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क्षिप्रा-नर्मदा जोड़-तोड़
विनायक परिहार
देश भर में नदियों को जोड़ने की बात एक बार फिर तेजी से होने लगी है. इसे समय की जरूरत बताते हुए कहा जा रहा है कि इससे देश की 90 फीसद कृषि योग्य भूमि को सिंचित किया जा सकता है. इस परियोजना को देश के सर्वोच्च न्यायालय से समयबद्घ क्रियान्वयन का निर्देश भी दिया जा चुका है. लेकिन इस पर न तो कोई आम बहस होने दी गयी और न संबंधित लोगों, जन संगठनों या स्वतंत्र विशेषज्ञों से कोई राय ही ली गयी है. वैसे तो नदी जोड़ो परियोजना कागज और भाषणों में सम्मोहक लगती है, लेकिन इस परियोजना के दूसरे पहलुओं पर नजर डालें तो यह स्पष्ट हो जायेगा कि जब तक यह कागज और जुबान पर है ,तभी तक अच्छी है. जमीन पर आते ही कई तरह की मुसीबतें आ जायेंगी. नमूना देखिए नर्मदा क्षिप्रा सिंहस्थ लिंक परियोजना का.
देश के पूर्व उपप्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी ने 26 फरवरी, 2014 को मध्यप्रदेश में नर्मदा क्षिप्रा सिंहस्थ लिंक परियोजना का शुभारंभ किया गया था. इसे मध्यप्रदेश सरकार देश की पहली नदी जोड़ो परियोजना बता रही है. प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने असंभव को संभव करने का दावा किया था. उन्होंने कहा था कि इस परियोजना से सूख गयी क्षिप्रा नदी को नया जीवन मिलेगा. संपूर्ण मालवा क्षेत्र को भरपूर पानी मिलेगा. प्रथम चरण में ओंकारेश्वर परियोजना से नर्मदा जल क्षिप्रा में प्रवाहित किया जायेगा. इससे उज्जैन, देवास सहित करीब ढ़ाई सौ गांवों को पेयजल उपलब्ध कराया जायेगा. साथ ही सिंहस्थ मेला, कृषि कार्य और उज्जैन, देवास व पीथमपुर के औद्योगिक क्षेत्रों को भी पानी मिलेगा. आगामी चरणों में नर्मदा के पानी को गंभीर, कालीसिंध और पार्वती आदि नदियों में भी डालने की योजना है. इससे मालवा के 70 नगरों और तीन हजार गांवों को पेयजल सहित 17 लाख एकड़ भूमि में सिंचाई और संपूर्ण मालवा के उद्योगों को जल की कोई कमी नहीं आने दी जायेगी. शासन से जारी प्रेस विज्ञप्ति में तो इस परियोजना के जरिये नर्मदा जल को इलाहाबाद की गंगा में मिलाने का दावा भी किया गया है!
परियोजना के पहले चरण में 432 करोड़ रुपये की लागत से 47 किलोमीटर लंबी पाइप लाइन के जरिये ओंकारेश्वर परियोजना के छोटे सिसलिया तालाब से पांच हजार लीटर प्रति सेकेंड की दर से 2250 किलो वाट के 18 बड़े पंपों के जरिये करीब हजार फुट की ऊंचाई पर बह रही क्षिप्रा के उद्गम उज्जनी गांव में पानी मिलाया गया है. नर्मदा नदी घाटी में है, क्षिप्रा उससे हजार फुट ऊपर मालवा के पठार पर. इतनी बड़ी जल राशि को इतने ऊपर चढ़ाने में करीब 28 मेगावाट बिजली  खर्च होती है. साफ शब्दों में कहें तो रोज करीब 15 से 16 लाख रुपये की बिजली खर्च हो रही है.
नीचे का पानी उठाकर ऊपर फेंकने वाली इस परियोजना में कई मूलभूत कमियां हैं. यह परियोजना गुजरात की नकल करने के प्रयास का नतीजा है. गुजरात में नर्मदा जल को सूखी साबरमती में डाला गया. लेकिन साबरमती में नर्मदा का पानी नहर के माध्यम से मिलाया गया था. नीचे से ऊपर नहीं चढ़ाया था. नर्मदा-क्षिप्रा परियोजना में चार पंपिंग स्टेशनों के जरिये पानी को 348 मीटर की ऊंचाई पर पहुंचाया जायेगा.
स्वाभाविक है 47 किलोमीटर लंबा जल पथ, चार चरणों की पंपिंग और कोई हजार फुट की ऊंचाई पर पहुंचने वाले पानी की मात्रा में भी भारी कमी आयेगी. सूखी बतायी गई क्षिप्रा और सूखे भूमिगत जल स्रोतों की प्यास बुझाने के बाद आम आदमी तक कितना पानी पहुंचेगा, यह वक्त के साथ पता चलेगा. इस पूरी प्रक्रिया में भारी मात्रा में बिजली की खपत भी होगी. नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण के अनुसार इस काम के लिए साढ़े सत्ताइस मेगावाट बिजली की जरूरत होगी. इतनी मात्रा में बिजली लेने पर साल 2012 की दर से 118.92 करोड़ रुपये प्रति वर्ष का खर्च आयेगा. यानी इस पानी की कीमत 24 रुपये प्रति हजार लीटर के आसपास होगी. यह सब भी तब जब इसमें इस परियोजना की 432 करोड़ रुपये की मूल लागत और ओंकारेश्वर परियोजना की लागत को नहीं जोड़ा गया है.
हमारे देश में शहरी क्षेत्र में दिये जाने वाले जल की अधिकतम कीमत आठ रुपये प्रति हजार लीटर है. मध्यप्रदेश में तो यह राशि दो रुपये प्रति हजार लीटर है. परियोजना प्रतिवेदन में यह स्पष्ट नहीं है कि बिजली बिल के भुगतान के लिए इतनी बड़ी राशि कहां से आयेगी. जाहिर है अंत में सब खर्च आम जनता को ही वहन करना पड़ेगा.
परियोजना के इस चरण से देवास, उज्जैन शहरों सहित 250 गांवों को पेयजल, कृषि, सिंचाई और उज्जैन, देवास, पीथमपुर औद्योगिक क्षेत्रों को जल देने के साथ भूमिगत जल स्रोतों के संवर्धन का लक्ष्य भी रखा गया है. योजनाकारों के अनुसार इन क्षेत्रों के लिए जल की आवश्यक मात्रा परियोजना से प्रस्तावित मात्रा से कई गुना ज्यादा है. यहां जल की वर्तमान खपत का आंकड़ा देखें तो यह मात्रा ऊंट के मुंह में जीरे के समान है. यह जीरा भी बहुत ही महंगा होगा. परियोजना में यह भी ठीक से नहीं बताया गया है कि जो स्थान क्षिप्रा नदी से दूर बसे हैं वहां तक कैसे पानी जायेगा. यह सब खर्च में खर्च जुड़ने जैसी अव्यवहारिक योजनाएं हैं. 
(लेखक इंजीनियर हैं और पानी के प्रश्नों पर लिखते हैं. साभार- गांधी मार्ग)
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