोष जताया है. उन्होंने बताया कि जिन कंपनियों ने सफाई का जिम्मा लिया था वह बजट बनवाकर भाग खड़े हुए.
गंगा और गोमती का चुनावी मुद्दा बनना एक नये तरह की राजनीति की शुरुआत है. इससे पहले भी गंगा चुनावी मुद्दा रही है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गंगा की सफाई का बीड़ा उठाकर दूसरे दलों के लिए भी चुनौती पेश की है. शायद अखिलेश सरकार ने इसे चुनौती के तौर पर लिया हो. पर नदियों को मुद्दा बनाना अखिलेश सरकार को मुश्किल में भी डाल सकता है.
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