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शरद गुप्ता
आज अनुबंध प्रणाली लागू होने के चलते देश में पत्रकारों की सेवानिवृत्ति की अघोषित उम्र बमुश्किल 40-42 वर्ष रह गयी है. लेकिन श्रवण गर्ग 70 की उम्र में भी सक्रिय संपादक हैं. अपने जीवन के 19 वर्ष दैनिक भास्कर समूह को देने के बाद वह मार्च 2012 में 67 वर्ष की उम्र में समूह संपादक के पद से सेवानिवृत्त हुए. उसके तत्काल बाद वह दैनिक नईदुनिया में समूह संपादक बन गये. दो वर्ष उपरांत उन्होंने फ्री प्रेस जर्नल के मुख्य संपादक के रूप में काम संभाला. फिलहाल वह बिजनेस वर्ल्ड  पत्रिका के सलाहकार संपादक हैं. 
दैनिक भास्कर में उन्होंने इतने लंबे समय तक काम किया कि वह और भास्कर एक दूसरे के पर्याय बन गये थे. वहां उन्होंने पत्रकारों की कम से कम दो पीढिय़ां तैयार कीं. भास्कर को मध्य प्रदेश के दो-तीन संस्करणों से बढ़ाकर चौदह राज्यों, चार भाषाओं और 67 संस्करणों वाले मीडिया समूह में तब्दील करने में उनकी अहम भूमिका मानी जाती है. भास्कर में काम करने वाले उनके एक पूर्व सहयोगी श्रवण गर्ग को भास्कर का 'अश्वमेध का अश्व' कहते हैं. मध्य प्रदेश से निकल कर भास्कर जहां भी गया, श्रवण जी उसकी नींव रखने से लेकर सुचारु संचालन करने तक अपनी भूमिका निभाते रहे. चाहे वह जयपुर हो या अहमदाबाद या फिर रायपुर सभी जगह भास्कर को अग्रणी अखबार बनाने में उनकी बड़ा योगदान है. ख़बरों के चयन से लेकर हेडलाइन देना, संपादकीय लिखना, लेआउट बनवाना और फिर रिव्यू तक वे सभी जगहों पर सौ फीसदी योगदान देते थे. भास्कर में जब तक वे थे, उन्हीं का सिक्का चलता था. 
अखबार में प्रबंधन का दखल उनको समूह संपादक बनाकर दिल्ली भेजने के बाद शुरू हुआ. अपनी लेखनी की वजह से हिंदी ही नहीं बल्कि दूसरी भाषाओं में उनका बड़ा सम्मान है. इतना कि 2009 में जब मैंने अपने पुराने बॉस भारत भूषण को बताया कि मैं भास्कर में काम शुरू करने वाला हूं तो उन्होंने झट से कहा, 'हां, वहां श्रवण गर्ग हैं. उन्हें मेरी शुभकामनायें देना.' 14 साल अंग्रेजी, चार साल गुजराती और लगभग 28 वर्ष हिंदी मीडिया में काम करने वाले श्रवण गर्ग एक अनुभवी और सशक्त हस्ताक्षर हैं. रिपोर्टिंग से करियर शुरू करने वाले गर्ग साहब ने कई विधाओं में महारत हासिल की. 
मूल रूप से इंदौर के रहने वाले श्रवण गर्ग का जीवन संघर्षों से भरा रहा. मसलन वह प्रभाष जोशी के साथ इंडियन एक्सप्रेस के साप्ताहिक प्रजानीति में काम करने दिल्ली आये. कुछ साल बाद प्रभाष जी ने उनके वैवाहिक वर्षगांठ पर सपरिवार भोजन के लिए आमंत्रित किया और अगले ही दिन कार्यालय में उन्हें सेवा समाप्ति का पत्र थमा दिया गया. निराशा से घिरे वे एक्सप्रेस दफ्तर से बाहर निकल रहे थे कि सीढियों पर एक दक्षिण भारतीय मित्र मिल गये. वे फाइनैंशियल एक्सप्रेस यानी एफई में काम करते थे. उनके कहने पर श्रवणजी ने भारतीय विद्या भवन से एक महीने में अंग्रेज़ी सुधारी और एफई में काम शुरू कर दिया.
श्रवण जी के व्यक्तित्त्व का एक और पहलू है. उन्हें बहुत ही सख्त और बदमिज़ाज संपादक के रूप में जाना जाता है. वह कब किसको किस बात पर क्या कह दें, यह किसी को पता नहीं होता था. वे इतने परफ़ेक्शनिस्ट थे कि छोटी सी ग़लती पर भी वे देर तक डांटते रहते जिससे कि दोबारा उस व्यक्ति से वही ग़लती न हो. उनकी प्रताडऩा से सहयोगी इतना घबराते थे कि उनके दाखिल होते ही दफ्तर में सन्नाटा छा जाता था. 
उनके स्वभाव की वजह से कुछ सहयोगियों से उनकी अनबन रही हो लेकिन वहीं उन्हें अंदर से नारियल की तरह मुलायम माना जाता है. पुराने सहयोगी बताते हैं कि एक सहयोगी से नाराज होकर उन्होंने कहा कल से दफ्तर मत आना. लेकिन तीन दिन बाद दूसरे सहयोगियों से उसके हाल-चाल पूछे कि वह कहीं काम कर रहा है या नहीं. मालूम चलने पर कि वह घर बैठा है उसे अगले दिन बुलाया, फिर डांटा कि काम नहीं करोगे तो परिवार कैसे चलाओगे. चलो काम शुरू करो. और अब ग़लती मत करना, नहीं तो दूसरा मौका नहीं दूंगा. 
मध्यप्रदेश के जाने माने पत्रकार प्रकाश हिंदुस्तानी कहते हैं, 'श्रवण गर्ग के हिंदी पत्रकारिता में दो योगदान हैं. एक तो उन्होंने संपादक नामक प्रजाति को बचाने में अहम भूमिका निभायी और दूसरा इसकी कार्यशैली में आमूलचूल बदलाव की व्यवस्था की.' अखबार के संपादक को उन्होंने लाइब्रेरी से बाहर निकालकर न्यूज डेस्क की मुख्यधारा में पहुंचाया और उसका दायरा अग्रलेख और संपादकीय पृष्ठ से बाहर फैलाया. 
इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में डिप्लोमाधारी करने के बाद उनकी रुचि पत्रकारिता में जगी. फिर क्या था. गांधीवाद में विश्वास था तो सर्वोदय से काम शुरू किया. फिर दिल्ली में प्रजानीति, आसपास, एफई से होते हुए इंदौर के नई दुनिया, फ्री प्रेस जर्नल, एमपी क्रॉनिकल आदि से होते हुए दैनिक भास्कर तक का सफऱ तय किया. बल्कि उनका सफर अभी भी जारी है.शुक्रवार के चेहरा कालम से .
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