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पीली पड़ रही नीली क्रांति

उमेश कुमार राय 

क्षिण कोलकाता के गांगुली बागान मार्केट में लंबे समय से मछली बेचने वाले क्षितिज मजुमदार की दुकान पर कभी मछली खरीदने वालों की भीड़ लगी रहती थी लेकिन इन दिनों कोई ताकता तक नहीं. बहुत मुश्किल से रुपये बदलवाकर वे सियालदह से मछलियां लाते हैं लेकिन कोई खरीदने वाला नहीं आता है और आता भी है तो सरकार द्वारा बैन किये गये 500 या 1000 रुपये का नोट लेकर.
मजुमदार मायूस होकर कहते हैं, ‘खूब खाराब ओबोस्था दादा! आर की बोलबो (बड़ी खराब हालत है, भइया! और क्या बोलूं.).’मजुमदार बताते हैं, ‘कई बार ग्राहक तो 2000 रुपये का नोट थमा देते हैं. भला बताइये 100-150 रुपये की मछली देकर 2000 रुपये का खुदरा कहां से लाऊं?’
मजुमदार इकलौता मछली कारोबारी नहीं हैं जो इन दिनों आर्थिक संकट से जूझ रहा हैं. मछली के धंधे से जुड़े लाखों लोगों की हालत आज मजुमदार जैसी हो गयी है. पश्चिम बंगाल के लोगों की मछलियों के प्रति दीवानगी किसी से छिपी नहीं है लेकिन नोटबंदी के बाद उभरे हालात ने किसानों, छोटे व्यवसायियों के साथ ही मछली व्यवसाय से जुड़े मछुआरों और काराबोरियों की हालत भी पतली कर दी है. मछली को तालाब, नदी, समुद्र और भेड़ी से पकड़कर ग्राहकों तक पहुंचाने में नकदी से ही लेनदेन होता है लेकिन नोटबंदी के चलते नकदी की किल्लत और बैंकों से नकदी निकासी की मात्रा तय कर दिये जाने से मछली कारोबार की कमर टूट रही है.
पश्चिम बंगाल में हर वर्ष लगभग 15 लाख मीट्रिक टन मछली का उत्पादन होता है. मछली कारोबार से लाखों लोगों की रोजी-रोटी जुड़ी हुई है. पश्चिम बंगाल सरकार की मानें तो यहां 2.76 लाख हेक्टेयर तालाब, 42000 हेक्टेयर के जलाशय और 4 लाख हेक्टेयर समुद्री तट से मछलियां पकड़ी जाती हैं.तालाबों और जलाशयों में मछली पालक मछलियों का चारा डालते हैं और कुछ महीने तक उसे पालते हैं फिर बाजार में बेचते हैं.
पश्चिम बंगाल के बादुरिया में 18 बीघे की तालाब में मछली पालन करने वाले आर. रॉय कहते हैं, ‘इस बार मैंने बागदा चिंगरी का पालन किया था क्योंकि तालाब का पानी नमकीन है. संक्रमण के कारण सारी मछलियां मर गयीं. अच्छा हुआ मर गयीं वरना नोटबंदी के कारण तो वैसे भी धंधा चौपट ही हो जाता.’ 55 वर्षीय आर. रॉय कोयले का धंधा करना चाहते हैं लेकिन नोटबंदी ने इसकी भी संभावना खत्म कर दी है. उन्होंने कहा, ‘मैं कोयले का कारोबार शुरू करने की तैयारी कर चुका था. ईंट-भट्टे वालों से बात हो गयी थी. वे कोयला खरीदने को तैयार भी हो गये थे, नोटबंदी के बाद वे कह रहे हैं कि कोयले की कीमत वे 500 और 1000 रुपये के नोट के रूप में देंगे इसलिए मैंने इस धंधे को फिलहाल शुरू नहीं करने का फैसला लिया है.’
मछली पालन और इसके निर्यात में भारत विश्व में दूसरे स्थान पर है. पहले पायदान पर चीन है लेकिन चीन भारत से महज 10 प्रतिशत अधिक मछलियों का उत्पादन करता है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जुलाई 2014 में एक कार्यक्रम में कहा था कि हरित और श्वेत क्रांति की तरह ही नील क्रांति (मत्स्य पालन) पर जोर देना होगा. नील क्रांति के लिए सरकार ने कदम भी उठाना शुरू कर दिया था. नेशनल फिशरीज एक्शन प्लान तैयार किया गया जिसमें बताया गया था कि मछलियों के निर्यात को तीन गुना करने के लिए वर्ष 2020 तक मत्स्य पालन क्षेत्र में 17199 करोड़ रुपये खर्च करने होंगे. केंद्र सरकार फंड के लिए विश्व बैंक और एशियाई विकास बैंक से बातचीत कर रही है लेकिन नोटबंदी के बाद मछली बाजारों में जो वीरानगी पसरी हुई है उससे साफ जाहिर होता है कि नील क्रांति का सपना पीला पड़ रहा है. फिश मर्चेंट्स एसोसिएशन के सेक्रेटरी देवाशीष जाना कहते हैं, ‘मछली का धंधा कच्चा माल का धंधा है. नोटबंदी का फैसला इस कारोबार के लिए बड़ा झटका है, जिसे संभाल पाना बहुत मुश्किल है.’
मछुआरों से मछलियों खरीदकर छोटे दुकानदारों को बेचने वाली कंपनी एनडीएम इंटरप्राइज पहले रोज कम से कम 70 क्विंटल मछलियों का कारोबार कर लेती थी, लेकिन अब कंपनी का कारोबार घटकर 7-8 क्विंटल पर आ गया है. एनडीएम इंटरप्राइज से जुड़े बप्पादित्य रॉय कहते हैं, ‘भेड़ी और तालाब से मछलियां पकड़कर लाने वाले मछुआरे नगदी मांगते हैं और वह भी 100 और उससे कम राशि के नोट की शक्ल में. ऐसे नोट होंगे तब देंगे न ?
नोटबंदी के चलते मछली पालने वालों से लेकर उन्हें पकड़ने के काम में लगे श्रमिकों और उन्हें ग्राहकों तक पहुंचाने वाले खुदरा व्यपारियों सब पर बुरा असर पड़ा है.बंगाल में केवल मछलियों को तालाब से पकड़ने के काम में अनुमानतः 7 से 8 लाख लोग लगे हैं. ये दैनिक मजदूरी पर तालाबों और भेड़ियों से मछलियां पकड़ते हैं. एक भेड़ी से अगर डेढ़ से दो लाख रुपये की मछलियां पकड़ी जाती हैं तो उसमें से लगभग 30 हजार रुपये मछलियां निकालने वाले श्रमिकों को देने पड़ते हैं. इन्हें हाथोंहाथ पैसे चाहिये. खुदरा की किल्लत से इन्हें दिहारी देने में भी दिक्कत आ रही है. ऑल बंगाल फिश प्रॉड्यूसर्स एसोसिएशन के सचिव दीपंकर मंडल कहते हैं, ‘खुदरा की किल्लत के चलते दैनिक मजदूरी देने में मुश्किलें आ रही हैं जिससे कई भेड़ियों में श्रमिक असंतोष की घटनाएं हो रही हैं.श्रमिकों और भेड़ी मालिकों में तू-तू-मैं-मैं की नौबत आ जाती है.’
पश्चिम बंगाल में सलाना लगभग 16.5 लाख मैट्रिक टन मछली की खपत होती है. 15 लाख मैट्रिक टन मछली का उत्पादन तो बंगाल में ही हो जाता है लेकिन 1.5 लाख मैट्रिक टन मछलियां आंध्रप्रदेश, ओडिशा और दूसरे राज्यों से मंगवाया जाता है. मछलियों के थोक कारोबार से जुड़े लोगों का कहना है कि नोटबंदी के बाद से दूसरे राज्यों से भी मछलियों का आना बंद हो गया है.
मछलियां चूंकि पानी से निकालते ही मर जाती हैं इसलिए इन्हें आलू-प्याज की तरह बिना बेचे ज्यादा समय रखा नहीं जा सकता है. राज्य में कोल्ड स्टोरेज हैं भी लेकिन उनकी क्षमता कम है जिससे मछली पर आश्रित लोगों को दोहरी मार सहना पड़ रहा है. ऑल बंगाल फिश प्रोड्यूसर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष रवींद्रनाथ कोले कहते हैं, ‘नोटबंदी के चलते पिछले दस दिनों में मछली कारोबार को कम से कम 500 करोड़ रुपये का नुकसान हो चुका है और यह आने वाले समय में भी जारी रहेगा.’
पिछले दिनों एक साक्षात्कार में जब केंद्रीय वित्तमंत्री अरुण जेटली से नोटबंदी के चलते हो रही परेशानी के संबंध में सवाल किया गया था तो उन्होंने कहा था कि ये छोटी समस्यायें हैं. उस वक्त उनकी बॉडी लैंग्वेज ऐसी थी जैसे कुछ हुआ ही नहीं है. नकदी लेनदेन में समस्या को लेकर जेटली ने सलाह दी थी कि कैश की कमी है तो ऑनलाइन लेनदेन करें लेकिन सुदूर गांवों में रहने वाले मछुआरों और मछली पकड़ने वाले श्रमिकों के लिए ऑनलाइन लेनदेन असंभव है. मछली के आयात-निर्यात से जो कंपनियां जुड़ी हुई हैं वे ही ऑनलाइन लेनदेन करती हैं लेकिन उनकी संख्या अंगुलियों पर गिनी जा सकती है. पश्चिम बंगाला में मछली कारोबार से 15-20 लाख लोग जुड़े हुए हैं. दीपंकर मंडल के अनुसार श्रमिकों को पारिश्रमिक देने से लेकर मछलियों के बाजार तक पहुंचने में नकद लेनदेन होता है.
मंडल ने कहा, ‘सरकार अगर कालेधन पर अंकुश लगाना चाहती है तो यह अच्छी बात है लेकिन इतना बड़ा फैसला लेने से पहले सरकार को सोचना चाहिये था. इसके लिए पहले मुकम्मल तैयारी करनी चाहिये थी.’
मछलियों का कारोबार करने वाले लकी ट्रेडर्स से जुड़े रमेश शाह का भी यही कहना है कि अगर सरकार ऐसा फैसला लेना चाहती थी तो पहले इसकी तैयारी की जानी चाहिये थी. सरकार के फैसले से ईमानदार लोगों को भी तो परेशानी हो रही है. शाह ने कहा, ‘मछली का कारोबार चौपट हो रहा है इसकी जिम्मेवारी कौन लेगा ?’
नोटबंदी के चलते मछली कारोबार पर पड़े नकारात्मक असर का परिणाम यह निकला है कि दुकानदारों ने मछलियों को औने-पौने दाम पर बेचना शुरू कर दिया है ताकि उन्हें कम से कम नुकसान हो. झींगा मछली पहले 600 से 700 रुपये किलो बिका करती थी जिसका दाम घटकर 400 रुपये किलो हो गया है. इसी तरह हिल्सा, रोहू और दूसरी मछलियों की कीमत में भी गिरावट आयी है. मछलियों के शौकीन एक बंगाली ने कहा, ‘जो मछलियां खाने में हम असमर्थ थे, उन्हें अब हम खरीद पा रहे हैं.’कुल मिलाकर, सरकारी फैसले ने एक फूलते-फलते कारोबार को बर्बाद कर दिया है.
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