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राजकाज

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किस्मत के मारे, बुजुर्ग बेचारे
इसे महज संयोग कहा जाये या पूर्व के कर्मों का फल कि हिमाचल प्रदेश के नेताओं का बुढ़ापा बहुत कष्टदायक साबित होता आया है. बेचारे सुखराम इस उम्र में भी अदालत के चक्कर काट रहे हैं. उन्हें टेलीकाम घोटाले में सजा हो चुकी है. जिसे उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी हुई है. न्यायिक व्यवस्था के चलते अभी तक पूरे मामले की सुनवाई ही नहीं हो पायी है. इसलिए जेल की सजा से बचे हुए हैं. राज्य में भाजपा के सबसे बड़े और बुजुर्ग नेता शांता कुमार को नरेंद्र मोदी ने बरफ में लगा रखा है. बिना केाई जिम्मेदारी दिए हुए घर बैठा दिया है. वे कभी कभार अपना दुख साझा करने के लिए जरुर लाल कृष्ण आडवाणी के घर हो आते हैं. अब मौजूदा मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह पर भी गिरफ्तारी का साया मंडरा रहा है. हाल ही में प्रवर्तन निदेशालय ने दिल्ली में उनकी नौ करोड़ की संपत्ति जब्त की थी. आयकर कानून के तहत मामला पहले से ही चल रहा है. मुख्यमंत्री को जहां एक ओर अपनी गिरफ्तारी का डर है तो दूसरी ओर वे अपने ही दल के नेताओं से बेहद दुखी हैं. हिमाचल के कुछ कांग्रेसी नेताओं ने दिल्ली दरबार के चक्कर काटने शुरु कर दिये हैं. ताकि राजा की गिरफ्तारी की स्थिति में उनका ताज हासिल कर सके. इसलिए वे हाल ही में सोनिया गांधी से मिलने आये. उन्हें अंदर की कहानी सुनायी. हालांकि बाहर आकर बयान दिया कि केंद्र उनकी सरकार को गिराने की कोशिश कर रहा है. उनकी दिक्कत यह है कि पिछली बार तो सोनिया गांधी ने उन्हें मिलने का समय भी नहीं दिया था.
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इंदिरा स्टाइल में प्रचार
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने असम के प्रचार में एक नारा इंदिरा गांधी से लेकर शामिल किया है. उन्होंने पहली चुनावी रैली में कहा कि वे गरीबी से लड़ रहे हैं. गोगोई से नहीं. मोदी ने कहा मेरी लड़ायी गरीबी और भ्रष्टाचार से है, गोगोई से नहीं. उन्होंने इस नारे से गोगोई के इस प्रचार का जवाब दिया कि उनकी लड़ाई मोदी से है. मुख्यमंत्री तरूण गोगोई प्रचार शुरू होने के पहले से कह रहे हैं कि उनकी लड़ाई नरेंद्र मोदी से है. गौरतलब है कि 1971 में इंदिरा गांधी ने गरीबी हटाओ का नारा दिया था- मैं कहती हूं गरीबी हटाओ और विपक्ष कहता है इंदिरा हटाओ.
भाजपा के जानकार सूत्रों का कहना है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह इस बार बिहार वाली गलती नहीं दोहरा रहे हैं. दोनों नेता किसी हाल में अपने ऊपर फोकस नहीं बनने देना चाहते. दूसरी ओर गोगोई की कोशिश इन दोनों पर फोकस बनाने का है. वे बाहरी और हिंदी भाषी बनाम स्थानीय की लड़ाई बनाना चाहते हैं. इसलिए वे बार-बार मोदी को निशाना बना रहे हैं.
गोगोई का दूसरा मकसद अल्पसंख्यक वोटों को ध्रुवीकरण कराने का है. उन्हें बदरूरद्दीन अजमल की पार्टी से खतरा है. बीते चुनाव में अल्पसंख्यक वोट एकमुश्त अजमल की पार्टी को गये थे और हिंदू वोटों का ध्रुवीकरण कांग्रेस के पक्ष में हुआ था. इस बार भाजपा-अगप-बीपीएफ गठबंधन हिंदू वोटों का ज्यादा बड़ा दावेदार है. तभी गोगोई अल्पसंख्यक वोटों पर ज्यादा दांव लगा रहे हैं. इसलिए भी उनके निशाने पर मोदी हैं. मोदी और भाजपा नेतृत्व इस दांव को समझ रहा है. इसलिए वे भी अपने ऊपर फोकस नहीं बनने देना चाहते.
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अब होली की याद आयी
देश भर में चल रही राष्ट्रवाद की बहस के बीच कांग्रेस मुख्यालय में इस साल होली का त्योहार आयोजित किया गया. पत्रकार और पार्टी के नेता भी बड़ी देर तक यह पता लगाने की कोशिश करते रहे कि आखिरी बार कब किसी त्योहार का आयोजन कांग्रेस मुख्यालय में किया गया था.जिसमें कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और राहुल गांधी दोनों शामिल हुए थे. कोई पक्के तौर पर नहीं बता सका था.
कहा जा रहा है कि कांग्रेस के कई बड़े नेता इस बात से परेशान थे कि पार्टी के ऊपर हिंदू और देश विरोधी होने का लेवल लग रहा है. लोकसभा चुनाव के तुरंत बाद एके एंटनी ने यह मुद्दा उठाया था. जिसके बाद राहुल गांधी की छवि बदलने की खूब कोशिश हुई थी. तभी वे केदारनाथ गये थे और मथुरा के मंदिर में भी गये थे. एंटनी के सुझाव के बाद ही 2014 में पहली बार मध्य प्रदेश में कांग्रेस दफ्तर में गणपति की पूजा का आयोजन हुआ था.
माना जा रहा है कि होली का आयोजन उसी का विस्तार है. सोशल मीडिया में बीते कुछ समय से इस बात का प्रचार चल रहा था कि कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी, उपाध्यक्ष राहुल गांधी और प्रियंका गांधी क्यों कोई हिंदू त्योहार मनाते हुए नहीं दिखते हैं. कांग्रेस के जानकार सूत्रों का कहना है कि सोशल मीडिया के इस प्रचार और जेएनयू की घटना के बाद मीडिया में आयी खबरों और भाजपा के आक्रामक तेवर का जवाब देने के लिए होली का आयोजन हुआ. खुद सोनिया गांधी इसमें शामिल हुईं. कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मोतीलाल वोरा,मीडिया प्रमुख रणदीप सुरजेवाला, शीला दीक्षित का परिवार,अजय माकन आदि सब मौजूद रहे. कांग्रेस की सोशल मीडिया टीम ने भी इसका खूब प्रचार किया.
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यूपी में चुनाव लड़ने से कतराते कांग्रेसी नेता
उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के लिए चुनाव प्रबंधन का काम संभाल रहे प्रशांत किशोर की राह आसान नहीं दिख रही है. कांग्रेस के नेता उनकी हर योजना में फच्चर डालते दिख रहे हैं. पहले उन्होंने प्रियंका गांधी को प्रोजेक्ट करने की बात की, लेकिन कांग्रेस ने इसे लगभग खारिज कर दिया. उसके बाद वे चाहते हैं कि पार्टी के वरिष्ठ नेता, पूर्व केंद्रीय मंत्री और पूर्व सांसद विधानसभा का चुनाव लड़ें. लेकिन ऐसा लग रहा है कि पार्टी उनकी यह मांग भी पूरी तरह से मंजूर नहीं करेगी. इसका कारण यह है कि पार्टी के ज्यादातर बड़े नेता चुनाव नहीं लड़ना चाहते.
बीते दिनों एक टेलीविजन चैनल ने उत्तर प्रदेश की चुनावी संभावनाओं का एक सर्वेक्षण किया था. इस सर्वेक्षण में कांग्रेस को दहाई अंक में भी नहीं पहुंचने की संभावना जतायी गयी. इसके बाद से कांग्रेस के नेता और घबराये हैं. उनको लग रहा है कि पार्टी को बड़ा और चमत्कारिक चेहरा लेकर चुनाव में नहीं उतर रही है और अभी से चुनाव बसपा और भाजपा के बीच आमने-सामने के मुकाबले की तरह होता दिख रहा है.उसमें कांग्रेस अपनी क्या जगह बना पायेगी.
कांग्रेस के बड़े नेताओं में से वहीं चुनाव लड़ने को तैयार हैं, जो पहले से लड़ते रहेंगे. जैसे रीता बहुगुणा जोशी लड़ेंगी, लेकिन निर्मल खत्री चुनाव लड़ने को तैयार नहीं हैं. इसी तरह सलमान खुर्शीद चाहतें हैं कि उनको लड़ने के लिए नहीं कहा जाये. उनकी पत्नी लुईस खुर्शीद को ही टिकट मिले. आरपीएन सिंह अपनी पुरानी विधानसभा सीट से लड़ सकते हैं. लेकिन कहा जा रहा है कि जितिन प्रसाद चुनाव नहीं लड़ना चाहते हैं. बेनी प्रसाद वर्मा के बारे में अभी तय ही नहीं हो पा रहा है कि वे क्या करेंगे. बताया जा रहा है कि अगर राहुल गांधी कहें तो प्रदीप जैन चुनाव लड़ने को तैयार हो सकते हैं.
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सरकार का प्रचार पार्टी करेगी
नरेंद्र मोदी की सरकार के दो साल पूरे करने पर उसकी उपलब्धियों का प्रचार करने के लिए पार्टी एक टीम बना रही है. भाजपा के विरोधी उस पर आरोप लगाते हैं कि वह प्रचार में बहुत आगे रहती है. कई बार राहुल गांधी भी कह चुके हैं कि भाजपा के लोग प्रचार और जनसंपर्क में बहुत सक्षम हैं,जबकि कांग्रेस अपने कामों का प्रचार नहीं कर पाती है.
इसके उलट प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का मानना है कि उनकी पार्टी और उनकी सरकार के मंत्री सरकार के कामकाज का प्रचार नहीं कर पा रहे हैं. प्रधानमंत्री मोदी ने मंत्रियों की बैठक में और भाजपा संसदीय दल की बैठक में नेताओं से कहा था कि वे अपने क्षेत्र में जायें और सरकार के कामकाज के बारे में लोगों को बतायें. निजी तौर पर सभी सांसदों को यह काम करना है. लेकिन अब पार्टी प्रचार के इस काम को सांस्थायिक रूप देने जा रही है. बताया जा रहा है कि पार्टी अध्यक्ष अमित शाह नेताओं की एक टीम बना रहे हैं, जो सरकार की उपलब्धियों का प्रचार करेगी. इस टीम में भाजपा के संगठन महामंत्री रामलाल खुद रहेंगे. उनके अलावा पार्टी संगठन के और पदाधिकारियों को इस टीम में शामिल किया जायेगा.
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आपस में उलझी कांग्रेस
कांग्रेस पार्टी एक तरफ भाजपा के हमले झेल रही है और एक के बाद एक राज्यों में सत्ता गंवा रही है. तो दूसरी ओर पार्टी के भीतर घमासान छिड़ा है. कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और उपाध्यक्ष राहुल गांधी की तमाम कोशिशों के बावजूद चार राज्यों में कांग्रेस नेताओं के बीच का झगड़ा थम नहीं रहा है. इनमें से तीन राज्य को कांग्रेस शासित हैं.
बीते दिनों केरल के मुख्यमंत्री ओमन चांडी और प्रदेश अध्यक्ष वीएम सुधीरन के बीच प्रदेश कांग्रेस की बैठक में जम कर झगड़ा हुआ. सुधीरन ने कैबिनेट के कई फैसलों पर सवाल उठाये और कहा कि प्रदेश कांग्रेस राज्य सरकार की लूट में हिस्सेदार नहीं बन सकती. उन्होंने चांडी सरकार पर भ्रष्टाचार में डूबे होने का आरोप लगाया. यह शिकायत सोनिया गांधी तक पहुंची है. गौरतलब है कि केरल में मई में चुनाव है.
इसी तरह पंजाब में राहुल गांधी ने झगड़ा सुलझा दिया था.पर कांग्रेस कार्यसमिति के सदस्य रहे वरिष्ठ नेता जगमीत सिंह बरार ने कैप्टेन अमरिंदर सिंह पर कई गंभीर आरोप लगाये हैं. उन्होंने कहा कि कैप्टेन चार-पांच लोगों की भ्रष्ट चौकड़ी से घिरे हैं. पंजाब में अगले साल चुनाव होना है और उससे पहले बरार ने कहा है कि कांग्रेस तीसरे नंबर पर चली गयी है. उनके हिसाब से आम आदमी पार्टी पहले नंबर पर और अकाली दल दूसरे नंबर पर है. इस हमले से पहले कैप्टेन अमरिंदर सिंह का झगड़ा प्रताप सिंह बाजवा से था. जिनको हाल में राज्यसभा के लिए चुना गया है. केरल और पंजाब के बाद बाकी के दो राज्य हिमाचल प्रदेश और कर्नाटक हैं, जहां कांग्रेस के मुख्यमंत्रियों के खिलाफ पार्टी नेताओं ने अभियान छेड़ा है.
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