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प्रभाष जोशी और इंडियन एक्सप्रेस परिवार
 अंबरीश कुमार 
इसे संयोग ही कहेंगे कि चार नवंबर 2009 यानी निधन से ठीक एक दिन पहले प्रभाष जी ने लखनऊ में एक्सप्रेस की सहयोगी मौलश्री की तरफ घूमकर हाथ आसमान की तरफ उठाते हुए कहा -मेरा तो ऊपर भी इंडियन एक्सप्रेस परिवार ही घर बनेगा.इंडियन एक्सप्रेस से उनका संबंध कैसा था इसी से पता चल जाता है. प्रभाष जोशी करीब 3० घंटे पहले चार नवम्बर की शाम लखनऊ में इंडियन एक्सप्रेस के दफ्तर में जनसत्ता और इंडियन एक्सप्रेस के पत्रकारों के बीच थे. करीब ढाई घंटे साथ रहे.एक्सप्रेस समूह से जुड़ी कई महत्त्वपूर्ण घटनाओं के बारे में बताया.रामनाथ गोयनका और अपने संबंधों के बारे में बताया. यह भी बताया कि संपादकीय मामले में दखल देने पर किस तरह उन्होंने हरियाणा के मुख्यमंत्री देवीलाल से किनारा कर लिया था. देवीलाल जिनसे वे हर दो चार दिन बाद मिलते थे , उन्हें पोस्टकार्ड लिख कर कहा था -देवीलाल जी हरियाणा की सरकार आप चलायें जनसत्ता हमें चलाने दें.ऐसे कई किस्से उन्होंने एक्सप्रेस के पत्रकारों के साथ साझा किये.यह उनकी अंतिम बैठक साबित हुई जिसमे एक्सप्रेस ,फाइनेंशियल और जनसत्ता के पत्रकार शामिल थे. पिछले दिनों एक पुस्तक के सिलसिले में सारा दिन एक्सप्रेस की लाइब्रेरी में गुजरा अस्सी के दशक में जो लिखा उसमें बहुत कुछ मिला तो काफी कुछ छूट भी गया.पर अस्सी के अंतिम दौर और नब्बे की शुरुआत में जनसत्ता में जो लिखा गया फिर देख कर इतिहास में लौटा .राजेंद्र माथुर ,रघुवीर सहाय ,शरद जोशी से लेकर नूतन का जाना और राजनैतिक घटनाक्रम पर प्रभाष जोशी का लिखा फिर पढ़ा .कुछ हैडिंग देखे .प्रभाष जोशी ने दलबदल पर लिखा ' चूहे के हाथ चिंदी है ' फिर एक हैडिंग -चौबीस कहारों की पालकी ,जय कन्हैया लाल की ' और एक की हेडिंग थी -नंगे खड़े बाजार में .यह भाषा , यह शैली प्रभाष जोशी को अमर कर गई . एक ही दिन बाद पांच नवंबर की देर रात दिल्ली से अरुण त्रिपाठी का फोन आया -प्रभाष जी नहीं रहे. मुझे लगा चक्कर आ जायेगा और गिर पडूंगा .चार नवम्बर को वे लखनऊ में एक कार्यक्रम में हिस्सा लेने आये थे. मुझे कार्यक्रम में न देख उन्होंने मेरे सहयोगी तारा पाटकर से कहा -अंबरीश कुमार कहां हैं.यह पता चलने पर की तबियत ठीक नहीं है उन्होंने पाटकर से कहा दफ्तर जाकर मेरी बात कराओ .मेरे दफ्तर पहुंचने पर उनका फोन आया .प्रभाष जी ने पूछा -क्या बात है ,मेरा जवाब था -तबियत ठीक नहीं है .एलर्जी की वजह से साँस फूल रही है.प्रभाष जी का जवाब था -पंडित मैं खुद वहां आ रहा हूँ और वही से एअरपोर्ट चला जाऊंगा . चार नवंबर 2009 की शाम थी. मैं लखनऊ में इंडियन एक्सप्रेस और जनसत्ता के दफ्तर में पहली मंजिल पर किसी खबर को भेज रहा था तभी राममिलन ने आकर कहा ,साहब कोई प्रभाष जोशी जी सीढ़ी चढ़कर ऊपर आ रहे है .मै खड़ा हुआ और उससे कहा पहले क्यों नहीं बताया उन्हें ऊपर आने से रोकना चाहिये था हम लोग नीचे ही जाकर मिलते .तबतक प्रभाष जी सामने थे .रोबदार आवाज में बोले , क्यों पंडित क्या हो गया तबियत को .उन्हें बैठाया और तबतक इंडियन एक्सप्रेस और फाइनेंशियल एक्सप्रेस के ज्यादातर पत्रकार उनके आसपास आ चुके थे .अचानक बहुत सारी घटनायें याद आ गईं करीब डेढ़ घंटा वे साथ रहे और रामनाथ गोयनका ,आपातकाल और इंदिरा गांधी आदि के बारे में बात कर पुरानी याद ताजा कर रहे थे. तभी इंडियन एक्सप्रेस के लखनऊ संस्करण के संपादक वीरेंदर कुमार भी आ गए जो उनके करीब ३५ साल पराने सहयोगी रहे है .प्रभाष जी तब चंडीगढ़ में इंडियन एक्सप्रेस के संपादक थे .एक्सप्रेस के वीरेंदर नाथ भट्ट ,संजय सिंह ,मौलश्री सेठ ,दीपा आदि भी मौजूद थीं . प्रभाष जी से इस अंतिम मुलाकात के साथ यह भी याद आया कि मेरी प्रभाष जी से पहली मुलाकात कितनी कठिन रही और वह इंडियन एक्सप्रेस के मालिक रामनाथ गोयनका के कहने के बावजूद नहीं हो पाई थी। वर्ष 1987 की बात है जब इंडियन एक्सप्रेस समूह के तत्कालीन चेयरमैन रामनाथ गोयनका से मुलाकात हुई नई दिल्ली के सुंदर नगर स्थित एक्सप्रेस के उस गेस्ट हाउस में जो उनका दिल्ली में ठिकाना था .गोयनका को लोग आरएनजी कहते थे और मुझे भेजा था चेन्नई में जयप्रकाश नारायण के सहयोगी शोभाकांत दास ने .तब बंगलूर के एक अख़बार में थे और आमतौर पर हर दूसरे रविवार चेन्नई चला जाता था शोभाकांत जी के घर . उनके पुत्र प्रदीप कुमार से हम उम्र होने के नाते बनती थी साथ ही वे जेपी की बनाई छात्र युवा संघर्ष वाहिनी के तमिलनाडु के संयोजक भी थे .बिहार से आकर दक्षिण के तबके मद्रास में बसे इस परिवार से अपना संबंध भी अस्सी के दशक के शुरुआती दौर का है .छात्र युवा संघर्ष वाहिनी से जुड़ा होने के नाते मद्रास के गुडवान्चरी स्थित प्रभावती देवी ट्रस्ट के आश्रम में वाहिनी के एक शिविर में बुलाया गया था .तभी से इस परिवार से संबंध बना .मद्रास सेंट्रल के ठीक बगल में 59 गोविन्दप्पा नायकन स्ट्रीट पहुंचा था और बगल में ठहरने का इंतजाम था .बहुत ही अलग अनुभव था . उनका जड़ी बूटियों का बड़ा कारोबार स्थापित हो चुका था . शोभाकांत दास खुद तेरह साल की उम्र में वे आजादी की लड़ाई से जुड गए थे और जवान होते- होते आंदोलन और जेल के बहुत से अनुभव से गुजर चुके थे . हजारीबाग जेल में जेपी को क्रांतिकारियों का पत्र पहुंचाते और उनका संदेश बाहर लेकर आते थे .बाद में सरगुजा जेल में खुद रहना पड़ा जयप्रकाश नारायण की पत्नी प्रभावती देवी के नाम उन्होंने गुडवंचारी में आश्रम बनवाया जिसके ट्रस्ट में तमिलनाडु के सभी महत्वपूर्ण लोग शामिल थे और आसपास के तीस गांवों में इसका काम फैला हुआ था.तब बिहार के सभी वरिष्ठ नेता जो मद्रास आते थे शोभाकांत जी के ही मेहमान होते थे .एम करूणानिधि समेत तमिलनाडु के शीर्ष राजनीतिक भी उनके मित्र ही थे . रामनाथ गोयनका का घर उनके घर के बगल में ही था और उनसे उनके पारिवारिक संबंध थे. शोभाकांत जी चाहते थे कि मद्रास से हिंदी की पाक्षिक पत्रिका शुरू करूं .पर अपना मन बना नहीं .फिर उन्होंने कहा अगर दक्षिण में काम करने की इच्छा नहीं है तो रामनाथ जी के अख़बार से जुड़ना चाहिए जो बहुत अच्छा अख़बार है .मैंने जवाब दिया कि इतनी दूर से दिल्ली जाऊं और वहा कोई पहचाने नहीं तो फिर बैरंग लौटना पड़ेगा .शोभाकांत जी ने कहा कि रामनाथ गोयनका महीने कम से कम एक हफ्ते दिल्ली रहते है .उनसे मै बात करता हूं वे जैसा बतायेंगे फिर वैसा करना .खैर दिल्ली पहुंचा पर इतने बड़े व्यक्तित्व से अकेले मिलने में कुछ झिझक हुई तो पुराने साथी आलोक जोशी जो अब सीएनबीसी आवाज के कार्यकारी संपादक है उन्हें साथ ले गया .सुंदर नगर के गेस्ट हाउस में जब मैनेजर के जरिए सूचना भिजवाई तो खुद गोयनका बाहर निकले .पास आये और गले में हाथ डालकर कमरे में ले गये .बैठाया और बोले ,``देखो एक्सप्रेस में कितना बेसी स्टाफ हो गया है .दो मैनेजर हो गये है .कुछ देर बात करने के बाद आरएनजी ने कहा -ऐसा करो प्रभाष जोशी से जाकर मिल लो .जनसत्ता में सभी का इम्तहान होता है ,तुम्हारा भी होगा .’’ दूसरे दिन बहादुर शाह जफ़र मार्ग स्थित इंडियन एक्सप्रेस बिल्डिंग में जनसत्ता के दफ्तर गया . प्रभाष जोशी के सचिव राम बाबू से मैंने कहा - रामनाथ गोयनका जी ने भेजा है प्रभाष जी से मिलना चाहता हूं .राम बाबू ने इंटरकाम पर प्रभाष जोशी से बात की ,बताया कि रामनाथ गोयनका ने किसी को भेजा है . फिर जवाब दिया - प्रभाष जी के पास तीन महीने तक मिलने का कोई समय नही है इसके बाद संपर्क करे .खैर यह घटना याद आई और यह भी कि तीन महीने बाद प्रभाष जी का पत्र मिला .परीक्षा हुई आठ घंटे की .इंटरव्यू हुआ और मै इंडियन एक्सप्रेस परिवार का हिस्सा बना . उनके साथ तकरीबन बीस साल का जुड़ाव रहा. उनसे बहुत कुछ सीखा. भाषा, साहस, ईमानदारी और पत्रकार होने के साथ राजनीतिक कार्यकर्ता होने का जज्बा. उन्होंने मेरे जैसे कितने ही लोगों में यह जज्बा पैदा किया और कितनों को बड़े काम करने लायक बनाया. वे सब उनके ऋणी हैं. उन्होंने पत्रकारिता के माध्यम से लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा का दायित्व निभाया और यही वजह है कि पत्रकारों को लोकतंत्र का पहरुआ कहा भी जाता है. वही प्रभाष जोशी चार नवंबर 2009 को सामने थे. हमें लगता था अभी फिर मिलेंगे और बहुत कुछ सीखेंगे और उनके नेतृत्व में कुछ नया सामाजिक काम भी करेंगे. वे हिंद स्वराज पर अभियान भी चला रहे थे. उस दिन वे करीब ढाई घंटे साथ रहे और जब एअरपोर्ट के लिए रवाना होने से पहले पैर छूने के लिए झुका तो बोले कंधे पर हाथ रखकर बोले, सेहत का ध्यान रखो पंडित बहुत कुछ करना है. लेकिन किसे पता था कि यह आखिरी मुलाकात होगी. और दूसरे ही दिन देर रात वे हम सबको छोड़ चल दिए. शायद ऊपर इंडियन एक्सप्रेस परिवार को अपना घर बनाने. शुक्रवार
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