ताजा खबर
बागियों को शह देते मुलायम गैर भाजपावाद की नई पहल दम तोड़ रही है नैनी झील अखिलेश पर दबाव बढ़ा रहें है मुलायम
भगतों की चांदी है

शंभूनाथ शुक्ल

आजकल भगतों की चांदी है. भले वे मोदी भगत भाजपाई हों या मोदी विरोधी भाजपाई अथवा केजरी भगत या कन्हैया के भगत. आप जब तक भगत नहीं बनते कहीं भी टिक नहीं सकते. चाहे वह वर्चुअल मीडिया हो या मेनस्ट्रीम मीडिया। आपको अपनी ईष्ट का गुणगान करना ही पड़ेगा और इतना अधिक कि आपका ईष्ट वाकई में अलौकिक प्रतीत होने लगे. ईष्ट को भी यही पसंद है और जनता को भी भगत बनना ही पसंद है. भगत भीड़ बढ़ाते हैं और भीड़ से वोट मिलते हैं. हर भगत दूसरे के भगत को भ्रमित और कुंठित बताता है पर सत्य यह है कि भगत संप्रदाय का आतंक इस कदर है कि बिना इस संप्रदाय में दीक्षित हुए आप अपने को बचाए रख पाएंगे, इस पर शक है. आप भगत हैं तो हर जगह और मौके आपके लिए खुले हैं. भगतों के लिए हर चैनल, हर अखबार अपने दरवाजे खोले रखता है और मंत्री, सांसद व विधायक गण भी. राजनीति में ऐसी भगतगिरी पहली बार देखी गई है. बाज दफे तो लगता है कि भगतगिरी भाँड़गिरी बनती जा रही है.

भगतों ने ऐसा घटाटोप मचा रखा है कि यह तय करना मुश्किल होता जा रहा है कि सच क्या है. मोदी भगत कहते हैं कि जब से मोदी आए भारत का नाम दुनिया में सबसे ऊपर हो गया इतना ज्यादा कि अमेरिका व योरोप आज भारत से घबराने लगे हैं. जबकि हकीकत यह है कि पाकिस्तान में बैठे आतंकी पठानकोट करा देते हैं और प्रधानमंत्री मोदी नवाजशरीफ की दावत उड़ाने में तल्लीन रहते हैं. दूसरे भगतों का कहना है कि मोदी ने कुछ नहीं किया सिवाय अपने लिए सूट सिलवाने के और दुनिया-जहान घूमने के. केजरी भगतों का दावा है कि केजरी ने चार साल के राजनैतिक कैरियर में वह कर दिखाया जो आजादी के बाद से आज तक न तो कांग्रेस सरकारें कर पाईं न विपक्ष की. यहां तक कि वे केजरी को आम आदमी का मसीहा बताने में गुरेज नहीं करते. और कहते हैं कि केजरी ने दिल्ली की तस्वीर बदल दी. दूसरी तरफ सच यह है कि दिल्ली की तस्वीर तो बदली है इस मायने में कि दिल्ली में न तो सड़कें बची हैं न फुटपाथ और न ही बिजली न पानी.

तीसरी तरफ हैं कन्हैया के भगत जिसे उनके अनुयायी कृष्ण से भी बड़ा मसीहा और जेपी से बड़ा छात्र आंदोलन खड़ा करने वाला बताते हैं. जबकि कन्हैया की गिरफ्तारी  देशद्रोह के आरोप और जवाहर लाल नेहरू यूनीवर्सिटी मे आपत्तिजनक नारे लगाने के चलते हुई थी. जो कन्हैया कभी तो अपने को हर पीडि़त मानवता के विरुद्घ खड़ा होने का दावा करता है वह जेल से आते ही खुद को उन सारे छात्रों से अलग कर लेता है जो उसके साथ नारे लगा रहे थे. और अचानक वह फौजयों, पुलिसियों का खैरख्वाह बन जाता है. जिस कन्हैया की लाइन तक तय नहीं है वह किस आधार पर पूरे देश के छात्रों का नेता बन गया.

जाहिर है ये भगत किसको आसमान पर चढ़ा देंगे और किसे अचानक जमीन पर ला पटकेंगे कुछ पता नहीं चलता. मगर मजा देखिए कि भगतों की ही चांदी है. हर भगत परस्पर एक-दूसरे के ईष्ट की निंदा भले करे मगर भगत संप्रदाय को लेकर बड़ा सचेत रहता है. उसकी यह इच्छा बलवती रहती है कि भगतों का संकट न पडऩे पाए इसलिए वह अन्य संप्रदाय के भगतों को फौरन चिन्हित कर देता है. जरा भी आपने उसके ईष्ट की गल्तियों को पकड़ा नहीं कि फौरन भगत फतवा दे देगा कि वह तो अमुक का भगत है. यानी आप निष्पक्ष नहीं हैं या तो एक्स के भगत हैं या वाई के और इसी के आधार पर आपकी उपयोगिता साबित की जाएगी.शुक्रवार के बतकही कालम से 

 

email ईमेल करें Print प्रिंट संस्करण
  • जहां पत्रकारिता एक आदर्श है
  • जहां आये कामयाब आये
  • नामवर की नियति
  • चिड़िया ते बाज तुड़वाऊं?
  • प्रभाष जोशी और इंडियन एक्सप्रेस परिवार
  • एक ऋषि की यात्रा का अंत
  • असली मैदान तो यूपी बनेगा
  • राजकाज
  • मेरठ के बांके!
  • बाबरी विध्वंस की आयी याद
  • इतिहास में उपेक्षित तिलका मांझी
  • आखिरी पड़ाव गोमोह जंक्शन
  • संगम के अखाड़े में लेफ्ट-राइट
  • एक थे लोकबंधु राजनारायण
  • अपनी जमीन ही नसीब हुई
  • रवीश के सामाजिक सरोकार
  • गिरोह क्यों कहते हैं
  • ई राजेंद्र चौधरी कौन है ?
  • मीडिया में धूमते चेहरे
  • क्षिप्रा-नर्मदा जोड़-तोड़
  • Post your comments
    Copyright @ 2016 All Right Reserved By Janadesh
    Designed and Maintened by eMag Technologies Pvt. Ltd.