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एक ऋषि की यात्रा का अंत
अरुण कुमार त्रिपाठी
 
नई दिल्ली .अरुण कुमार उर्फ पानी बाबा नहीं रहे. वे एक ऋषि थे. बाबा आखिरी सांस तक जीवन से भरपूर थे और ज्ञान और कर्म के विविध क्षेत्रों में प्रयोग को आतुर रहते थे. जनसत्ता सोसायटी के अंतःवासी और पत्रकार अरुण पांडेय कभी-कभी उनकी सादगी का मजाक उड़ाते हुये कहते थे कि बाबा की सादगी का आतंक है. बाद में कुछ लोग कहने लगे कि बाबा अपनी सादगी, भारतीयता और आधुनिकता विरोधी सोच के चलते न सिर्फ अपने बेटे के करियर को बिगाड़ रहे हैं बल्कि अपना व परिवार का जीवन भी नष्ट कर रहे हैं. लेकिन वे अपनी शर्तों पर जिये और कूल्हे की हड्डी टूटने, गुर्दा खराब होने और हार्ट में अवरोध होने के बावजूद आधुनिक चिकित्सा पद्धति का सहारा नहीं लिया. इन चुनौतियों का सामना करते हुए भी वे 75 साल तक जिये और आखिरी दिन भी दाल चावल की मांग करते हुए स्वाद से भरपूर रहे. उन्होंने अपने बेटे बटुक को एकदम अलग तरह से पाला और उसे स्कूली किताबों और पाठ्यक्रमों से ज्यादा जीवन और समाज की किताबों को पढ़ना सिखाया. वे कभी उसे नट विद्या सीखने को भेज देते थे तो कभी जैन साधुओं की संगत में रहने को कहते और कभी आईआईटी में होने वाली उच्च स्तरीय चर्चाओं में शामिल कराते. उनके प्रयोगों की गहरी छाप उनकी पत्नी पूर्णिमा जी में भी विद्यमान है. उन्होंने कष्ट सहते हुए भी उन्हें सीखा और जिया है जो उनकी बड़ी थाती है. लेकिन निजी जीवन पर उनके यह प्रयोग उस विचार दृष्टि का हिस्सा थे जो वे व्यापक समाज के बारे में रखते थे और जिसमें वे कथनी और करनी का अंतर रखकर नहीं चलाना चाहते थे.
 
अरुण कुमार ‘पानी बाबा’ दरअसल समाज के पानी को बचाने के लिए सतत सक्रिय रहने वाले एक ऋषि थे. उन्होंने पानी को भौतिक रूप से बचाने का संघर्ष तो किया ही लेकिन उनका असली संघर्ष उसे चेतना के स्तर पर बचाने का था. भारत का जल धर्म’ नामक छोटी सी पुस्तक में उनके विचार संकलित हैं. लेकिन उनका विस्तार तो 1985 से 1987 तक राजस्थान के मारवाड़ क्षेत्र में पानी मार्च और ‘मरुस्थल विज्ञान भारती’ की स्थापना जैसे कामों में है. उनका प्रशिक्षण गैर कांग्रेसवाद और विशेष तौर पर समाजवादी धारा के साथ हुआ था. वे यूएनआई की पत्रकारिता करते हुए राजस्थान पत्रिका में संपादक बने और फिर राजनीति की ओर भी मुड़े. वे डां लोहिया, मधु लिमए, जार्ज फर्नांडीज और बाद में भैरो सिंह शेखावत और चंद्रशेखर, शरद यादव और जनता परिवार के दूसरे नेताओं के करीब भी रहे. एक बार वे जनता दल के राजस्थान के वरिष्ठ पदाधिकारी भी रहे. लेकिन समाजवाद की सूखती धारा को देखकर वे भारतीयता और लोकजीवन की अविरल धारा में कूद पड़े. चाहे पानी बचाने और उसकी देसी चेतना और कौशल को समझने की बात हो या देसी पहनावे और खान पान की बात हो, वे लगातार उन चीजों को तलाशते और उनके प्रयोग करते रहे. गाजियाबाद की जिस जनसत्ता सोसायटी में में उन्होंने आखिरी पंद्रह साल बिताये वहां लोग उनकी पाक कला के दीवाने थे. न तो उनकी रसोई की कोई सीमा थी और न ही उसमें बनने वाले पकवानों की. कभी बाजरे की खिचड़ी, कभी हींग की कचैरी तो कभी गोभी और बथुये के किस्म- किस्म के पराठे, धनिये और टमाटर की चटनी तो कभी कांजी का गुणकारी पेय यह सब बाबा के बाएं हाथ का खेल था.
 
लेकिन वे मूलतः एक समुदायवादी चिंतक थे जो देश और समाज को औपनिवेशिक दासता से पूरी तरह मुक्त कराना चाहते थे. उनका चिंतन, धर्मपाल, ईवान इलीच, आशीष नंदी, सुदीप्तो कविराज, वेरियर अल्विन और ब्रह्मदेव शर्मा जैसे समुदायवादी चिंतकों के काफी करीब था.जाहिर है गांधी और लोहिया का असर तो था ही. उनका मानना था कि आजादी की परियोजना अधूरी रह गई और आजादी के बाद जिन लोकविद्याओं और देसज अर्थव्यवस्था का विकास किया जाना था वह नहीं हो पाया. नतीजतन हम फिर औपनिवेशिक परियोजना के शिकार हो गयी. इसीलिए जब बहुराष्ट्रीय कंपनियों के उत्पादों और डब्लूटीओ की गुलामी का विरोध हुआ तो बाबा अग्रणी थे. जब 1857 की डेढ़ सौवीं जयंती मनाई जाने लगी तो वे भी बेहद सक्रिय हो गये.
 
पानी बाबा क्या थे और क्या करना चाहते थे यह कह पाना और समझ पाना कठिन है. वे महत्वाकांक्षी थे, बड़े सपने देखते थे. लेकिन उनकी अपनी मान्यताएं और असहमतियां उनसे भी बड़ी थीं, जो अक्सर उनके सपनों के रास्ते में आकर खड़ी हो जाती थीं. लेकिन बाबा को करियर संबंधी सफलताओं से आकने वाले यह भूल जाते हैं कि बाबा के यही गुण उन्हें आम आदमी के करीब लाते थे, उन्हें स्नेहिल और मानवीय बनाते थे और इन्हीं गुणों के कारण वे पानी बाबा यानी पानीदार बाबा कहलाये.
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