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जहां पत्रकारिता एक आदर्श है

विवेक सक्सेना

पत्रकारिता करते पूरा जीवन बीत गया लेकिन आज भी अगर कोई पूछे कि मेरा आदर्श कौन है तो उलझन में पड़ना तय है. वजह यह कि हिंदी पत्रकारिता के जिन नामचीन लोगों के साथ मुझे काम करने का मौका मिला, उनको करीब से देखने पर मैं क्षुब्ध ही हुआ. मैंने हिंदी के महान संपादकों को इतनी घटिया हरकतों में लिप्त पाया कि कुछ न कहना ही बेहतर होगा. मैं जिस संपादक से सबसे अधिक प्रभावित हुआ और जिनसे कुछ सीखा वह हैं दिल्ली प्रेस के संपादक परेशनाथ.

सच कहूं तो मेरे पत्रकारिता में होने का श्रेय भी उन्हें ही है. कक्षा 12 में पढ़ते हुए ही मैं दिल्ली प्रेस की पत्रिकाओं में छपने लगा था. मैंने नवीं कक्षा के बाद घर से अपना जेबखर्च लेना बंद कर दिया था. मैं इन पत्रिकाओं का कानपुर विश्वविद्यालय का प्रतिनिधि रहा जो कि पत्रकारिता में रुचि रखने वाले युवा छात्रों को प्रोत्साहित करने का देश का पहला व अनूठा मंच था. मेरी बैंक ऑफ इंडिया में हिंदी अधिकारी के पद पर नौकरी लग गयी. इस बीच मैं दिल्ली आकर दिल्ली प्रेस में नौकरी करने लगा था. बैंक से लगातार पत्र आ रहे थे कि जल्दी ज्वाइन करूं पर मैं उधेड़बुन में था. एक दिन मैं परेशानाथ के पास गया जो बेहद सख्त माने जाते थे. मैंने उन्हें अपनी दुविधा बतायी. उन्होंने मेरी इच्छा पूछी. मैंने कहा कि मैं तो पत्रकारिता ही करना चाहता हूं पर मेरी मां का कहना है कि प्राइवेट नौकरी है. क्या गारंटी है कि मालिक तुम्हें नौकरी से नहीं निकाल देगा. मेरी बात सुनकर वे मुस्कुराये और बोले उनका सोचना ठीक है. निजी संस्थानों में मालिक यह देखता है कि वह अपने कर्मचारी पर जितना खर्च कर रहा है क्या उसे उससे ज्यादा सेवायें मिल रही हैं. वह तब तक किसी को नौकरी पर रखता है जब तक उसे लाभ भले ही नहीं हो रहा हो पर घाटा न हो. तुम अपनी योग्यता का खुद आकलन करके देखो कि अगर तुम हमारे यहां नौकरी छोड़ते हो तो क्या तुम्हें 100-50 रुपये कम या ज्यादा में कहीं और नौकरी मिल जायेगी. अगर उत्तर हां हो तो पत्रकारिता करते रहो वरना बैंक ज्वाइन कर लो. उन्होंने कहा कि जो व्यक्ति जोखिम नहीं उठाता है वह आगे नहीं बढ़ता है. उनके पिता चार्टर्ड एकाउंटेट थे. उन्होंने जब सीए किया तब देश में कुछ सौ सीए ही होते थे. इसके बावजूद उन्होंने सरिता निकाली.

उन्होंने सिखाया कि पत्रकारिता करते समय यह बात ध्यान में रखनी चाहिये कि लोगों के जानने की इच्छा जितनी प्रबल होती है याददाश्त उतनी ही कमजोर होती है. इसलिए जब भी किसी घटना के बारे में कुछ लिखो तो चंद पंक्तियों में उससे जुड़ा इतिहास जरुर लिखो. यह मान कर मत चलो कि पाठक सब कुछ जानता है.

उन्होंने बोल-चाल की भाषा पर जोर दिया पर कभी भाषा को बाजारू नहीं बनाया न ही अंग्रेजी के शब्दों का बेमतलब इस्तेमाल किया. वह सरिता में विज्ञापन देते थे कि हम हिंदी वाले हीन भावना से क्यों भरे हुए हैं. हम अपनी शादी के कार्ड से लेकर विजिंटिग कार्ड तक अंग्रेजी में क्यों छापते हैं. वहां हमारे विजिटिंग कार्ड एक तरफ हिंदी में व दूसरी तरफ अंग्रेजी में छापे जाते थे. यह देश का एकमात्र ऐसा संस्थान था जहां हम हिंदी वालों की बढ़िया रिपोर्ट का अंग्रेजी अनुवाद कैरेवान व वूमेंस इरा में छापा जाता था. सरिता में छपने वाले विज्ञापनों में वे व्यंग्य करते थे कि हिंदी तो गुलामों और अनपढ़ों की भाषा है तभी हम उसका अनादर करते हैं.

 जब इंडिया टुडे का हिंदी में प्रकाशन शुरु हुआ और अखबारों में छपे विज्ञापन में हिंदी पत्रकारिता को फलों के छिलकों से निकला जूस बताया गया तो वे बहुत विचलित हुए और उन्होंने जवाबी हमला करते हुए विज्ञापन दिया कि हिंदी पत्रकारिता की सतत प्रवाहमयी सरिता है. यह वह संस्थान है जहां कमलेश्वर, मोहन राकेश से लेकर अरविंद कुमार तक ने अपनी पत्रकारिता शुरु की थी. उन्होंने गृहशोभा का प्रकाशन शुरु किया जिसने सारे रिकार्ड तोड़ दिए. एक बार उन्होंने मुझसे कहा कि मैं ज्यादा लाभ कमाने के लिए इसका दाम नहीं बढ़ा रहा हूं. मैं तो इस गलतफहमी को तोड़ना चाहता हूं कि सिर्फ अंग्रेजी का पाठक ही मंहगी पत्रिका खरीद सकता है. अंततः उन्होंने गृह शोभा को इंडिया टुडे से ज्यादा कीमत पर कहीं ज्यादा संख्या में बेचकर अपनी बात को सही साबित किया.

वह कुछ मामलों में सिद्धांतवादी थे. उनके पिता के समय से यह परंपरा चली आ रही है कि पत्रिका में सिगरेट, शराब आदि के विज्ञापन नहीं दिए जायेंगे. तब इनके विज्ञापनों पर प्रतिबंध नहीं था. सरिता का अंतिम पृष्ठ उस समय भी कई लाख का था. उस विज्ञापन में एक महिला बिना कपड़े पहने इस प्रकार बैठी थी कि कुछ भी नजर नहीं आ रहा था. पत्रिका बाजार में पहुंचते ही एक पाठक की चिट्ठी आयी कि इस पारिवारिक पत्रिका के नवीनतम अंक का अंतिम पृष्ठ खोला तो अवाक रह गया. इतनी अश्लील तस्वीर देखकर लगा कि इसे मंगवाना बंद कर दूं. पत्र पढ़ते ही तुरंत विज्ञापन विभाग को तलब किया गया और आदेश हुआ कि इसे तुरंत रुकवा दो. कंपनी से कहो कि वह विज्ञापन बदले. अगर वह तैयार न हो तो उसके भावी प्रकाशनों पर भी रोक लगा दो. परेशनाथ हर पत्र को खुद पढते थे. उसका जवाब देते थे. पाठकों को पत्रिका से जोड़ने के लिए, बच्चों के मुख से, यह भी खूब रही, जब मैं शर्म से लाल हुई सरीखे स्तंभ छापे जाते थे जिसमें उनके संस्मरणों का प्रकाशित करने के साथ ही उन्हें पुस्तकें इनाम में दी जाती थी. एक बार किसी पुरुष पाठक ने लिखा कि आप गृहशोभा में महिलाओं की ऐसी तस्वीरें छापते हैं कि हमें शर्म आती है तो उन्होंने जवाब दिया कि यह महिलाओं की पत्रिका है इसे आपको पढ़ने के लिए किसने कहा. यह पाठकों का उनकी पत्रिकाओं के प्रति लगाव ही था कि जब एक बार वितरकों ने कमीशन के मुद्दे पर हड़ताल कर दी और सरिता की जगह मिलती जुलती पत्रिका डालने लगे तो पाठकों ने कहा कि अगर सरिता हो तभी लाना कुछ और नहीं.

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