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मेरठ के बांके!

शंभूनाथ शुक्ल

दिल्ली से कुल साठ किमी दूर है मेरठ पर दिल्ली का तनिक भी असर नहीं है। मैं करीब डेढ़ साल मेरठ रहा और इस दौरान मुझे कहीं भी वहां टोंड दूध नहीं मिला न ही बिना चीनी की चाय। कहने को वहां जिम भी हैं और लंबे-चौड़े पार्क भी जहां सुबह-सुबह वाक करने वालों की भीड़ उमड़ पड़ती है पर जिम वाले पास के सब वे का नाश्ता दबाए जिम करते हैं और वाक करने वाले वाक के फौरन बाद शास्त्री नगर में रामचंद्र सहाय की दूकान में जाकर रेवड़ी गटकने लगते हैं या रोहिताश के यहां पनीर पकौड़ा। यहां सकरी गलियां और उनसे भी ज्यादा सकरे घर हैं लेकिन रहने वालों के दिल सकरे तो नहीं ही हैं। सबसे मजेदार बात जो मुझे यहां लगी कि इस शहर के बीच में एक सुकुल चौपाल है। बताया गया कि यहां के ज्यातिषी और पूजा-पाठ कराने वाले गौड़ लोग सुकुल कहलाते थे और वे बस या तो पुरोहिताई करते अथवा पहलवानी। इस चौपाल में उनकी बैठकें होतीं तथा सुकुल लोग कुश्ती लड़ा करते। मगर इससे भी बड़ी मजेदार बात यह पता चली कि 1947 के बटवारे के बाद जब पंजाबी रिफ्यूजी यहां आए तो मेरठ के अंसारियों व कुरेशियों की संपत्ति देखकर उनका मन ललचाने लगा और उन्होंने नारा लगा दिया कि हिंदुस्तान हिंदुओं का, मुल्लो पाकिस्तान जाओ। तब ये सुकुल लोग पहाड़ की तरह अड़ गए नहीं यहां के मुसलमान पाकिस्तान नहीं जाएंगे। देखें कौन माई का लाल उन्हें पाकिस्तान भेजता है। उनकी बहादुरी का ही कमाल था कि पंजाबी रिफ्यूजी यहां बसे तो पर शहर से दूर रहे और एक भी मेरठी पाकिस्तान नहीं गया।
मेरठ के नादिर अली बैंड वाले और इस्माइल मेरठी यहां की मुख्य हस्तियां रही हैं। अंग्रेजों के वक्त में नादिर अली बैंड वालों का बड़ा नाम था और कहा जाता था कि अंग्रेज लाट भी नादिर अली को याद करते थे। मेरठ शहर के बीच में दिल्ली रोड पर बनी उनकी जली कोठी बेमिसाल है। इस्माइल मेरठी की गिनती यहां के बड़े शायरों में होती थी। प्यारेलाल शर्मा के नाम पर आज भले महज एक अस्पताल बना हो पर प्यारेलाल शर्मा कांग्रेस के बड़े नेता थे और फ्रीडम फाइटर भी। शिखरचंद जैन की मिलों की टूटी इमारतें आज भी जैनियों के वैभव की याद दिलाती हैं। मेरठ में जैनियों का मोहल्ला जैन नगर बेमिसाल है। घंटाघर, सुभाष बाजार, बुढ़ाना गेट और सिहानी गेट में पान की दूकानों तथा हेयर कटिंग सैलून पर आपको घंटों इंतजार करना पड़ सकता है इसलिए नहीं कि उसके पास ग्राहक बहुत थे बल्कि इसलिए क्योंकि पनवाड़ी और नाई दोनों पोलेटिकल चर्चा में मशगूल थे। मेरठ शहर और मेरठ जिला दोनों अलग-अलग हैं। शहर का गांव से संबंध बस इतना ही रहा है कि गांव वाले अपने जिन्स लेकर शहर आते। गुड़, गन्ना, गन्ने का रस और सरसों व गेहूं तथा मक्का। मेरठ शहर जाना जाता रहा हैंडलूम और सीजर्स इंडस्ट्री के लिए और इन दोनों ही चीजों का यहां के गांव वालों का कोई संबंध नहीं। कपास यहां पैदा नहीं की जाती और सीजर्स का गांव में मार्केट नहीं। बाद में पंजाबियों के आने के बाद पेशावर और लाहौर का स्पोर्ट्स उद्योग यहां आया पर उसका भी स्थानीय गांवों से कोई ताल्लुक नहीं।
जो लोग मेरठ को चौधरी चरण सिंह के जाट साम्राज्य का हिस्सा समझते हैं वे मुंह धो रखें। मेरठ की पहचान कुरेशी, अंसारी और तगा मुसलमान हैं, जैन हैं और अग्गरवाले बनिये हैं, ब्राह्मणों में गौड़ हैं, गौतम हैं और मेरठ शहर में उनकी ही धाक रही है। फैजेआम इंटर कालेज यहां का सबसे पुराना कालेज है। इसके बाद मेरठ कालेज खुला और फिर देवनागरी कालेज। गद्दी, सैफी व उस्मानी हैं। सबके अपने-अपने टैबू और अपने-अपने ठिकाने हैं। इसलिए मेरठ राजधानी का सबसे करीबी बड़ा शहर होने के बावजूद दिल्ली नहीं बन पाया। पैसा यहां खूब है पर पैसे के इन्वेस्टर नहीं हैं। यह मेरठ का ही कमाल है कि हमारे मित्र अनिल बंसल ने नौकरी तो की जनसत्ता दिल्ली की लेकिन रहे सदैव मेरठ में। चाहे रात के दो बज जाएं अनिल बंसल ने सुबह दिल्ली की नहीं गुजारी। तब भी जब मेरठ जाने का अकेला साधन बसें थीं और आज भी जब वे इनोवा कार से आते-जाते हैं। मेरठ की बोली ही खड़ी बोली हिंदी का मानक है। हालांकि यहां की हिंदी में उर्दू की कड़क है और पारसी की मिठास भी। मेरठ में आदमी एक साथ आपका पूरा सम्मान करते हुए ‘सरजी’ बोलेगा मगर संबोधन तुम का ही देगा। यहां मां को भी तू कहा जाता है और बाप से कड़क कर पूछा जाता है “के गया था?”
मेरठ की मिठास शायद यहां के गन्ने से जुड़ी हुई है। मेरठ में गन्ना कस कर होता है। जरा-सा भी दूर निकले तो बस गन्ने के खेत नजर आने लगेंगे। गन्ना पूरे साल की खबर है इसलिए गन्ना बोने के बाद कटने तक किसान बस बैठक करता है, राजनीति करता है और चौपाल सजाता है। यही कारण है कि यहां के किसानों का आवाहन कर दो वे फौरन दिल्ली घेर लेंगे मगर जैसे ही कटाई का वक्त आया उसे लौटते देर नहीं लगेगी। यह मेरठ की सिफत है। खाली हो तो चौपाल करो और वक्त पर फिर खेतों में लौट आओ। इसीलिए यहां के बारे में कहा जाता है कि मेरठ में राजनीति पर बतिया तो सकते हो मगर मेरठ के बूते राजनीति कर नहीं सकते। यही कारण है कि दिल्ली के इतना करीब होते हुए भी मेरठ मेरठ ही बना रहा वह दिल्ली नहीं बन सका।
 
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