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मीडिया में धूमते चेहरे

सुधा सदानंद

एक वक़्त था जब हिंदी फिल्मों में चरित्र कलाकारों की अपनी एक अलग साख हुआ करती थी. लीला मिश्रा गावों की चुगलखोर और प्यारी मौसी की भूमिका में तो उसी गांव के कइयों का खून चूसने वाला बनिया कन्हैया लाल की अपनी खास भूमिका होती थी जो दूसरा कोई उस तरह से कर ही नहीं सकता था. उस दौर की फिल्मों में यह तय था, जैसे आज के टीवी चैनल्स में यह तय है की स्टूडियो में होनेवाली प्राइम टाइम चर्चा में कैसे चुन-चुन के सिर्फ उन्हीं लोगों को बुलाया जाये जो हर शुक्रवार को चैनल की रेटिंग्स बढ़ा सकें.
 
पिछले कुछ हफ़्तों से दादरी कांड सुर्ख़ियों में रहा, जिन लोगों ने ट्वीटर या दूसरे सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर ‘सेकुलर’ और ‘लेफ्ट लिबरल इडियट्स’ का खिताब अर्जित किया, वे छाती पीटते रह गये की देश की अखंडता को इससे भारी खतरा है. दूसरी तरफ ‘देश भक्तों’ का कहना था कि बड़े-बड़े देशों में ऐसी छोटी बातें हुआ करती हैं. शीना बोरा और इंद्राणी मुख़र्जी की ‘सत्यकथा’ और उसके कई नाटकीय रूपांतर के के बाद  टीवी चैनल्स को एक नया और दिलचस्प मुद्दा मिल गया भुनाने को. तवा गरम था, बस सही किस्म की रोटियां बनाने की देर थी. मिस्सी, तंदूरी या फिर बटर चपाती!
 
ये तो सभी जानते हैं कि देश और दिल्ली के जाने माने टीवी पत्रकार सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर तो छाये रहते हैं और वह भी ठीक अपने शो के एक या दो घंटे पहले, पर कुछ ने तो अपने ब्लॉग्स पर पॉजिटिव  कमेंट्स के चलते अपनी शख्सियत को नयी शक्ल दे डाली है. यदि आप ऐसे कुछ टीवी पत्रकारों से दिल्ली के प्रेस क्लब के धुएं में रूबरू हों, तो आप जानिएगा की मीर और मोमिन अभी भी दिल्ली के कूचों में रहा करते हैं! बात बात पर इंडिया यानी भारत की अखंडता का बखान और ‘इंडिया इज इन डेंजर’ का नारा लगाने वाले यह कहने से नहीं चूकते की यदि किसी शो पर उनके मुंह से किसी राजनेता के खिलाफ कुछ निकल जाये तो अगले एक मिनट में नेताजी का फ़ोन आना शुरू हो जाता है कि भाई ऐसा तो न कहें. चलिए कल चाय पीते हैं. लेकिन पत्रकार प्रेस कल्ब में अपने प्रशंसकों से घिरे यह साफ़ किये देते हैं की वे अपना काम कर रहे है. और हिंदुत्व का चोगा पहने नेताओं को वह अछूत मानते हैं!
 
लेकिन हर शाम और हर रात यही नेता और बुद्दिजीवी आपको उन्हीं चैनल्स पर चीखते चिलाते नज़र आयेंगे. आप अपना सर खुजाते रहिये की कल शाम ही तो इस होनहार पत्रकार ने इन साहब को हिंदू फंडामेंटलिस्ट कह कर मुंह बिचकाया था और आज वही साहब स्टूडियो की चेयर पर उछल-उछाल कर अल्पसंख्यकों  को गालियां दे रहें हैं! इसका बेहतरीन उद्धरण था पिछले हफ्ते जब डॉ सुब्रमण्यम स्वामी ने    ने दादरी कांड की चर्चा पर साफ़ तौर पर कहा कि लेकिन यह एक हिंदू राष्ट्र है. हॉर्व़ड में पढ़ते वक़्त, जवान, हैंडसम स्वामी जब अपनी उस वक़्त की गर्लफ्रेंड रोक्सेन  से मिले होंगे तो शायद इंडिया का हिंदू होना उन्हें याद न रहा हो क्योंकि मुहब्बत में तो बड़े-बड़े निकम्मे हो जाया करते हैं! रॉक्सेन पारसी हैं और पेशे से लॉयर. मुझे इस बात से आश्चर्य नहीं होता की स्वामी ऐसी ओछी और असंवैधानिक बातें कितनी सरलता से कह देते हैं. आखिर वे अपना राजधर्म बखूबी निभा रहे हैं या फिर उनकी बीवी को कैसे अपने हिंदू पति से अपने पारसी होने पर शायद माफ़ी मांगनी पढ़ती हो या फिर उनकी पत्रकार बेटी (जिन्होने धर्म से बाहर शादी की) को अपने पिता के बयानों से तकलीफ होती हो. खैर यह सब डॉ स्वामी का निजी मामला है और हॉर्वड से तालीमयाफ्ता सुब्रमण्यम शायद दूसरों क धर्म, खान पान और पहनावे पर लाख टिप्पणियां करतें हों, पर हम में से कईयों को ऐसा कहने पर न तो टीवी चैनल्स ना सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर बने रहना का सौभाग्य प्राप्त होगा.
योगी आदित्यनाथ, प्राची, प्रवीण तोगड़िया, संगीत सोम संविधान, पुलिस और सरकार से सर्वोपरि, हिंदू धर्म और गौ माता के रक्षकों के नाम आज बच्चे-बच्चे की जुबां पर है. यह वह लोग हैं जो भयभीत हिंदुओं को आश्वस्त करते हैं कि भारत जैसे हिंदू राष्ट्र की कमान न सिर्फ उनके हाथों में है पर उनके रहते इस देश में किसी भी हिंदू का कोई बाल भी बंका नहीं कर पायेगा. यह स्वाभाविक है की दिन में हज़ारों बार ऐसे नेता टीवी एकंरों और चैनल मालिकों को कोटि-कोटि प्रणाम करते होंगे. कवि, साहित्यकार, पशु प्रेमी, शायर, पर्यावरणविद, और भारत की एकता के कई पहलुओं को अपना डीपी बनानेवाले टीवी एंकर और संपादक भले ही अपने ड्राइंग रूम में डॉ स्वामी या संगीत सोम की घोर निंदा करते हों, लेकिन यदि टीवी की हिंदुत्व गोष्ठी उन्हें अपना सर्वेसर्वा मानने से इनकार कर दे तो यह अन्याय होगा. हर चैनल पर फेरी लगाते हुए इन चेहरों को टीवी परफॉरमेंस में इतना महारथ हासिल हो गया है की कैमरा के शुरू होने की देरी नहीं की वह एंकर का ध्यान अपनी और आकर्षित कर लेते हैं. और फिर शुरू होती है एक झूठ-मूठ की लड़ाई. एक तरफ एंकर सियाचीन पर खड़े सैनिक का काम करता है तो हिंदुत्व के नुमाइंदे अपनी भारत माता को ‘कथित दुश्मनो’ से  बचाते फिरते हैं. हर चैनल पर वही चेहरे, वही मुद्दा और वही चर्चा. 
 
उन्नीसवीं शताब्दी के यूरोप में एक बार जब महिलाओं से यह पूछा गया कि क्या उन्हें अपने घर और शरीर पर अधिकार है या फिर यह उनके पतियों पर निर्भर है की उनके कितने बच्चे हो सकते हैं, तो बहुतों ने यह जवाब दिया की उनके पति यह तय करते हैं की वे कब मां बन सकती हैं. तब उन्हें एक सरल और छोटे सा शब्द सिखाया गया नो ! नो बोलने की आदत डाल लें.
यदि हमारे टीवी एंकर और संपादक भी डॉ स्वामी जैसे विद्वानों को न कहने की मंशा रखें, तो ब्लॉग्स और ट्वीटर के ज़रिये उन्हें घड़ी-घड़ी अपने लिबरल, सेक्युलर होने का प्रमाण नहीं देना पड़ेगा. लेकिन ये दोनो दुकाने कब बंद होंगी, ये तो बस खुदा ही जानता है .शुक्रवार के ताजा अंक में मीडिया कालम से 
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