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संगम के अखाड़े में लेफ्ट-राइट

रामेंद्र जनवार

लखनऊ / इलाहाबाद.उत्तर प्रदेश में पिछले काफी समय से छात्र आंदोलनों के नाम पर परिसरों में सन्नाटा नजर आ रहा था और अधिकांश छात्रसंघ चुनाव स्थगित थे. परंतु केंद्र में भाजपा सरकार के आते ही शैक्षणिक परिसरों के भगवाकरण की प्रक्रिया शुरू हुई और इसके प्रतिक्रिया स्वरूप प्रदेश में तमाम प्रगतिशील और समाजवादी युवा अचानक राजनीतिक सक्रियता दिखाने लगे. नतीजा यह कि परिसरों में छात्र आंदोलन की चिंगारी दोबारा सुलगती नजर आ रही है.
इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्र संघ की पहली निर्वाचित महिला अध्यक्ष ऋचा सिंह के पद संभालने के बाद से ही कांग्रेस सहित समाजवादी और वामपंथी छात्र संगठन यहां लामबंद होते नजर आ रहे हैं. कुछ दिन पहले इलाहाबाद विवि के ही एक कार्यक्रम मेंं भाजपा सांसद योगी आदित्यनाथ को विद्यार्थी परिषद और विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा बतौर मुख्य अतिथि बुलाये जाने पर छात्र संघ और प्रगतिशील संगठनों ने जमकर विरोध किया था. नतीजे में कार्यक्रम रद्द करना पड़ा था.
करीब 10 दिन पहले समाजवादी रुझान वाले मैगसेसे पुरस्कार विजेता संदीप पांडेय को बीएचयू के अतिथि प्राध्यापक पद से हटा दिया गया. कुलपति के इस निर्णय के बाद विश्वविद्यालय के छात्रों में विरोध की आंच सुलग उठी. इलाहाबाद विवि की छात्र संघ अध्यक्ष ऋचा सिंह ने एक बार फिर पहल की और इस मसले पर एक प्रदेशस्तरीय छात्र युवा सम्मेलन फरवरी में इलाहाबाद में करवाने का मन बनाया. इसी बीच 20 जनवरी को एक सेमीनार का आयोजन पहले से तय था जिसमें वरिष्ठ पत्रकार एवं चिंतक सिद्धार्थ वरदराजन को मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित किया गया था. विश्वविद्यालय के कुलपति ने सीनेट हाल में यह कार्यक्रम कराने की पूर्व अनुमति भी दे दी थी. लेकिन योगी आदित्यनाथ के कार्यक्रम के निरस्त होने से खार खाये बैठी भगवा ब्रिगेड ने दबाव बनाकर अंतिम समय में सीनेट हाल की अनुमति निरस्त करवा दी. छात्र संघ सभागार में विद्यार्थी परिषद पहले से कब्जा जमाये बैठी थी. आखिरकार आयोजकों ने वरदराजन का व्याख्यान विश्वविद्यालय गेट के बााहर स्वराज विद्यापीठ सभागार में किया.
कार्यक्रम के बाद जब छात्रों का प्रतिनिधिमंडल इस विषय में बात करने कुलपति के पास पहुंचा तो विद्यार्थी परिषद के समर्थकों ने बाहर गालीगलौज करनी शुरू कर दी. पुलिस को आकर प्रतिनिधिमंडल को सुरक्षित निकालना पड़ा. भगवा ब्रिगेड की ऐसी हरकतों के चलते परिसरों में माहौल दिन पर दिन खराब होता जा रहा है. ऐसे में कहा जा सकता है कि वर्ष 1973-74 के छात्र आंदोलन की पृष्ठभूमि पुन: तैयार होती नजर आ रही है. कहीं ऐसा न हो कि छात्र दोबारा सडक़ों पर उतरकर सत्ता परिवर्तन की निर्णायक लड़ायी लडऩे पर उतारू हो जायें.
 
 
संगम के अखाड़े में लेफ्ट-राइट
आलोक सिंह 
इलाहाबाद .कुछ समय पहले ही सरकार के एक वरिष्ठ मंत्री ने स्वदेशी समर्थकों से बातचीत में कड़वे लहजे में कहा आप लोग राइट या लेफ्ट .  इस सतही समझ का संदेश साफ़ था कि लेफ्ट-राइट के आलावा और कोई राजनितिक धरातल नहीं है . ऐसे ही राजनितिक माहौल के दो पाटों के बीच पिस रहा इलाहाबाद विश्वविद्यालय ताजातरीन उदाहरण है .
 अतीत में राजनीति में नई धारा पैदा करने वाली विश्वविद्यालय, आज ठीक उल्टा संकीर्ण राजनीति के लेफ्ट-राइट में उलझ गया है . 20 नवंबर से 20 जनवरी तक होने वाली घटना इसी का परिणाम है . 20 नवंबर को छात्र संघ के उद्घाटन सामारोह में आ रहे सांसद आदित्यनाथ, छात्र संघ की अध्यक्ष ऋचा सिंह के विरोध के कारण नहीं आ सके . उन्होंने ने आदित्यनाथ को साम्प्रदायिक व्यक्ति कहा . तो उसके जबाब में 20 जनवरी को ऋचा सिंह के पहल पर हो रही संगोष्ठी में वरिष्ठ पत्रकार सिद्धार्थ वरदराजन के आने का विरोध छात्र संघ के अन्य पदाधिकारियों ने किया . तमाम उठापटक के बाद कुलपति ने इस आयोजन को रद्द कर दिया . विरोध करने छात्र संघ के पदाधिकारियों ने वरदराजन को राष्ट्र विरोधी और नक्सल से जुड़ा हुआ बताया . यह सब वही तर्क है और सतही समझ का हिस्सा है जो परिसर के बाहर राजनीति का है . जिसमें राइट का मतलब साम्प्रदायिकता और लेफ्ट राष्ट्र विरोधी और नक्सली है .
कुछ दिन जब इसी तरह के बेतुके आधार पर संदीप पाण्डेय को बीएचयू से बाहर कर दिया गया . अब वरदराजन राष्ट्र विरोधी और नक्सली . सत्ता की ताकत में मदमस्त लोगों का संदेश साफ़ है की आप हमारे साथ नहीं है हैं तो हमारे दुश्मन हैं . यही संदेश अमेरिका का पुरी दुनिया के लिए भी है . तो दूर कंही कुछ पक रहा है . यह मामला तब और गंभीर हो जाता जब गंगा के किनारे बसे दोनों केंद्रीय विश्वविद्यालय है .
राजनीति का ककहरा सिखानेवाला इलाहाबाद विश्वविद्यालय और बीएचयू  जैसे केन्द्रों पर इतनी राजनीतिक असहिष्णुता देश-समाज में गहरा अंधेरा ही पैदा करेगा . अच्छा यही होगा की जितनी जल्दी हो खुले दिल-दिमाग, आपसी बातचीत से संगम बनाने की कोशिश करे . सत्ता की राजनीति के साज़िशों के मोहरे न बनकर , नौजवानों को राजनीति की नई धारा को पैदा करना होगा .    
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