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राहुल गांधी कांग्रेस के अध्यक्ष बने अब सबकी निगाह राहुल गांधी पर कैसे पार हो अस्सी पार वालों का जीवन कश्मीर में सीएम बना नहीं पाया तो कहां बनाएगा ?
चिड़िया ते बाज तुड़वाऊं?
विवेक सक्सेना
बाहर बारिश हो रही थी और हम लोग प्रेस क्लब में बैठे चाय और पकौड़ों का आनंद ले रहे थे. तभी टीवी पर खबर आयी कि उत्तर प्रदेश में शीला दीक्षित कांग्रेस की मुख्यमंत्री उम्मीदवार होंगी. उसके बाद नीचे यह पंक्ति दिखायी दी कि वह उमा शंकर दीक्षित की बहू हैं. साथ बैठे एक युवा पत्रकार ने पूछा कि यह उमा शंकर दीक्षित कौन है? हमें उन्हें बताना पड़ा कि वे हैं नहीं थे. वे कांग्रेस के बड़े नेताओं में गिने जाते थे. केंद्र में मंत्री रहे. कर्नाटक व पश्चिम बंगाल के राज्यपाल रहे. उमा शंकर दीक्षित 25 साल तक कांग्रेस खंजाची रहे. उनके समय में यह कहावत शुरु हुई थी कि ‘न खाता न बही जो कहें दीक्षित वही सही’. वे नेशनल हैराल्ड के प्रभारी रहे और उसके अवसान में उनकी वही भूमिका रही जो उनकी बहू की दिल्ली में कांग्रेस की दुर्गति में रही. 
शीलाजी उन्हीं के बेटे विनोद दीक्षित की बहू है. उनका 1990 में देहांत हो गया था. यह सुनते ही उस युवक ने मुंह बिचकाते हुए कहा कि उस साल तो मैं पैदा हुआ था. उसकी बातें सुनकर लगा कि कांग्रेस भी क्या गजब की पार्टी है. इस 131 साल पुरानी पार्टी के गोदाम में इतने नेता है कि जब चाहे किसी को भी झाड़ पोंछकर चमका कर अपने शोकेस में रख देती है. फिर याद आया कि पत्रकारिता में भी ऐसा ही होता आया है. जब जनसत्ता में था तो एक बार हमारे एक वरिष्ठ साथी ने एक खबर लिखी चूंकि नेहरु का विरोध किया इसलिए एआईसीसी की बैठक में आमंत्रित नहीं किया. खबर के साथ पूर्व विदेश मंत्री श्याम नंदन मिश्र की तस्वीर भी छपी थी. बात तब की है जब पीवी नरसिंहराव प्रधानमंत्री थे व हरियाणा के फरीदाबाद जिले के सूरजकुंड इलाके में अखिल भारतीय कांग्रेस समिति का आयोजन हुआ था. तब तक श्यामनंदन मिश्र को कांग्रेस छोड़े व नेहरुजी का निधन हुए करीब तीन दशक हो चुके थे. फिर भी उन्होंने श्याम नंदन मिश्र से अपने संबंधों के चलते उन्हें चमकाया. खबर में बताया गया था कि उन्होंने 1962 में कभी नेहरु जी का कुछ विरोध किया था तब से कांग्रेस उनसे नाराज चली आ रही थी. इसीलिए नरसिंहराव ने उन्हें आमंत्रित नहीं किया. यह पढ़कर अपने लोगों को चमकाने की इस कला का मैं लोहा मान गया. 
अब जब शीला दीक्षित की खबर सुनी तो यह घटना याद आ गयी. सचमुच में कांग्रेसियों का जवाब नहीं. क्या ट्रंप कार्ड निकाला. आखिर यह मार्केटिंग का जमाना है और जब पीके सरीखे चुनावी प्रबंधकर्ता हो तो पूछना ही क्या. उन्होंने सुझाया कि उत्तरप्रदेश कांग्रेस में जान डालने के लिए किसी ब्राम्हण को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करना होगा. तीन नाम दिये- दो राहुल व प्रियंका के थे इसलिए तीसरी शीला दीक्षित के नाम पर ठप्पा लगा दिया. इसकी वाजिब वजह भी है. अपनी शीलाजी पंजाब के कपूरथला की हैं. वे कपूर खत्री हैं. चूंकि निर्मल खत्री को हटाया था इसलिए कि किसी खत्री को लाना जरुरी था. वह उत्तरप्रदेश की जातिवाद की राजनीति की टू इन वन हैं. जन्म से खत्री पर शादी के बाद ब्राम्हण हो गयीं. हालांकि हिंदू समाज में यह व्यवस्था है कि आप अपना धर्म तो बदल सकते हैं जाति नहीं. पर जब बाबा लोग मैगी बेचने पर उतारु हों तो नेता जाति की मार्केटिंग क्यों नहीं कर सकते. वे बचपन में दिल्ली के जीसस एंड मेरी स्कूल में पढ़ी. बाद में मिरांडा कालेज से डिग्री ली. उमा शंकर दीक्षित के आइएएस बेटे विनोद दीक्षित से विवाह हुआ और रातों रात ब्राह्मण हो गयीं. अब खुद को उत्तरप्रदेश की बहू बता रही हैं जैसे कि राजस्थान में वसुंधरा राजे खुद को जाटों की बहू बताती हैं तो अमेठी में स्मृति ईरानी ने खुद को उत्तरप्रदेश की बहू बताया था. हालांकि इस देश में बहुओं के साथ जो कुछ होता आया है उसका इतिहास गवाह है. सीता अपने पति राम के साथ जंगल में धक्के खाने इसलिए चली गयी थीं क्योंकि उनको लगता था कि उनकी गैरमौजूदगी में तीनों सास ताने मार मार कर बदहाल कर देगी. इंदिरा गांधी की अपनी छोटी बहू मेनका गांधी से नहीं पटी तो वहीं सोनिया गांधी संख्या बल होते हुए भी इस देश की प्रधानमंत्री इसलिए नहीं बन पायीं क्योंकि वे भी बहू ही थीं. वैसे सोचने के लिए गालिब ख्याल अच्छा है. 
शीला दीक्षित के उम्मीदवार बनाये जाने के पीछे और भी कारण रहे. कांग्रेस का यह दावा है कि वह अखलियतों, मजलूमों की पार्टी है. जो सबसे कमजोर व अल्पसंख्यक होता है यह पार्टी उसके साथ खड़ी होती है. उसे खड़ा करती है. पीवी नरसिंहराव से लेकर सीताराम केसरी और मनमोहन सिंह इसके जीते जागते उदाहरण है. जो खुद चुनाव लड़ने की कल्पना भी नहीं कर सकते थे उन्हें पूरी पार्टी को आम चुनाव लड़वाने की जिम्मेदारी सौंप दी गयी. इसी कमजोर कड़ी के चलते ही शीलाजी का चयन हुआ क्योंकि दिल्ली में पार्टी का सफाया करने व खुद अपनी सीट हारने के बाद उन्हें यह साबित कर दिया था कि मतदाता के बीच उनसे बड़ा अल्पसंख्यक और कोई है ही नहीं. इसीलिए उन्हें पहले केरल का राज्यपाल बनाया गया. अगर भ्रष्टाचार के मामले में न फंसीं होती तो शायद राजभवन में पंचकर्म करवा रही होतीं. 
पार्टी का सोचना भी गजब है. शीला मूलतः पंजाब से है जहां गुरु गोविंद सिंह का यह दोहा बहुत याद किया हाता है. ‘चिड़ियां ते मैं बाज़ तुड़वाऊं, गीदड़ तो मैं शेर बनाऊं, सवा लाख से एक लड़ाऊं, तबे गोविंद सिंह नाम कहाऊं. अब यह चिड़ी समाजवादी बाज से टक्कर लेगी. जहां एक ओर 40 साल के अखिलेश है तो दूसरी ओर 78 साल की शीला. बैंटले का मुकाबला एंबेसडर से होगा. लेंब्रेटा और हीरो होंडा के बीच रेस लगेगी. कुछ दिलजले कांग्रेसियों ने कहना शुरु कर दिया है कि उन्हें तो अपने गांव तक नाम याद नहीं है. क्या वे यह बता सकती हैं कि श्रावस्ती कहां है व उसका पुराना नाम क्या था? क्या उन्हें पता है कि उत्तरप्रदेश में कितने जिले व उसकी सीमा कहां से शुरु होकर कहां लगती है. अब इन नासपीटो को कौन समझाये कि निष्पक्षता बनाये रखने के लिए अज्ञानता जरुरी है. इंदिरा गांधी ने भी उत्तर भारत के तमाम प्रदेशों का प्रभारी जी के मूपनार को बना रखा था. उन्हें हिंदी नहीं आती थी व शिकायत करने वाले नेताओं को अंग्रेजी नहीं आती थी या तमिल नहीं आती थी. वे उनकी बात सुनकर गर्दन हिलाते रहते और राज्य की कांग्रेसी सरकार आराम से चलती रहती. वैसे भी जब प्रदेश की कोई जानकारी ही नहीं होगी तो नेता बिना किसी भय, लालच, लगाव या दुराग्रह के फैसले लेता रहेगा. यही वजह थी कि लबे समय तक मधुसूदन मिस्त्री उत्तरप्रदेश के प्रभारी बने रहे थे. लगता है कि जैसे राहुल गांधी ने दिल्ली में आप पार्टी से सीखने की बात कही थी वैसे ही पार्टी भाजपा के प्रयोगों से भी सीखना चाहती है. वह शीला दीक्षित को उत्तरप्रदेश की किरण बेदी बनाना चाहती है. 
वैसे कुछ कांग्रेसी यह भी दावा कर रहे है कि ईद के चंद दिनों बाद ही उनके नाम का ऐलान होने की असली वजह चुनाव परिणाम आने के बाद बलि का बकरा चाहिये होगा. इसलिए चुनाव की तैयारी हो या न हो बकरे की तैयारी तो ही गयी है. वैसे शीला दीक्षित को ब्राम्हण नेता के रुप में पेश किये जाने पर वह घटना याद आ गयी जब कांग्रेस से सलमान खुर्शीद को प्रदेश अध्यक्ष बनाया था. तब उत्तरप्रदेश के कांग्रेसियों ने हाई कमान के आगे जाकर आंसू बहाते हुए कहा था, ‘हमने मांगा था मुसलमान, आप ने दे दिया सलमान.’शुक्रवार में विवेक सक्सेना का कालम 
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