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पत्थरों से उगती घास
सुलोचना वर्मा
यात्रा पहले तो आपको निःशब्द कर देती है और फिर आपको कथाकार बना देती है- इब्न बतूता (अरब यात्री, विद्वान और लेखक)अब जब मैं अपनी हिमाचल यात्रा का संस्मरण लिखने बैठी हूं, सोच रही हूं, कितना सही कह गये बतूता साहब. पत्थर और फर्न- दो ऐसी चीजें हैं जिनसे मुझे अगाध प्रेम है. शायद यही वजह है कि पहाड़ों पर जाने भर के ख्याल से मैं रोमांचित हो उठती हूं.
वह जून महीने की एक खूबसूरत सुबह थी जब हम शोघी पहुंचे. मौसम अपेक्षा के अनुरूप खुशगवार था. हर तरफ सैलानियों की उपस्थिति के बावजूद एक अजीब सी शांति पसरी हुई थी. लग रहा था जैसे पेड़-पहाड़ और पूरी वादी आपसे कुछ कहना चाह रही हो. होटल के कमरे में सामान व्यवस्थित किया और फिर जलपान करने के बाद रात की यात्रा की थकान को मिटाने के लिए हम तीन-चार घंटे तक नींद की आगोश में रहे.
 
नींद से उठकर टैक्सी लेकर चल पड़े. जब यह निर्णय लेने की बारी आयी कि सबसे पहले कहां जाना है, तो मैंने बिना एक पल भी गंवाये ‘तारादेवी मंदिर’ जाने का निर्णय सुना दिया. जब निर्मल वर्मा का उपन्यास ‘अंतिम अरण्य’ पढ़ा थी, तो उस कहानी के किरदार जेहन में इस कदर घर कर गये कि मुझे लगता रहा कि जिस दिन शोघी जाऊंगी, तो वह किरदार ठीक वैसे ही उस मंदिर में मिलेगी.
 
लगभग 45 मिनट बाद हम तारादेवी के प्रांगण में थे. आसमान में काले-काले बादल घिर आये थे. तारादेवी की सीढ़ियों पर चढ़ते हुए लगा कि थकान अभी पूरी तरह गयी नहीं थी; पर उस समय वहां मौजूद होने भर के खयाल से रोमांचित हो रही थी. तारा देवी मंदिर शोघी में शिमला-कालका रोड पर समुद्र तट से 6070 फुट की ऊंचाई पर स्थित है. देवी तारा को समर्पित यह मंदिर तारा पर्वत पर बना हुआ है. अगर इतिहास की बात करें तो यह लगभग 250 वर्ष पुराना है. इसकी स्थापना पश्चिम बंगाल के सेन वंश के एक राजा भूपेंद्र सेन ने करवाई थी. देवी तारा सेन वंशीय राजाओं की कुलदेवी हैं. मूल मंदिर कभी जुग्गर गांव में था और कालांतर में इस मंदिर का निर्माण कार्य जयशिव सिंह चंदेल और अन्य श्रद्धालुओं ने मिलकर करवाया.
 
मंदिर के अंदर देवी तारा के अतिरिक्त लक्ष्मी और सरस्वती की मूर्तियां विद्यमान थीं. अगर धार्मिक अनुष्ठानों में आपकी अभिरुचि नहीं है, तो वहां करने लायक कुछ विशेष नहीं है. मंदिर से शोघी का ख़ूबसूरत नजारा देखने लायक था. कुछ देर मंदिर के प्रांगण में बैठकर हमने सुंदर नजारों का लुत्फ़ उठाया और फिर माल रोड की तरफ निकल पड़े. लौटते हुए थोड़ी निराश थी. निर्मल वर्मा के वे किरदार जो नहीं दिखे!
 
जब हम अपनी यात्रा की तैयारी कर रहे थे, तो हमें किसी परिचित ने बताया था कि दिल्ली और शिमला के तापमान में कुछ ज्यादा फर्क नहीं है और हम उसी हिसाब से सूटकेस का बोझ ऊनी कपड़ों से बिना बढ़ाये निकल पड़े. पर प्रकृति किसी की गुलाम नहीं, अपनी मर्जी से चलती है. माल रोड पर पहुंचते ही बारिश की बूंदों ने हमारा स्वागत किया. मौसम का तकाज़ा था तो सबसे पहले छाते के साथ पश्मीना शाल की खरीदारी की गयी. फिर उसी छाते को तान आगे की खरीदारी की और सैर-सपाटा भी किया. बलूत, देवदार और बुरूंश के वृक्षों से आच्छादित, ठंडी हवा और मनमोहक प्राकृतिक दृश्यों का शहर शिमला समुद्रतल से 2,130 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है. वर्ष 1846 से 1857 के बीच बने क्राइस्ट चर्च को माल रोड पर सबसे प्रमुख भवन माना जाता है. रिज से देखने पर चर्च बेहद सुंदर नजर आता है और कई किलोमीटर दूर से एक ताज की तरह दिखाई देता है. रिज शिमला के बीचोबीच एक बड़ा और खुला स्थान है जहां से पर्वत श्रृंखलाओं का भव्य नजारा दिखता है. जब हम चर्च के अंदर गये तो थोड़ा आश्चर्य हुआ. बाहर का तापमान बारिश की वज़ह से काफी कम हो चुका था. इसलिए मैं थोड़ी सी गर्माहट पाने के लिए ठीक वहां जाकर खड़ी हो गयी जहां मोमबत्तियां जल रहीं थीं. पीछे के कमरे से तेज आवाज में एक पंजाबी गाने की आवाज आ रही थी. सैलानियों में सेल्फी लेने की होड़ लगी थी. कुल मिलाकर वह सुकून और शांति नदारद थी जो आम तौर पर किसी चर्च में पायी जाती है. वहां से निकलकर हम ‘स्कैण्डल प्वाइंट’ गये. कहा जाता है कि स्कैण्डल प्वाइंट से पटियाला के महाराजा भूपिन्दर सिंह ने अंग्रेज वायसरॉय की बेटी को उठाया था और बदले में वायसरॉय ने उनके शिमला आने पर प्रतिबंध लगा दिया था. महाराजा ने भी अपनी आन-बान और शान का प्रदर्शन करते हुए चैल बसा डाला जो शिमला से भी ऊंचा नगर है. इस घटना के कारण माल रोड पर स्थित इस जगह का नाम स्कैण्डल प्वाइंट पड़ा. कुछ समय हम यहां के मनोरम दृश्यों में खोये रहे और फिर लक्कड़ बाज़ार की ओर चल पड़े.
 
लक्कड़ बाजार के दोनों ओर दुकानें हैं जिनमें हिमाचल प्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों में बनने वाली चीजें बिक रही थीं. लक्कड़ बाज़ार अपने लकड़ी के सामान के लिए प्रसिद्ध है. बिक रही चीजों में पश्मीना शॉल, लकड़ी की बनी हुई छोटी-बड़ी चीजें और हिमाचली टोपी प्रमुख थे. ऐसी जगहों की खासियत यह होती है कि आपको दोनों आंखों से दिखनेवाली हर वस्तु प्रिय लगती है और आप तब तक खरीदारी करते रहते हैं जब तक महसूस न हो कि आपके दोनों हाथ सामान से लद गये हैं.
 
माल रोड के एक रेस्तरां में हल्का नाश्ता करने के बाद हम शोघी की ओर निकल पड़े. किसी अन्य पहाड़ी शहर की ही तरह रात में शिमला का नजारा देखने लायक होता है. रात के लगभग दस बजे हम शोघी पहुच गये. आधी रात बिजली के कौंधने से हमारी नींद खुल गयी. बादलों की गरज के साथ मूसलाधार बारिश हो रही थी. हमारा अनुमान था कि सुबह होने तक बारिश रुक जायेगी और हम अपने दिन की शुरुआत कर सकेंगे. पर बारिश थी कि रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी. हिमाचल प्रदेश पर्यटन विकास निगम से 12 बजे के करीब फोन आया. फोनकर्ता ने बताया कि बारिश की वजह से कार्यक्रम में विलंब है और सुबह की बजाय साढ़े बारह बजे हमें शिमला पहुंच जाना होगा. उन्होंने यह भी बताया कि बुकिंग न तो कैंसिल हो सकती है और न ही उसे दूसरे दिन के लिए निर्धारित ही किया जा सकता है. उस मूसलाधार बारिश में आधे घंटे में शिमला पहुंचना मुमकिन न था. रास्ते में गाड़ियों की लंबी कतार खड़ी थी. हमनें बारिश रुकने तक होटल में ही रहने का निर्णय लिया. बारिश दिन के 2 बजे के करीब रुकी. हमने होटल में दिन का खाना खाया और शिमला की ओर निकल पड़े.
 
सबसे पहले हम वायसरीगल लॉज गये जिसे अब इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ एडवांस स्टडीज़ के नाम से जाना जाता है. मुख्य द्वार से लगभग एक-डेढ़ किलोमीटर चलने के बाद आपको टिकट काउंटर से टिकट लेकर मुख्य भवन में प्रवेश करने के लिए टिकट में टंकित समय का इंतजार करना पड़ता है. एक बार में 15-20 लोगों को ही मुख्य इमारत में प्रवेश करने दिया जाता है. अभी हमारे पास लगभग 40 मिनट का समय था. इस भव्य इमारत का निर्माण वायसराय लॉर्ड डफरिन के आवास के लिए किया गया था. ब्रिटिश हुकूमत ने इसी भवन से सम्पूर्ण भारत पर अपनी सत्ता चलायी और शिमला को भारत की ग्रीष्मकालीन राजधानी भी बनाया. वायसरीगल लॉज को आजादी के बाद राष्ट्रपति निवास में तब्दील किया गया. वर्ष 1964 तक यही राष्ट्रपति का ग्रीष्मकालीन निवास था. भवन के चारों ओर तरह-तरह के फूलों के बेलें हैं और देवदार के घने पेड़ों के बीच विशाल समतल, हरा-भरा लॉन इसकी सुन्दरता को कई गुना बढ़ा देता है. पेड़ों के चारों ओर वृत्त बनाते खूबसूरत पत्थर और प्रांगण की दीवारों में बेतरह उग आये फर्न और शैवाल मेरा ध्यान आकर्षित करते हैं.
 
भारत की पूर्व प्रधानमंत्री श्रीमती इन्दिरा गांधी और पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमन्त्री जुल्फीकार अली भुट्टो के बीच यहीं हुआ था 1972 का ‘शिमला समझौता’, जिसके साक्ष्य आज भी इस भवन में मौजूद हैं. इस भवन में वह मेज अब भी मौजूद है जिस पर समझौते के कागज़ रखकर दस्तख़त किया गया था. भवन की लगभग हर दीवार पर भवन से जुड़ी घटनाओं और उनसे जुड़े राजनीतिज्ञों की तस्वीरें हैं. मुख्य भवन तीनमंजिला है जिसमे सागौन या टीकवुड का भरपूर इस्तेमाल हुआ है. हमें बताया गया कि भवन में इस्तेमाल हुई लकड़ियों को उस समय बर्मा से मंगवाया गया था. सीलिंग में कश्मीर से  मंगवायी गयी अखरोट की लकड़ियों पर की गयी नक्काशी देखने लायक थी. यहां का पुस्तकालय देश के बेहतरीन पुस्तकालयों में से एक है. इस पुस्तकालय में 1 लाख 80 हजार से अधिक पुस्तकें हैं. भवन के अन्दर अंग्रेजों के जमाने का फर्नीचर, टेलीफोन और गुलदान उस भवन की भव्यता को और बढ़ा रहे थे.
 
हिमालयन बर्ड पार्क  इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ एडवांस स्टडीज़ के ठीक सामने स्थित है. सर्दियों में बर्फ़बारी के कारण यह पार्क केवल गर्मियों के मौसम में ही दर्शकों के लिए खुला होता है. यहां मोर, मोनाल और हंस सहित अन्य दुर्लभ पक्षियों की कई प्रजातियां देखने को मिलीं. अंधेरा होने ही वाला था. लौटते हुए हम पास ही ‘वर्मा टी स्टाल’ पर चाय के लिए रुके. इसी बहाने थोड़ी देर और उस सुन्दर वातावरण में रहने का मौका मिला. पास ही के देवदार पर लाल रंग की एक चिड़िया कुछ समय तक हमारा मनोरंजन करती रही.
 
अगली सुबह मशोबरा और संजौली को निहारते हुए हम कुफरी पहुंचे. कुफरी पहुंचते हुए लगभग डेढ़ बज  गये. इसके पहले हम सर्दियों के मौसम में यहां आये थे जब पूरी वादी बर्फ के सफ़ेद चादर से  ढंकी थी. बर्फ में फिसलते हुए ट्रैकिंग का लुत्फ़ भी लिया था. पर इस बार धूप तेज थी और खाने के बाद ट्रैकिंग के बारे में सोचना भी दुष्कर लग रहा था इसलिए हम 222 एकड़ में फैले ग्रेट हिमालयन नेचर पार्क गये. वर्ष 2014 में यूनेस्को द्वारा इसे विश्व विरासत स्थल के रूप में घोषित किया गया है.यहां बंदर, याक, नील गाय, हिरण, शेर और चीते के अतिरिक्त काले और भूरे रंग के भालू भी दिखे. पहाड़ी बकरियों की प्रजातियों (भारल, गोरल और सीरो) को भी देखने का मौका मिला. पक्षियों में मोर, मोनाल, गिद्ध और तीतर की कई खूबसूरत प्रजातियां को देखा.
 
अभी हम नालदेहरा पहुंचे ही थे कि मालूम हुआ, यहां बिना घोड़े पर सवार हुए आप पहाड़ के उत्तुंग शिखर पर नहीं जा सकते जो कि लगभग 6 किलोमीटर की चढ़ाई है. यह भी बताया गया कि यहां जो कुछ भी है, वह सभी कुछ उस उत्तुंग शिखर पर ही है. मैं कोई महान जीव-प्रेमी तो नहीं हूं, पर अत्यधिक संवेदनशील होना भी परेशानी का सबब हो सकता है. कई बार सोचती हूं संवेदना को टोपी जैसा कुछ होना चाहिए था; मतलब कि हम संवेदना को सुविधा के अनुसार इस्तेमाल कर पाते. अपने मनोरंजन के लिए किसी  दूसरे जीव को कष्ट पहुंचाने भर के खयाल से दिल बैठ गया. अचानक एक वाकया याद आ गया. इसी साल किसी परिचित ने मुझे मछली खाकर बांग्ला नव वर्ष मनाने का सुझाव दिया. मेरे यह बताने पर कि मेरे घर पर एक्वेरियम है और मैं मछली नहीं खाती; उसने चिढ़ाते हुए कहा था ‘बंगाली भद्रलोक समाज से तुम्हें बाहर कर दिया जाना चाहिये’. उस वक़्त जेहन में आ रहा था कि भद्रलोक समाज तो क्या, इतनी अधिक संवेदना के साथ इस धरती पर रहना भी मुश्किल ही है. दिल को मजबूत करते हुए और उसूलों को सामाजिकता की खाई में डालकर घोड़े पर सवार हो गयी. गाइड उमर असहजता को महसूस करते हुए मुझसे कहने लगा ‘आपलोग नहीं आयेंगे, तो घास खाकर कब तक जिंदा रहेगा. आप लोग आते हैं तो इसे चना नसीब होता है. इसे भी अपने लिए कमाना पड़ता है.’
 
नालदेहरा समुद्र स्तर से 2044 मीटर की ऊंचाई पर स्थित एक खूबसूरत पहाड़ी शहर है. यह नाम दो शब्दों 'नाग' और 'डेहरा' से मिलकर बना है, जिसका अर्थ है- ‘सांपों के राजा का डेरा’. 'महूनाग मंदिर', नाग भगवान को समर्पित है जो यहां का एक महत्त्वपूर्ण धार्मिक स्थल है. मंदिर के कपाट बंद थे, तो बाहर से ही जायजा लिया. ऐतिहासिक रिकॉर्ड के अनुसार अंग्रेज़ वायसराय लॉर्ड कर्जन ने इस ख़ूबसूरत पहाड़ी स्थान की खोज की थी. यह पहाड़ी स्थान अपने गोल्फ़ के मैदान के लिए सारे भारत में प्रसिद्ध है. लॉर्ड कर्जन यहां के ख़ूबसूरत परिवेश से इतना चकित था कि उसने इस क्षेत्र में सन 1920 में एक गोल्फ़ कोर्स बनाने का फैसला किया. नालदेहरा गोल्फ कोर्स दुनिया में सबसे पुराने गोल्फ क्लबों में से एक है. उमर ने एक कॉटेज की तरफ इशारा करते हुए बताया कि वहां ‘माचिस’ फिल्म के प्रसिद्ध गाने ‘चप्पा-चप्पा चरखा चले’ की शूटिंग हुई थी. फिर गोल्फ कोर्स के दूसरी तरफ दिखाते हुए बताया कि देवदार के उन पेड़ों के बीच फिल्म ‘प्यार झुकता नहीं’ की शूटिंग हुई थी. अंततः हम पहाड़ के उस उत्तुंग शिखर पर पहुंच ही गये जिसका नाम है लवर्स पॉइंट. यह नाम क्यों पड़ा, इस बाबत कोई जानकारी नहीं मिल पायी.
 
थोड़ी दूरी पर एक छोटा सा रेस्तरां दिखा, तो रूककर कॉफ़ी और पकौड़ों का आनंद लिया. उस वक़्त रेस्त्रां में हमारे अतिरिक्त और कोई सैलानी नहीं था, तो कॉफ़ी और पकौड़ों के साथ-साथ हम रेस्तरां के मैनेजर से बात करने लगे. पता चला कि वह रेस्तरां किसी स्थानीय व्यक्ति का नहीं बल्कि बाहर के एक व्यापारी का है. मैनेजर ने बताया कि वे वहां पिछले 25 साल से काम कर रहे हैं और अब उनकी तनख्वाह पांच हज़ार रूपये है. चेहरे पर सौम्य मुस्कान लिए बड़े गर्व से बता रहे थे कि इसी जगह पर काम करते हुए उन्होंने अपनी दो बेटियों का ब्याह किया और दो लड़कों को पढ़ाया.
 
उन दिलकश नजारों को अपनी आंखों में भरकर यह सोचते हुए लौट आयी कि अगर पहाड़ों पर रहनेवाले लोगों की जिंदगी पहाड़ जैसी होती है तो उनका हौसला भी पहाड़ों जैसा ही होता है. कुछ समय के लिए पलकों को बंद कर नालदेहरा की वादियों को याद करती हूं तो उस दुर्गम पहाड़ी पर पैदल चढ़ते स्कूल जाते बच्चे और ग्रामीण दिखते हैं जिनसे मैं कभी नहीं मिली. पकौड़ियां खाते हुए मुझे मिस्टर बीन से दिखनेवाले रेस्तरां के मैनेजर याद आयेंगे और फिर मैं मन ही मन उनकी तनख्वाह के हिसाब से उनके घर के खर्चे का अनुमान लगाऊंगी.
 
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