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चाय के साथ चुटकी भर रूमान..

सतीश जायसवाल 

चाय को हमारी आदतों का हिस्सा हुए बहुत दिन नहीं हुए. वह हमारे अपने बचपन की बात है और हमारी याददाश्त में है. यही कोई 60-70 बरस की बात. स्कूल से घर लौटते हुए मैंने वह देखा है. चाय कंपनी के लोग चाय के प्रचार के लिए निकलते थे. और चौक-चौराहों-नुक्कड़ों पर गुमटियां और ठेले लगाकर मुफ्त चाय पिलाते थे. उसे मुफ्त कहना थोड़ा हल्का लगता है. लेकिन मुफ्त की वह लत ऐसी  लगी कि अब चाय के बिना सुबह नहीं होती. कुछ के तो बिस्तर ही नहीं छूटते. वह बिस्तर वाली चाय हुई - बेड टी. साहबों और रईसजादों की चाय, जिनके घर नौकर-चाकर से भरपूर होते हैं. या फिर शानदार होटलों और आलीशान गेस्टहाउसों की विलासिता.  अब तो कहा जाता है कि पानी के बाद चाय ही दुनिया में सबसे अधिक पी जाने वाली चीज़ है.
बताया जाता है कि चाय की खोज सबसे पहले चीन में हुई. ईसा पूर्व 2700 के आसपास. फिर बौद्ध भिक्षुओं के साथ चलकर वह जापान पहुंची. जापान एक पारंपरिक देश है. उनके यहां चाय पीने का तरीका भी पारंपरिक है. वो लोग वज्रासन में बैठकर चाय पीना पसंद करते  हैं. उनकी चाय हमारे यहां से अलग होती है. और उनकी चाय के कप-केटली भी कुछ अलग. 
हमारे शौकों में एक दौर 'पेनफ्रेंडशिप' का भी रहा है, जो देश-दुनिया के युवाओं को एक-दूसरे से जोड़ता था. मेरी भी एक जापानी पत्र-मित्र थी एमिको इनोयू. उसने मुझे अपने यहां की चाय पत्ती, कप और केटली उपहार में भेजी थी. वह हरी पत्तियों वाली चाय थी और उसका अर्क सुनहरा पीला था. उन कपों को पकड़ने के लिए, हमारी तरह कोई हैंडल भी नहीं था. उसने पत्र लिखकर मुझे बताया था कि वहां ऐसे ही कप होते हैं. वे लोग इन कपों को अपनी हथेलियों में दबाकर धीरे-धीरे और देर तक चाय की चुस्कियां लेते रहते हैं. 
हमारे यहां मणिपुर से होकर म्यांमार के लिए एक रास्ता  है. इस रास्ते से होकर जाने पर उधर का पहला शहर तामू है. मैं वहां गया हूं. वहां पहुंचकर मन किया कि किसी होटल में बैठकर एक कप चाय पी जाये. वह एक अनुभव होगा. उसमें म्यांमार का स्पर्श होगा. वहां ड्रैगन वाली चीनी सजावट थी. चाय के पहले उन लोगों ने एक जग में गरम पानी लाकर हमारी टेबल पर रख दिया. उसका रंग पीला था. और उसमें कोई स्वाद भी नहीं था. फिर भी वहां के लोग स्वाद लेकर वह पी रहे थे. मुझे लगा कि शायद यही यहां की चाय होगी. इस पर मुझे हैरानी भी हुई. लेकिन वह चाय नहीं थी. चाय तो उसके बाद आयी. तब समझ में आया कि यहाँ चाय पीने का यही तरीका है. 
 
हमारे यहां चाय की खेती और उसके स्थानीय बाजार में पहुंचने के बीच काफी फासला रहा है. चाय पर ब्रिटिश कंपनियों का आधिपत्य था. उन कंपनियों ने यहां की चाय को पहले बाहर भेजा. स्थानीय बाजार बाद में खोला. और घरोँ ने तो डरते-झिझकते हुए ही चाय के लिए अपने दरवाज़े खोले. शुरुआती दिनों की चाय में चाय कहां होती थी? दूध होता था. उसमें कुछ बूंदें चाय की पड़ जाती थीं. वह भी डरते-डरते ही. दूध का रंग थोड़ा सा बदल गया और बस हुआ. इस पर एक अंग्रेज़ शिक्षक, डेविड हॉर्सबर्ग कहा करते थे 'बिल्लियां दूध पीती हैं.' डेविड हॉर्सबर्ग एक अंग्रेज़ ऋषिवैली में शिक्षक थे. कुछ दिनों के लिए हमारे यहां आये थे. हमारे मेहमान थे. वह खादी के कपडे पहिनते थे. और उन्होंने हिन्दी भी सीख ली थी. लेकिन मुझे सेटिश कहकर ही बुलाते थे. उन्होंने भारतीय नागरिकता ले ली थी. लेकिन चाय की उनकी आदत अंग्रेजी की अंग्रेजी ही बनी रही. बिना दूध वाली चाय पीते थे.
चाय एक बार हमारी आदत में शामिल हुई तो फिर चाय को कहानी-कविता में भी जगहें मिलीं. और चाय पीने के तौर-तरीकों के किस्से भी चलने लगे. चाय के साथ मौलाना अबुल कलाम आज़ाद की नफासत पसंदगी ऐसी ही थी. किसी किस्से के तरह की ही. उन्होंने तो चाय पीने के सलीके पर सलीके से लिखा भी था. वैसे सलीके के साथ चाय पीने वालों में उनकी पीढी के दो लोगों के नाम भारतीय राजनीति के किस्सागो किस्म के लोगों के पास अब दस्तावेज़ी हो चुके हैं. ओडिशा के मुख्यमंत्री रहे बीजू पटनायक और मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री रहे पण्डित श्यामाचरण शुक्ल. चाय पीने के इनके सलीके किसी अंगरेज़ से कम नहीं थे. अब तो खैर शराब भी वैसे सलीके से नहीं पी जाती. बस, बेवज़ह की बदनामी ही ग़ालिब के नाम के साथ जुड़ गयी. अलबत्ता,यह जरूर  हुआ कि ग़ालिब की नामावरी ने या इस बेवज़ह की बदनामी ने हिन्दी फिल्मों में शराब के लिए एक ख़ास मुकाम तय कर दिया. लेकिन  चाय को हिन्दी फिल्मों में वह जगह कभी हासिल नहीं हुई जो शराब की रही है. शरत चन्द्र चट्टोपाद्याय के उपन्यास पर बनी फिल्म ''देवदास'' ने तो शराब को ट्रेजेडी नायकों की एक पहिचान ही बना दी थी. लेकिन राजकपूर ने इसके बर-अक्स चाय का एक ऐसा रूमान  रचा जिसकी छुअन अभी तक बनी हुई है. उनकी फिल्म 'श्री 420' में चाय का वह कोमल प्रसंग! किसी पुल के कोने पर दुअन्नी वाली चाय की अपनी केतली और सिगड़ी लेकर बैठा हुआ वह, मूछों वाला भैय्या. और बारिश में नरगिस-राजकपूर के बीच एक छाते की साझेदारी में कितना कुछ पनप गया --प्यार हुआ, इकरार हुआ... एक छाते की वह भीगती हुई साझेदारी पीढ़ियों का सपना रचने लगी- मैं ना रहूंगी, तुम ना रहोगे: फिर भी रहेंगी निशानियां... मुझे जब भी मुम्बई की कोई बरसात मिलती है, मैं दादर के उस रेल-पुल तक जरूर जाता हूं, जो दादर ईस्ट और वेस्ट को जोड़ता है. शायद मैं दुअन्नी की चाय वाले उस भैय्या को वहां ढूंढता हूं, पुल के इस या उस कोने में बैठा हुआ मिल जाए !
 
हिन्दी साहित्य में भी, ग़ालिब की रुमानियत थपकी देती है तब चाय के लिये रास्ते खुलते हैं. अमृता प्रीतम और साहिर लुधियानवी  का प्रेम उस रुमानियत से कम नाज़ुक कहां था? उनके बारे में मशहूर है कि अमृता प्रीतम साहिर की पी हुई सिगरेटों के टोटे अपने पास सम्हाल कर रखती थीं. तो, साहिर के पास भी चाय का वह प्‍याला रहा जिसमें कभी अमृता ने चाय पी थी. 
शिमला  की किसी बरसती शाम का, कृष्णा सोबती का संस्मरण है 'और घंटी बजती रही.'  उनके इस संस्मरण में मैं गिनती करता  रहा कि कृष्णा सोबती ने उस शाम में कितनी बार चाय पी?  उनकी वह चाय शिमला की उस बरसती शाम को हद दर्ज़े तक रूमानी  बना रही थी. लेकिन आखिर में उस संस्मरण ने रूमान को उदासी में अकेला छोड़ दिया. घंटी बजती रही लेकिन उस तरफ से किसी   ने फोन नहीं उठाया. क्योंकि अब वो था ही नहीं, उस तरफ जिसे फोन उठाना था . 
अब तक इस किस्म की उदासियों के साथ तो हमने अकेली शराब की संगत को ही जाना था. हां, बाद में हिन्दी में एक उपन्यास  भी आया 'चाय का दूसरा कप.' यह दूसरा कप भी कुछ इसी तरह का खालीपन हमारे लिए छोड़ता है. क्योंकि उस दूसरे कप में चाय  पीने वाला अब है ही नहीं.
अब तो चाय पर कवितायें भी लिखी जा रही हैं. छत्तीसगढ़ के एक कवि हैं -- संजीव बक्शी. उनकी एक कविता है 'खैरागढ़ में कट चाय और डबल पान.' खैरागढ़ के आसपास चाय की अच्छी खेती होती है. इसलिए आधी चाय के साथ डबल पान वहां के चलन में है. लेकिन वैसे भी  चाय की चाल एकल नहीं होती,वह संगत में चलती है. कभी सिगरेट की संगत में चली तो, कभी पान के साथ जोड़ बनाकर चली. इधर रामलाल टी स्टाल और बगल में मंसूर पान महल. पान की दुकान साथ ना हो तो चाय का अड्डा सूना-सूना सा लगता है. और अड्डेबाजी के बिना चाय में मज़ा कहां?
 
 
दोस्तों के बीच ''ट चाय' का एक ज़माना रहा है. जिन दिनों ठेलों-गुमटियों पर हिन्दी के साहित्यकार मित्रों के अड्डे हुआ करते थे वो  दिन 'कट चाय' के ही थे. 'कट चाय' का मतलब आधी चाय. और आधी चाय का मतलब एक छोटे कप या कांच के छोटे से गिलास में आधी चाय. शायद अभिजात्य के विरुद्ध आम आदमी के लिए लिखने वाले साहित्यकारों की वह एक अपनी मुद्रा भी थी. कुछ-कुछ  विद्रोही सी. साहित्य के साठोत्तरी दशक में तरह-तरह के आन्दोलनों से जुडी ऐसी कई-कई मुद्राएं कलकत्ते से चलकर इलाहाबाद तक  पहुंच रही थीं. और उनके साथ उनकी तरह की चाय के चलन भी. 
इलाहाबाद में सतीश जमाली और उनके साथियों की अड्डेबाज़ी की एक जानी-पहचानी जगह थी. सिविल लाइंस में सेन्ट्रल बैंक के सामने वाला चाय का ठेला. तो अमीनाबाद, लखनऊ में 'कंचना' वह अड्डा थी. 'कंचना' की चाय का नाम इसलिए भी हुआ कि  वहां के एक कवि वह चला रहे थे.  कलकत्ते में (हिन्दी समाचार साप्ताहिक) 'रविवार' के सम्पादक रहे सुरेंद्र प्रताप सिंह अपने दोस्तों को चाय पिलाने के लिए अक्सर वहां, टी बोर्ड के सामने वाले, एक ठेले पर लेकर जाना पसंद करते थे. उस चाय में चाय के साथ, कलकत्ता के मिट्टी वाले कुल्हड़ों का स्वाद भी शामिल होता था. कलकत्ता आकर यहां, भारतीय भाषा परिषद में ठहरने वाले साहित्यकारों को नीचे उतरते ही मिट्टी के कुल्हड़ वाली वह चाय अब भी मिल जाती है. थियेटर रोड पर ही. चौरसिया जी की गुमटी वाली दुकान में. 
इन दिनों लोकप्रिय हास्य धारावाहिक तारक मेहता का उलटा चश्मा चाय को खूब लोकप्रिय बना रहा है.  लेकिन यह गुजरात की मसाले वाली  चाय होती है. गुजरात की इस, मसाले वाली चाय का स्वाद भी ऐसा होता है कि एक बार मुंह को लगी तो बार-बार मन करेगा ही. लेकिन इसके मुकाबले में इंदौर की रंग-रंग की चाय के स्वाद ने अपनी जगह बनायी हुई है. बादामी चाय, गुलाबी चाय, कड़ी-मीठी चाय वगैरह-वगैरह. जाने कितने रंग, कितने स्वाद और कितने नामों में. ठेलों-गुमटियों पर मिलने वाली चाय के स्वाद में,यह कड़ी-मीठी ही शायद सबसे पसंदीदा रही है. मुंबई से चली 'कड़क मीठी चहा' आगे बढ़ी तो कड़ी-मीठी चाय हो गयी.
 
लेकिन मुम्बई के मशहूर पारसी होटलों की चाय ने अपनी मुम्बई नहीं छोड़ी तो नहीं ही छोड़ी. अब मुंबई के पारसियों की जनसंख्या की तरह इन पारसी होटलों की संख्या भी विरल होती जा रही है. फिर भी इन होटलों ने अपनी पहचान और अपनी चाय का स्वाद वैसे का वैसा बचाकर रखा है. काले आबनूस की कुर्सियाँ और पत्थर के टॉप वाली मेजेँ इन पारसी होटलों का अहसास होती हैं. एक अलग सा अहसास जो चाय के स्वाद में किसी अनजानी खुशबू की तरह घुला हुआ होता है. और वहां से अपने साथ चला आता है. समुद्र के पास एक अजब किस्म का रूमान होता है. शायद वह किसी नाविक का मन होता है. बंदरगाह पर होगा तो रूमान रचेगा ही.  विशाखापत्तनम के 'टी ट्रेल' में बैठकर चाय पीना किसी शाम का ऐसा ही रूमान है. मन को उलझाता है. मुंबई के पारसी होटल में समुद्र एक अहसास होता है. लेकिन विशाखापत्तनम के 'टी ट्रेल' में समुद्र एक दृश्य था. वह कांच पर उपक रहा था और दूर पर, खुले  समुद्र में खड़े जहाजों की झिलमिलाती रोशनियां कांच में से होकर भीतर, हमारी टेबल तक पहुंच रही थीं. वहां,टेबल पर पड़े मेनू कार्ड में मैंने 175 रुपये तक की चाय देखी. लेकिन चाय के जितने दिलकश रंग और उससे भी अधिक उनके अहसास वहां मौजूद थे, कुछ भी महंगा नहीं लगा.
अब तक मैं एक अकेली इस्तांबूली चाय जानता था. 'टी ट्रेल' में मैंने दिलकश लाल रंग वाली मोरक्को की चाय देखी. और अपने लिए  मैंने दालचीनी और शहद वाली चाय मंगवाई जिसमें सेब के टुकड़े पर मक्खन की एक हलकी सी लहर झलक रही थी. उसका रंग सुनहरा पारदर्शी  था. और उसका स्वाद तिब्बत की मक्खन वाली चाय से बिल्कुल अलग था. मैंने तिब्बत की मक्खन वाली चाय पी है. और  उसके लिए तवांग तक भटका हूं. तवांग के रास्ते में पड़ने वाले ढाबों में चाय के साथ रम भी मिलती है. और लोग वहां चाय कम, रम ही अधिक खरीदते हैं.
उन ढाबों को चलाने वाली भोटिया स्त्रियां दिखने में सुंदर और रोजगार में कुशल होती हैं. लेकिन विशाखापत्तनम की प्रीति गुम्मालुरी उनसे अलग हैं. उनके लिए चाय कोई रोजगार नहीं बल्कि एक रूमानी लगाव है. एमबीए करके निकली प्रीति अच्छी जॉब में थीं. लेकिन अपने इस लगाव के लिए जॉब छोड़ा. और मुंबई जाकर टी ट्रेल की यह फ्रेंचाइज़ी ली. अब चाय के साथ मन को जोड़कर मिलने, बैठने, बात करने के लिए एक ठिकाना हो गया.
कोलकता का 'फ्लूरी' भी एक ऐसा ही ठिकाना है. वहां का एलिट समाज 'फ्लूरी' में चाय पीता हुआ दिख जाता है. वह भी एक दृश्य होता है. और उस समय वहां से दिख रही शाम कुछ अलग होती है. वह पार्क स्ट्रीट में रोशनियों के रंगीन होने का रूमानी समय होता है. ऐसी किसी शाम में एक कप चाय का रूमान पार्क स्ट्रीट की सडकों पर लगने वाले बाजार को किसी परी लोक में बदल देने के लिए काफी होगा. फिर भी वह आधी रात की चाय के उस रूमान से कम होगा जिसके लिए जेएनयू के गंगा ढाबे का नाम है. वहां के हॉस्टलर्स आधी रात में जागते हैं. और अपने गंगा ढाबे को आबाद करते हैं. उनके हिसाब से गंगा ढाबे से खराब चाय कहीं और नहीं मिल सकती. लेकिन उनकी ही मानें तो गंगा ढाबा कहीं और हो ही नहीं सकता. सर्दियों की एक आधी रात की वह चाय मुझे भी कैसे भूल सकती है जब चाय की कोई उम्मीद ही मुझे नहीं दिख रही थी. तब उनका गंगा ढाबा गुलजार हो रहा था. और ऐसा लग रहा था जैसे वह मध्य-एशिया का कोई कारवां सराय है. और दूर-दूर देशों के सौदागर वहां आये हुए हैं. समोवर में गरम कहवा चढ़ा हुआ है. और दौर चल रहा है. अभी थोड़ी देर पहले ही हॉस्टलर्स का वह गंगा-जमनी मुशायरा ख़त्म हुआ था. और अभी-अभी मैं उन सबके साथ वहां से निकला था --
     'और हाँ / बीच में वह मायावी रात / जैसे मध्य-एशिया का कोई बाज़ार / जागता है आधी रात में / कारवां सराय में / अपने 
     ऊंटों को खुला छोड़कर / दुनिया भर के सौदागर / शामिल होते हैं /रात के उस गुलज़ार में /ऐसे ही मिलते होंगे / किसी कहवा-
     घर में / जैसे हम सब मिलकर /पी रहे थे चाय / आधी रात तक चले / उस मुशायरे के बाद ...' 
वहां मेरी नजर एक जोड़ काली आंखों पर पडी थी. उनमें गहरी समझदारी की चमक थी. और मुझे भरोसा हो रहा था कि जरूर ही यह चमक मध्य-पूर्व के किसी देश से चलकर यहां पहुंची है. ऐसे में एक और कविता के अलावा तब मेरे अख्तियार में और क्या हो सकता था ? और इससे अधिक और चाहिए भी क्या था ?  
 
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