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आखिरी पड़ाव गोमोह जंक्शन

अभिषेक रंजन सिंह

गया. आसनसोल रेलखंड पर एक गोमोह रेलवे स्टेशन है. हालांकि इसका नाम अब नेताजी सुभाषचंद्र बोस गोमोह जंक्शन है. रात करीब नौ बजे मेरी ट्रेन इस स्टेशन पर रूकी. कुछ तकनीकि खामियों की वजह से इस स्टेशन पर ट्रेन करीब पौने घंटे रूकी रही. चाय की तलाश में मैं डब्बे से उतरकर प्लेटफार्म की ओर बढ़ा. प्रमोद नामक एक चाय विक्रेता के यहां लंबी भीड़ लगी थी. अपनी बारी आने तक मैं गोमोह स्टेशन और नेताजी के बारे में सोच रहा था. एकबारगी यह ख्याल आया कि शायद बंगाल से नजदीक होने की वजह से इसका नाम नेताजी सुभाषचंद्र बोस जंक्शन रखा गया है. मुझे चाय का कुल्हड़ थमाते हुए प्रमोद ने बगैर पूछे कहा, “नेताजी सुभाषचंद्र बोस अंतिम बार इसी स्टेशन से ट्रेन पकड़कर पंजाब गये थे. “उसकी बात सुनकर मेरी जिज्ञासा बढ़ गयी और मैं मन ही मन यह कामना करने लगा कि ट्रेन कुछ देर और इसी तरह खड़ी रहे. चाय बनाते और बेचते हुए भी प्रमोद मेरे सवालों का जवाब देता रहा. उसके मुताबिक, जब नेताजी यहां आये थे. उस वक्त धनबाद ही जिला था. बोकारो और गोमोह तो बाद में जिला बना. प्रमोद ने मुझसे पूछा, कालका मेल का नाम तो आपने सुना होगा, मैंने कहां हां. उसके बाद उसने कहा 1941 में इसी स्टेशन से कालका मेल पकड़कर नेताजी पठानकोट गये थे.
नेताजी सुभाषचंद्र बोस और धनबाद का रिश्ता महज एक कहानी नहीं, बल्कि एक संस्मरणात्मक हकीकत है. कोयलांचल के इसी धनबाद में उन्होंने देश की पहली रजिस्टर्ड ट्रेड यूनियन की शुरूआत की थी. इस ट्रेड यूनियन के अध्यक्ष स्वयं नेताजी थे. इस पद पर रहते हुए उन्होंने मजदूरों के अधिकारों की लड़ाई लड़ी. भारत से विदा होने से पहले वह आखिरी बार धनबाद आये और कुछ समय यहां रहने के बाद इसी गोमोह स्टेशन से पठानकोट के लिए रवाना हुए.
यहां के लोग आज भी नेताजी को याद करते हैं और उन्हें गर्व है कि वह आखिरी बार यहां आये थे. रेलवे स्टेशन पर अखबार विक्रेता महेश कुमार बताते हैं, ‘गोमोह ही वह जगह है, जहां नेता जी सुभाष चंद्र बोस अज्ञातवास में कुछ पल बिताये थे. आज यह राष्ट्रीय धरोहर के रूप में लोगों को नेता जी की याद दिलाती है’. साल 1930 में देश की पहली रजिस्टर्ड ट्रेड यूनियन "कोल माइनर्स टाटा कोलियरी मजदूर संगठन" की भी स्थापना नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने की थी. उस वक्त नेताजी के भतीजे अशोक बोस झरिया के बरारी कोलियरी में केमिकल इंजीनियर के पद पर कार्यरत थे. अक्सर नेताजी यहां आकर रुका करते थे और मजदूरों को अपने अधिकारों के प्रति जागरूक करते थे. जब अंग्रेजो ने नेताजी को नजरबंद किया था, उस दौरान वह कलकत्ता स्थित अपने आवास से जियाउद्दीन खान नामक पठान का वेश धारण कर जनवरी 1941 को गोमोह आये थे. कोयलांचल में उन दिनों अंग्रेजों की सक्रियता कुछ ज्यादा थी. 17 जनवरी 1941 की मध्य रात्रि को अपनी वंडर कार से नेताजी अपने भतीजे डॉ शिशिर बोस और अपनी पत्नी के साथ धनबाद के गोमोह पहुंचे. जहां उन्होंने अंग्रेजों से भाग कर गोमो स्थित हटियाटांड के आजाद हिंद स्कूल के पीछे घने जंगल में छिपे रहे. वहीं उन्होंने गोमोह के स्वतंत्रता सेनानी अलीजान और वकील चिरंजीव बाबू के साथ एक गुप्त बैठक की थी.
बैठक के बाद स्वतंत्रता सेनानियों ने गोमोह के ही लोको बाजार स्थित कबीलाई लोगों ने अपने घर में उन्हें छुपने का आश्रय दिया. रात भर नेताजी सुभाष चंद्र बोस उसी कबीलाई के घर में छिपे रहे. दूसरे दिन 18 जनवरी 1941 की रात उनके साथियों ने उन्हें इसी गोमोह स्टेशन से कालका मेल से पठान कोट के लिए रवाना किया. जहां से वे काबुल गये और उसके बाद वे जापान चले गये. अंतिम बार भारत में इसी गोमोह रेल जंक्शन से रेल यात्रा करने की वजह से रेल मंत्रालय ने साल 2009 में इस स्टेशन का नाम "नेताजी सुभाष चंद्र बोस गोमोह" कर दिया गया. धनबाद का गोमोह रेल जंक्शन जिसे अब लोग "नेताजी सुभाष चंद्र बोस गोमोह" के नाम से जानते है.
 
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