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असली मैदान तो यूपी बनेगा
शंभूनाथ शुक्ल
बिहार गुजर गया और वेस्ट बंगाल, असम, तमिलनाडु, केरल व पांडिचेरी भी बस गुजरने को ही हैं. पंजाब भी बस आ ही गया मगर असल युद्घ होगा यूपी में और मैदान बनेगा लखनऊ. यहीं पर दूध का दूध और पानी का पानी होगा यहां पर क्षेत्रीय दल अपनी बाजी बिछाये हैं और भाजपा उनके मकडज़ाल में है. पर घबराकर भाजपा ने अपने पत्ते खोल दिए हैं और अपनी चालों से जाहिर कर दिया है कि वह बसपा की राह पर है. यानी वह दलित को आगे कर लड़ाई लडग़ी जिसमें ब्राह्मण हाथी को ढोएगा और यही कारण है कि अभी 14 अप्रैल को भाजपा ने बाबा साहेब को इस तरह याद किया कि लगा मानों आरएसएस और उसकी राजनीतिक जमात के नेताओं का जीवन ही बाबा साहेब के सपनों को पूरा करने के लिए समर्पित है. मगर जब सवाल उठता है कि भाजपा और संघ ने दलितों के लिए किया क्या तो सिवाय सिफर  के कुछ हाथ नहीं लगता. इसमें कोई शक नहीं कि दलितों के अंदर आत्म सम्मान और आत्म विश्वास मायावती के राज के चलते मिला पर इसमें भी कोई दो राय नहीं कि दलितों को ऊपर लाने के काम में कांग्रेस ही सबसे पहले खड़ी हुई थी. आज भले ही यूपी में कांग्रेस अतीत की बात हो गई हो पर क्या भूला जा सकता है कि वह कांग्रेस ही थी जिसने दलितों को ग्राम समाज की जमीनें देकर उन्हें भूमिधर होने का अहसास दिलाया था. इसलिए चाहे जितना कहा जाए दलित आज भी मायावती के बाद किसी को याद करते हैं वह कांग्रेस है.
अब जब कि भाजपा ने पार्टी की कमान सूबे में केशव प्रसाद मौर्य को दे रखी है और बसपा ने पहले से ही स्वामी प्रसाद मौर्य को आगे किया हुआ है तथा सपा ने अबकी प्रभार शिवपाल सिंह यादव को सौंपा है तो सबको इंतजार है कि कांग्रेस दांव किसी सवर्ण पर आजमाएगी मगर मेरा ही नहीं बल्कि कई राजनीतिक पंडितों का मानना है कि यह कांग्रेस की बड़ी भूल होगी. कांग्रेस के पास यह एक मौका है जब वह अपने चातुर्य और रणनीतिक कौशल से बता सकती है कि वह पुरानी भले पड़ गई हो  किन धार उसी के पास है. इसलिए वह एक ऐसा पासा फेके जिससे सब चित हो जाएं तो उसके पास अकेला विकल्प राज बब्बर का बचता है. राज बब्बर मूल रूप से रिफ्यूजी पंजाबी हैं और वह भी कोई खत्री या अरोड़ा नहीं बल्कि एक जाट हैं और पारंपरिक रूप से वे सिख हैं तथा नादिरा उनकी पत्नी रह चुकी हैं इसलिए अल्पसंख्यकों के बीच भी वे समान रूप से लोकप्रिय होंगे. साथ ही वे यूपी के जातीय खांचे में सबको पसंद आएंगे क्योंकि न तो वे यादव हैं न कुर्मी न लोध न गूजर न बांभन न ठाकुर न कायस्थ और न ही बनिया. अपने सिनेमाई किरदारों में वे सिख का रोल भी कर चुके हैं और मुसलमान का भी तथा बंटी और बबली में वे एक रेलवे टीटी बने थे जो कि जाति से त्रिवेदी ब्राह्मण है और एक परंपरागत ब्राह्मण परिवार से हैं. जनेऊ पहन कर गायत्री मंत्र बुदबुदाते हुए उन्होंने इस किरदार को इस तरह जिया था कि सामान्य ग्रामीण परिवेश से आए ब्राह्मण को प्रतीत होता था कि हो न हो यह राज बब्बर ब्राह्मण ही है.
एक ऐसे किरदार को अभिनीत करने वाले राज बब्बर के ऊपर कोई आरोप नहीं है। वे एक संजीदा कलाकार हैं और संसद में भी वे एक संजीदा सांसद के रूप में ही देखे गए। वे राहुल को भी प्रिय हैं और सोनिया को भी। तथा आगरा-फिरोजाबाद की जनता को भी वे अपने प्यारे सांसद आज भी लगते हैं। हालांकि अब वे संसद में नहीं हैं पर उन्होंने इस इलाके के लिए इतना काम किया है कि किसी को प्रतीत नहीं होता कि राज बब्बर अब उनके सांसद नहीं हैं. इसके अलावा वे छात्र जीवन से ही राम मनोहर लोहिया के अनुयायी रहे हैं इसलिए हर एक से घुलमिल जाने और एलीट नहीं दिखने का उनका अंदाज सबको भावेगा. इसलिए यह एक ऐसा मौका है जब राज बब्बर को लाकर कांग्रेस वाकई यूपी में चमत्कार दिखा सकती है. यूपी में पिछले 27 साल से कांग्रेस सत्ता से बाहर है. उसका कार्यकर्ता अब थक चुका है और उसकी वजह यह रही कि लगातार पुराने जातीय समीकरणों ने उसे उबा दिया है इसलिए कांग्रेस यूपी में अपने समीकरण बदले और वह देखादेखी उनकी राह पर न चले जिस पर अन्य पार्टियां जा रही हैं। ‘महाजनेन गतेन सा पन्था:’  इसलिए कांग्रेस वहां पर नई राह दिखाए  तब वह कोई करिश्मा कर सकती है।
 
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