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नामवर की नियति

विभूति नारायण राय

वर्षों पहले सत्यप्रकाश मिश्र ने नामवर सिंह के आचरण और लेखन के अंतर्विरोधों पर एक तीखा और मारक लेख लिखा था- महाबली का पतन. दोनों अकादमिक दुनिया में थे और उनका एक दूसरे से तरह-तरह का वास्ता पड़ता रहता था. इसलिए इतने कठोर हमले के बाद भी कोई अबोला नहीं हुआ और दोनों एक दूसरे को चयन या पुरस्कार समितियों और साहित्यिक गोष्ठियों में मदद ही करते रहे. अगर भदेस भाषा में कहा जाये तो नामवर बहुत मोटी चमड़ी के बने हैं और निंदा-आलोचना उन्हें व्यापती नहीं. ऐसा भी नहीं है कि वे इतने बड़े दिल के हैं कि सबको माफ़ करते चलें. बच्चन सिंह और विजेंद्र नारायण सिंह के उदाहरण हमारे सामने हैं. सभा सोसायटी में अपने ऊपर होने वाले हमलों को वे निर्विकार भाव से मुस्कुराते हुए सुनते रहते हैं और अंदर ही अंदर कहीं दर्ज करते रहते हैं. मौका पाने पर चूकते नही.
नामवर कई अर्थों में अकेले हैं– अंग्रेजी में कहें तो वन ऐंड द ओनली वन. क्या यह कम अजूबा है कि विकीपीडिया के अनुसार दुनिया की चौथी सबसे बड़ी भाषा हिंदी के जीवित आलोचकों में शीर्षस्थ नामवर ने सालों साल कुछ नहीं लिखा और शीर्ष पर बने रहे. वे सिर्फ बोलते रहे और बोलने की ही फसल काटते रहे. वाचिक परंपरा का उन जैसा उदाहरण दुर्लभ है. बाबा नागार्जुन ने उन्हे वाचिक परंपरा का कोहनूर यूं ही नही कहा था. मंच लूटने के लिए जरूरी है कि आप वक्तृता और स्मृति के धनी हों और नामवर के पास दोनों हैं बल्कि यूं कहें कि अद्भुत वक्तृता और असाधारण स्मृति उनकी शक्ति है तो गलत नहीं होगा. इन दोनों के बल पर वे पिछले 50 वर्षों से मजमे लूटते रहे हैं.
 
वाचिक परंपरा में एक बड़ा झोल होता है और नामवर भी इसके शिकार रहे हैं. बोलते समय यह स्वाभाविक इच्छा हो सकती है कि आपको तालियां मिले. लिखे पर भी हम प्रशंसा चाहते हैं पर पाठक से, समय–काल की दूरी होने के कारण, उसकी अच्छी बुरी प्रशंसा थोड़ी देर से मिलेगी पर यहां तो प्रतिक्रिया तत्काल मिलती है. श्रोता मुग्ध होकर तालियों की गड़गड़ाहट से आपकी हौसला अफ़ज़ाई कर सकते हैं, आप हूट हो सकते हैं या फिर ऊब ग्रस्त निर्विकार श्रोता समुदाय की जमुहाइयों के बीच बोलने की खानापूरी कर अपनी बात खत्म कर सकते हैं. आमतौर से नामवर को तालियां मिलती रही हैं पर एक बड़ी कीमत चुका कर. वैचारिक प्रतिबद्धता को लेकर वे कभी बहुत ईमानदार आग्रही नहीं थे पर बोलते समय तो अकसर बहुत दयनीय अवसरवादिता का परिचय देते रहे हैं. एक सभा चतुर व्यक्ति की तरह सामने बैठे श्रोताओं को खुश करने के लिए बोलते वक्त आपको जितने फरेब करने पड़ सकते हैं वे सभी कुछ करते हैं. मुझे एक सप्ताह चार विमोचन कार्यक्रमों में भाग लेने का अवसर मिला. इनमें दो कविता संग्रह थे और दो कहानी संग्रह. चारो में मुख्य अतिथि नामवर थे. नामवर ने एक कवि को लोर्का और दूसरे को मायकोवस्की घोषित किया. पहले कवि के बारे में तो उन्होंने यहां तक कहा कि उसकी रचनायें हिन्दी कविता का प्रस्थान बिंदु हैं. इसी तरह कथाकारों मे से एक उनके अनुसार प्रेमचन्द की परंपरा का असली वारिस है तो दूसरे की कहानियां पढ़कर वे चकित थे. इन चारों के बारे में उन्होंने कभी नही लिखा और किसी गंभीर पाठक को याद नहीं होगा की ये चारो कहां बिला गये.
 
बोलने और सिर्फ बोलने का एक फायदा है कि आप हमेशा अपना रुख बदल सकते हैं और नामवर सिंह यही करते रहे हैं. लिखने पर आप पकड़े जा सकते हैं पर बोलने को कौन याद रखता है? ख़ास तौर से 2010 के पहले तक जब हिंदी समाज में अभी व्हाट्स एप या वीडिओ फिल्मिंग की तमीज़ पैदा नही हुई थी. इसलिए वे हमेशा बोलते रहे और बचते रहे. इस आरोप का जवाब देने के लिए कि उन्होंने काफी कम लिखा है हाल में उनके भाषणों को आठ खंडों में प्रकाशित किया गया है. आशीष त्रिपाठी ने बड़ी मेहनत से इन्हें इकट्ठा और संपादित किया है पर स्वाभाविक ही था कि मूर्ति निर्माण की प्रक्रिया मूर्ति भंजक की नही हो सकती थी. इसलिए बहुत ढूंढने पर भी मुझे काफी कुछ नहीं मिला. मसलन मेरी उत्सुकता थी कि मैं देखूं कि कैसे 1986–87 में कुछ ही महीनों के भीतर अज्ञेय हजारी प्रसाद द्विवेदी, रामविलास शर्मा या मुक्तिबोध के पाए के आलोचक/गद्यकार की कोटि से उतर कर गद्य के पतन के कारण और ‘चिंपैंजी के समान गंभीर और मनहूस बन जाते हैं.’ जाहिर है यह प्रशस्ति अज्ञेय की उपस्थिति और निंदा उनकी अनुपस्थिति में हुई थी. मैं यह भी जानना चाहता था कि बिहार के अपराधी राजनेताओं आनंद मोहन सिंह और पप्पू यादव की पुस्तकों का विमोचन करते समय उन्होंने अतिश्योक्तियों में जो विरुदावली गायी थी अब उसे याद करना चाहेंगे भी या नही? मैं अगस्त 1995 में इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में दिये गये उनके उर्दू विरोधी भाषण को एक बार पढ़ कर समझना चाहता था. इसी तरह मैं लखनऊ में प्रगतिशील लेखक संघ के आयोजन में दिये गये उनके भाषण को लिखित में देखकर यह विश्वास करना चाहता था कि सचमुच उन्होंने आरक्षण का विरोध किया था. पर मुझे निराशा ही हाथ लगी. काश हमारे समाज में सच को सच और झूठ को झूठ कहने की परंपरा होती!
मैंने ऊपर लिखा है कि नामवर वन एंड द ओनली वन है.  ऐसा क्या है कि दिन रात कोसने वाले भी चाहते हैं कि वे उन पर कुछ लिख दें, किसी कार्यक्रम में उन पर कुछ बोल दें या फ्लैप पर उनकी कोई सम्मति ही छप जाये. हर आयोजक की ख्वाहिश रही है कि वे उनके कार्यक्रम में अध्यक्ष, मुख्य अतिथि या ऐसी ही किसी हैसियत से कुछ देर के लिए ही सही आ जायें. उनकी सुविधा की खातिर कार्यक्रमों की तारीख़े बदल जाती हैं. आखिर कुछ तो है कि अशोक बाजपेयी लगातार इस कसक का इजहार करते रहे हैं कि नामवर ने कभी भी उन्हें कवि होने का प्रमाण पत्र नहीं दिया नही तो पारस नामवर के स्पर्श से कंचन बने निर्मल वर्मा, उषा प्रियंवदा या धूमिल की तरह उन्हे भी कल्चरल जाकी की जगह एक गंभीर रचनाकार माना जाता. इस तरह के तमाम उदाहरण हैं. हाल में मन्नू भंडारी जैसी बड़ी रचनाकार ने एक इंटरव्यू  मे अपने दर्द का बयान किया है कि नामवर कि नजर उन पर नहीं पड़ी. मैं एक दर्जन से अधिक लेखकों को जानता हूं जिनके जीवन की सबसे बड़ी तमन्ना यही रही है कि नामवर उन पर कुछ लिख दें और जिनकी उनसे शिकायत भी यही रही है कि उन्होंने उन पर कुछ लिखा नही है .  
नामवर के अलावा हिंदी का कौन लेखक ऐसा है जिसके 75 साल के होने पर हिंदी का सबसे महत्वपूर्ण संपादक प्रभाष जोशी  पूरे देश में घूम घूम कर उसके निमित्त कार्यक्रम आयोजित करता रहे और इन में महत्वपूर्ण समाज शास्त्री, राजनेता, तमाम भारतीय भाषाओं के लेखक, पत्रकार और एक्टिविस्ट बढ़ चढ़ कर देश दुनिया के मसलों पर विमर्श करें? आज 90 के करीब पहुंचने पर भी उन पर जितने कार्यक्रम प्रस्तावित हैं वे किसी भी हिन्दी लेखक के लिए सपना हैं. अब अगर इन कार्यक्रमों की शुरुआत संघ परिवार कर रहा है तो हमें परेशान होने की जरूरत नहीं है, मैं ऊपर निवेदन कर ही चुका हूं कि नामवर विचारधारा को लेकर बहुत आग्रही नहीं हैं. 
नामवर अपनी प्रतिभा और अवसरवादिता के कारण किसी ग्रीक त्रासदी के महानायक की तरह अकेले हैं. वे एक कारुणिक उपस्थिति से अलग थलग दिखते हैं. मैं उनके पारिवारिक जीवन के बारे में ज्यादा कुछ नहीं जानता पर जितना कुछ सुना ,पढ़ा और उनसे बात करके जाना है उससे हमेशा लगता है कि उनका जीवन किसी अवसाद भरी सिंफनी जैसा है. इसमें वादक, गायक और श्रोता एक साथ भीगते रहते हैं. आज 90 साल के नामवर अकेले रहते है. शेष बचे जीवन में यह अकेलापन बढने वाला ही है. यह नियति उन्होंने खुद ही तो चुनी है.
 
सत्ता और बूढ़े बैल !
गत 28 जुलाई को नयी दिल्ली के इंदिरा गांधी कला केन्द्र में नामवर सिंह के 90 वें जन्म दिन पर आयोजित कार्यक्रम दो कारणों से चर्चित रहा. पहला तो यह कि नामवर की पहले की छपी सभी पुस्तकों पर उनकी जन्म तिथि 28 जुलाई 1917 अंकित है , इस तरह वे 90 के नहीं 89 के हुए. इस अवसर पर सुरेश शर्मा के  संपादन में उन पर जो मोनोग्राफ छपा है उसमे जरूर जन्म तिथि 28 जुलाई 1916  लिखी है. शायद यह आयोजन को प्रासंगिक बनाने का प्रयास हो.  दूसरा कारण गृहमंत्री राजनाथ सिंह के हाथों नामवर का किया गया सार्वजनिक अपमान था जिस पर वे अपने स्वभाव के मुताबिक मंद मंद मुस्कराते रहे. राजनाथ सिंह ने कहा कि उन्होंने सुना है कि नामवर जी पहले कुछ लिखते थे, बाद में सिर्फ बोलते रहे और अब तो बोलते भी नहीं. उनके अनुसार यह स्वाभाविक ही है क्योंकि सोवियत रूस के पतन के बाद तो बड़े बड़ों की बोलती बंद हो गयी. राजनाथ सिंह ने यह भी कहा कि वे तो इस कार्यक्रम में इसलिए भी आये हैं कि लोग उन्हें इनटालरेंट न कहें. यह वाक्य दो तीन बार दोहराया गया. संस्कृति मंत्री महेश शर्मा तो अपने असांस्कृतिक उद्गारों के लिए मशहूर ही हैं अतः : उनके इस दावे पर लोग मुस्करा कर रह गये कि उनके मंत्रालय का काम ही नामवर जैसे बूढ़े बैलों की देखभाल है.
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