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एक थे लोकबंधु राजनारायण
चंचल
... हस्बे जैल अर्ज कर दूं कि उनसे जो पहली मुलाक़ात हुई. वह पंद्रह मिनट अगर स्थायी हो गयी होती, तो यकीनन हम उनसे ताउम्र नफरत करते. लबे सड़क गरियाते और इसी के साथ समाजवाद के दायरे से बाहर हो गये होते. लेकिन वह पंद्रह मिनट का अंत इतना सुखदायी रहा कि हम आजीवन उनके मुरीद हो गये. साथ ही समाजवाद ऐसा चिपका कि जहां भी जाता हूं. समाजवाद हमसे पहले हमारी परछायी की तरह हमारे साथ, हमसे सटा खड़ा रहता है. समाजवादी आंदोलन के बिखराव के बाद, हम कांग्रेस में हैं. हमारा पहला परिचय दिया रहा था, - आप हैं फलाने, खांटी समाजवादी. कहकर भाई सलमान खुर्शीद अपनी कुर्सी पर बैठ गये और हम कांग्रेसी हो गये. अब बारी थी, चौथे स्तंभ की जिसे अंग्रेजी में मीडिया और मादरी जुबान में खबरची कहते हैं. उनके सवाल पर आऊं, उसके पहले इस खंभे के बारे में बताता चलूं. इस मुल्क में हर जड़ और चेतन दो हिस्से में बंटे हैं. ' ई ' और 'ऊ'. यह विभाजन स्वर्गीय जनेश्वर मिश्रा ने अपने जीते जी कर दिया था. हमारे जैसे उनके पुराने लोग उनसे मिलते थे. तो वे इंतजार करते थे कि 'ई' लोंगों को मिल कर निकल जाने दो. ई मतलब जो जाति, लोभ, और सत्ता की हनक से पार्टी के वफादार तो हो गये हैं. लेकिन मिजाज और मन से न तो समाजवादी हैं, न ही समजवाद इन्हें पचता है.  ‘ऊ’ लोग वे हैं जिन्होंने समाजवादी आंदोलन के लिए कम से कम अपनी जवानी तो दे ही दी. आज ओ कहीं भी रहें लेकिन उनका मन समाजवाद में ही अटका रहेगा. इसलिए जब सलमान भाई ने समाजवादी कहकर मिलवाया तो पत्रकारों का ' ई' वाला हिस्सा जोर से लपका.
 पहला सवाल - आपने कांग्रेस क्यों ज्वाइन किया ? 
क्यों कि यहां इस मुल्क में हूल की कोई संभावना नहीं है.
यह हूल क्या होता है?
यह झारखंड में पाया जाता है,
आप सीधे जवाब नहीं दे रहे हैं, 
आप सीधी बात समझना बंद कर चुके हैं. कांग्रेस हमारा घर है, हमारे पुरखों का घर है. डॉ लोहिया, जेपी, आचार्य नरेंद्र देव, मीनू मसानी, अरुणा आसिफ अली, डॉ संपूर्णानंद, कमलापति त्रिपाठी और तो और पंडित जवाहर लाल नेहरु समाजवादियों के नेता रहे हैं. हम हडबड़ी में थे कि क्रांति करेंगे घर छोड़ कर चले गये. क्रांति नहीं हुई हम बिखर गये तो एक एक करके अपने घर वापस आ रहे हैं. बस इतनी सी बात है. 
   लेकिन आपके नेता डॉ लोहिया ने गैर कांग्रेसवाद का नारा दिया और 67 में सात प्रांतों से कांग्रेस को सत्ता से बाहर कर दिया ?
- घर का मुखिया अगर मनमानी करने लगे तो आप क्या करेंगे ? जो आप करेंगे डॉ लोहिया ने वही किया था. कांग्रेस एकाधिकार की तरफ बढ़ रही थी कि उसे सत्ता से कोई बाहर नहीं कर सकता. डॉ लोहिया ने कांग्रेस का कान पकड़ कर दिखा दिया कि इस तरह बाहर जा सकते हो. समाजवाद की मंशा कभी भी यह नहीं रही कि कांग्रेस समाप्त हो जाये. समाजवादी आंदोलन कांग्रेस का परिमार्जन करती रही है. गैर कांग्रेसवाद का नतीजा था दो साल बाद 69 में नेकीरामनगर कांग्रेस में समाजवाद का प्रस्ताव आया 54 में जेपी ने कांग्रेस से जो मांग की थी कि इसे मान लो हम कांग्रेस में वापस आ जायंगे. उसे इंदिरा गांधी ने जस का तस मान लिया. नतीजा? गांधी को कांग्रेस से बाहर कर दिया गया. जो साथ में निकाले गये और जिन्हें युवा तुर्क कहा गया सब समाजवादी थे,  यह है परिमार्जन. कालांतर में एक बार फिर कांग्रेस एकाधिकार की तरफ बढ़ी जेपी ने रोका. कथा आपको मालूम है. लेकिन उसका वह हिस्सा सुन लीजिये जो परिमार्जन की पुष्टि करता है. आपातकाल के बाद हुए चुनाव में कांग्रेस को करारी हार मिली थी. उधर जनता पार्टी की सरकार शपथ ले रही थी.  इधर जेपी इंदिरा गांधी के घर पर थे, दोनों एक दूसरे मिले. इंदिरा गांधी ने जेपी के कंधे पर सर रख कर रो दिया. जेपी अपने को नहीं रोक पाये. रोने लगे और इतना ही कहा था - धैर्य रखो इंदु. सब ठीक होगा और दो साल में सब ठीक हो गया. वही इंदिरा गांधी दो तिहाई बहुमत से सत्ता में आयीं. उस जनता पार्टी की सरकार को तोड़ने में किसकी भूमिका रही ? खोजिये तब तक हम पान खा लें. अब यह मत पूछियेगा कि हमारे साथ नेता राजनारायण जी ने कितना बवाल किया था, जब हमने उनके लिये मंगाये गये मुर्गे को खा लिया था. लेकिन अंत में जो प्यार नेता ने दिया वह धरोहर है.  शुक्रवार के बतकही कालम में चंचल 
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