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गांव क़स्बे की भाषा बोलते थे अनुपम मिश्र
अंबरीश कुमार 
वर्ष 1988 की गर्मियों के दिन थे जब दिल्ली में बहादुरशाह जफ़र रोड स्थित एक्सप्रेस बिल्डिंग में अख़बार की नौकरी शुरू हुई । तब खाना खाने के लिए कुछ साथी गांधी शांति प्रतिष्ठान यानी जीपीएफ की कैंटीन जाते थे । बहुत ही सात्विक ,घर जैसा खाना मिला तो रोज आना जाना शुरू हुआ । यहीं पर पर्यावरण पर काम कर रहे अनुपम मिश्र से पहली मुलाक़ात हुई । नब्बे के दशक की शुरुआत में  आज भी खरे हैं तालाब पुस्तक प्रकाशित हुई तो उन्ही से मिली  । तब मीडिया में भी पर्यावरण को लेकर कोई ख़ास गंभीरता नजर नहीं आती थी । पानी का सवाल और दूर की बात है । नदियां इतनी जहरीली भी नहीं हुई थी और न ही पानी के स्रोत पर आज जैसा खतरा मंडरा रहा था । तब पर्यावरण पर कुछ बड़े एनजीओ आदि को छोड़ कोई इतनी गंभीरता से काम भी नहीं कर रहा था ।उस दौर  में अनुपम मिश्र ने तालाब पर जो पुस्तक लिखी वह पर्यावरण पर हिंदी में अलग इतिहास बना चुकी है । अनुपम मिश्र ने गांव समाज की भाषा से लोगों को जोड़ा । वे जिस भाषा में बोलते और लिखते वह लोगों को कही भीतर तक छू जाती थी । वे समाजवादी धारा से निकले गांधीवादी  थे । टायर की चप्पल ,खादी का कुर्ता पैजामा और एक झोला ।यही उनकी पहचान थी ।जीपीएफ उनकी कार्यस्थली थी और आज अंतिम यात्रा भी यही से शुरू हुई ।अनुपम मिश्र ने पिछले तीन दशक में पानी के सवाल को समाज का एजंडा बना दिया है । वे आमतौर पर किसी सभा में जाकर बोलने से बचते थे ।पर पर्यावरण के सवाल पर राजस्थान के दुर्गम इलाकों से लेकर उतराखंड के पहाड़ी इलाकों तक की यात्रा की और लगातार लिखते रहे । तालाब पर जब उनकी पुस्तक प्रकाशित हुई तो देशभर में लुप्त होते तालाब पर न सिर्फ बहस शुरू हुई बल्कि तालाब बचाने की दिशा में ठोस पहल भी हुई ।इसी वर्ष पांच जून को नैनीताल में रामगढ़ में पानी के सवाल पर व्याख्यान देते हुए उतराखंड के सामाजिक कार्यकर्त्ता सच्चिदानंद भारती ने बताया कि किस तरह गैरसैण में उन्होंने गांव के लोगों की मदद से पानी का संकट दूर किया है । उन्होंने पर्यावरणविद अनुपम मिश्र के योगदान का जिक्र किया और बताया कि उन्हीं की प्रेरणा से पिछले ढाई दशक में अपने गांव और आसपास में करीब बीस हजार बहुत छोटे छोटे तालाब उन्होंने बनाएं है । इन तालाब की वजह से आसपास में अब गर्मियों में पानी का संकट नहीं होता । यह सिर्फ एक बानगी है अनुपम मिश्र के योगदान की ।बुंदेलखंड से लेकर राजस्थान तक तक इस तरह की कई ठोस पहल हो चुकी हैं । पानी को लेकर अनुपम मिश्र का बड़ा योगदान है जिसके चले लोगों का नजरिया बदल रहा है ।दरअसल अनुपम मिश्र ने समाज से जिस भाषा में संवाद किया उस भाषा का भी बड़ा योगदान है ।  डा राममनोहर लोहिया भी ऐसी ही भाषा और मुहावरों  में अपनी बात कहते थे जो समाज के अंतिम जन तक को समझ में आ जाती थी । पत्रकारिता में प्रभाष जोशी ने इस भाषा को और आगे बढ़ाया । अनुपम मिश्र ने भी गांव कस्बे की उस भाषा में संवाद किया और लोगों पर उसका असर हुआ ।
खुद अनुपम मिश्र के शब्दों में ' किसी समाज का पर्यावरण पहले बिगड़ना शुरू होता है या उसकी भाषा? हम इसे समझ कर संभल सकने के दौर से तो अभी आगे बढ़ गए हैं। हम विकसित हो गए हैं।भाषा यानी केवल जीभ नहीं। भाषा यानी मन और माथा भी। एक का नहीं, एक बड़े समुदाय का मन और माथा, जो अपने आस–पास के और दूर के भी संसार को देखने–परखने–बरतने का संस्कार अपने में सहज संजो लेता है। ये संस्कार बहुत कुछ उस समाज के मिट्टी, पानी, हवा में अंकुरित होते हैं, पलते–बढ़ते हैं और यदि उन में से कुछ मुरझाते भी हैं तो उनकी सूखी पत्तियां वहीं गिरती हैं, उसी मिट्टी में खाद बनाती हैं। इस खाद यानी असफलता की ठोकरों के अनुभव से भी समाज नया कुछ सीखता है।
लेकिन कभी–कभी समाज के कुछ लोगों का माथा थोड़ा बदलने लगता है। यह माथा फिर अपनी भाषा भी बदलता है। यह सब इतने चुपचाप होता है कि समाज के सजग माने गए लोगों के भी कान खड़े नहीं हो पाते। इसका विश्लेषण, इसकी आलोचना तो दूर, इसे कोई क्लर्क या मुंशी की तरह भी दर्ज नहीं कर पाता।इस बदले हुए माथे के कारण हिंदी भाषा में ५०–६० बरस में नए शब्दों की एक पूरी बारात आई है। बरातिये एक से एक हैं पर पहले तो दूल्हे राजा को ही देखें। दूल्हा है विकास नामक शब्द। ठीक इतिहास तो नहीं मालूम है कि यह शब्द हिंदी में कब पहली बार आज के अर्थ में शामिल हुआ होगा। पर जितना अनर्थ इस शब्द ने पर्यावरण के साथ किया है, उतना शायद ही किसी और शब्द ने पर्यावरण के साथ किया हो।नवभारत टाइम्स 
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