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जहां आये कामयाब आये
शंभूनाथ शुक्ल
पारा करीब 46  डिग्री रहा होगा जब शशि जी और मैं मंदाकिनी नदी पार करने की कोशिश में थे. चित्रकूट के पास उस इलाके में भयानक सन्नाटा फैला था. इसकी वजह भी थी. एक दिन पहले ही दस्यु सुरेंद्र ठोकिया सीतापुर में दो लोगों की दिन-दहाड़े हत्याकर इसी जंगल की ओर भाग आया था. नदी की चट्टानों पर काई के कारण फिसलन थी और हम दोनों उस क्षेत्र के लिए एकदम अनाड़ी थे. हमारा संवाददाता भी तय समय पर नहीं आया और हमारे लिए रास्ता बताने का काम आफिस का एक कंप्यूटर आपरेटर कर रहा था. शशि जी के वुडलैंड के जूते भीगकर भारी हो गये थे और बार-बार फिसल रहे थे. पर वह हर हाल में उस जंगल के अंदर जाने को अड़े थे. मैंने कहा भी कि यह डकैतों का इलाका है हमें लौट चलना चाहिये. पर उनका आग्रह था कोई तो मिले. तभी उस बियाबान में हमें एक लकड़हारा मिला और उसने बताया कि आगे सुरेंद्र ठोकिया और ददुआ में गोलीबारी हो रही है. अब हमारा लौटना लाजिमी था. हम लौट कर फिर चित्रकूट के उसी यूपी टूरिज्म के  पर्यटक आवास गृह में आये जहां हमने रात गुजारी थी. रिसेप्शन पर कहा गया कि सर आपका कमरा बदल दिया गया है. तब पता चला कि रात को शशि जी के कमरे का एसी ही नहीं काम कर रहा था. मैने कहा, 'अरे आप ने मुझे भी नहीं बताया. वर्ना आप मेरे कमरे में आ जाते.' शशि जी ने कहा कि फिर आपकी नींद खराब करता! यह मेरा अपने समूह संपादक शशि शेखर से पहला वास्ता था और मैं चकित था कि जिस संपादक के बारे में सुना जाता था कि वह बेहद गुस्सैल और निर्दयी है वह तो अंदर से नारियल की तरह एकदम मुलायम निकला. शशि जी की जमीनी राजनीतिक समझ एकदम साफ  है और उनका पत्रकारीय आकलन कभी गलत नहीं निकला. हम जब चित्रकूट से वापस कानपुर लौट रहे थे तब रास्ते में पडऩे वाले गांवों-कस्बों और वहां पर लगे शाइनिंग इंडिया के पोस्टरों को देखकर उन्होंने कहा था कि अगर यही शाइनिंग इंडिया है तो आप समझ लीजिये कि इस बार राजग सरकार नहीं लौटेगी. महज 15 दिनों बाद ही उनकी भविष्यवाणी खरी उतरी और साल 2004 के लोकसभा चुनाव में राजग का कुनबा निपट गया. 
बीएचयू से प्राचीन इतिहास में एमए करने के बाद शशि शेखर अपने परिवार की परंपराओं को निभाते हुए आईएएस में जा सकते थे पर शशि जी ने पत्रकारिता का पेशा अपनाने का फैसला किया. उस समय वाराणसी में 'आज' अखबार सिरमौर था और इस अखबार ने इलाहाबाद से संस्करण निकालने का फैसला किया. उसने अपने इलाहाबाद संस्करण के लिए बीएचयू से निकले 24 साल के शशि शेखर को कमान सौंपने का फैसला किया. शशि शेखर ने तय कर लिया कि अगर सफल होना है तो उन्हें इलाहाबाद में यह अखबार जन-जन तक पहुंचा देना होगा. और शशि शेखर अपने मकसद में कामयाब रहे. 'आज' ने आगरा संस्करण निकाला और कमान उन्हीं शशि शेखर को सौंप दी जो इलाहाबाद में अखबार को लोकप्रिय बना चुके थे. वहां भी संपादक के दायित्व पूरे करने में शशि शेखर पूरी तरह सफल रहे. प्रिंट मीडिया में सफलता के चरम पर होने के बावजूद शशि शेखर ने इलेक्ट्रानिक मीडिया की तरफ  रुख किया और 'आज तक' चैनल में एक्जीक्यूटिव प्रोड्यूसर बनकर दिल्ली आ गये. पर जल्द ही उनका यहां से मोहभंग होने लगा. उन्हें महसूस हुआ कि पत्रकारिता के असल मायने तो प्रिंट में ही होते हैं. चुनौतियां भी अनगिनत और जोखिम भी खूब. इसीलिए उन्होंने पुन: प्रिंट में वापसी की और अमर उजाला में समूह संपादक बनकर मेरठ पहुंचे. तब तक अमर उजाला का मुख्यालय मेरठ ही था. अमर उजाला ही नहीं समूची वर्नाक्यूलर मीडिया के लिए यह एक नयी पहल थी. तब तक किसी पत्रकार को समूह संपादक बनाने का प्रयोग नहीं हुआ था और अखबारों के मालिक ही समूह संपादक होते थे. शशि जी ने समूह संपादक बनते ही सारे संस्करणों के प्रभारी संपादकों का प्रिंट लाइन में नाम देना शुरू करवाया. अमर उजाला के मालिकों की यह दूरदर्शिता रंग लायी और शीघ्र ही अमर उजाला देश के सर्वाधिक प्रसार वाले अखबारों में शुमार होने लगा.
सात साल तक अमर उजाला में रहने के बाद वे 2009 में हिंदी हिंदुस्तान के प्रधान संपादक बनाये गये. वर्नाक्यूलर मीडिया से आये किसी संपादक को राष्ट्रीय मीडिया में संपादक बनाये जाने की यह पहली घटना थी. अमर उजाला में उन्होंने जो प्रयोग किये थे उन्होंने उनके संपादकीय व्यक्तित्व को खूब निखारा. उन्होंने अखबारों को समय के अनुकूल भाषा और तकनीक दी. तब तक शायद हिंदी अखबारों में आउटपुट, इनपुट, प्रोडक्ट क्वालिटी और इन्फोग्रफिक्स डिजाइन जैसे शब्द नहीं समझे जाते थे. शशि शेखर ने अपने कार्यकाल में इन सबके लिए संपादक पद सृजित कराये. शशि जी ने उन लोगों को भी संपादक बनने को प्रेरित किया जो अधिक से अधिक न्यूज एडिटर बनना ही अपना लक्ष्य समझा करते थे. उन्होंने काम कराया तो लोगों को पैसा भी दिलवाया. वे पहले ऐसे संपादक हैं जिन्होंने कहा कि पत्रकारिता एक करियर बनना चाहिये. ऐसा करियर जिसमें वह क्रीमी लेयर भी आये जो कम पैसों के कारण प्रतिभासंपन्न होने के बावजूद पत्रकारिता से कन्नी काट जाया करता था.शुक्रवार 
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