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बादलों के साथ रसायनिक छेड़छाड़ खतरनाक

अक्षय कुमार
नई दिल्ली, 26 जून- हालांकि मानसून जल्दी लाने की कोशिश में वैज्ञानिक बादलों पर रसायन का छिड़काव करने की योजना बना रहे हैं मगर दुनिया भर के पर्यावरण शास्त्रियों ने इस योजना को प्रकृति के साथ अक्षम्य खिलवाड़ कहा है। वैज्ञानिकों का कहना है कि बारिश समय पर नहीं हुई तो अकाल पड़ जाएगा और पर्यावरण शास्त्रियों का कहना है कि बादलों को जबरदस्ती बरसाने से वायुमंडल की नमी कम होगी और पानी भी इतना नहीं मिलेगा जितना जरूरी है।
मानसून के बादलों के नखरों से आजिज आ चुके भारतीय मौसम वैज्ञानिकों ने अब बादलों की बुवाई करने की दिशा में गंभीरतापूर्वक कदम बढ़ा दिए हैं और इस बार आकाश में जाकर बादलों के मिजाज को परखने की तैयारी कर ली गई है।
भारतीय मौसम वैज्ञानिकों ने यह कदम ऐसे समय उठाया है जब इस साल सामान्य से कम बारिश की भविष्यवाणी से देश त्रस्त है और विशेष रूप से उत्तर-पश्चिमी भाग को सिर्फ 81 प्रतिशत वर्षा मिलने की खबर से सरकार के माथे पर भी पसीना आ रहा है। इस साल देश में 93 प्रतिशत दीर्घावधि औसत वर्षा का अनुमान जाहिर किया गया है।
पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय में सचिव डॉ। शैलेश नायक ने यूनीवार्ता को बताया कि बादलों की बुवाई यानी क्लाउड सीडिंग की दिशा में कदम बढ़ाने के लिए भारतीय वैज्ञानिक इस बार जून से लेकर सितम्बर तक आकाश में बादलों के पास जाकर उनकी रासायनिक प्रकृति और गुणों के बारे में जानकारी हासिल करेंगे।
इससे वैज्ञानिकों को बादलों के मिजाज का पता चलेगा और इस बात की सही सही जानकारी मिल सकेगी कि कौन से बादल सिर्फ गरजते हैं और कौन से बादल वाकई बरसते हैं। भारतीय मौसम विभाग के विशेषज्ञों ने इस मानसून में बादलों के साथ बैठकर वहां उनके साथ प्रयोग करने के लिए एक विशेष विमान किराए पर लिया है।
यह काम भारतीय उष्ण कटिबंधीय मौसम विज्ञान संस्थान के सहयोग से किया जा रहा है। दोनों संस्थाओं के विशेषज्ञ चार महीने की वर्षा रितु में इस विमान से आकाश में बादलों के पास जाकर उनके रासायनिक गुणों का पता लगाएंगे। डॉ। नायक के अनुसार बादलों के गुणों और प्रकृति के शोध का यह काम लगातार तीन साल चलेगा। भारतीय वैज्ञानिक साल दर साल बादलों की प्रकृति में आने वाले परिवर्तनों को ठीक से जान लेना चाहते हैं, ताकि बादलों की बुवाई को कारगर बनाया जा सके। उन्होंने बताया कि इससे बादलों की रासायनिक संरचना में बदलाव के जरिए उन्हें बरसने लायक बनाने में मदद मिल सकेगी।
बादलों की बुवाई की अवधारणा पर अनेक वर्षों र्से प्रयोग होते रहे हैं लेकिन भारत में इस दिशा में इस साल पहली बार गंभीरतापूर्वक कदम उठाए जा रहा है। क्लाउड सीडिंग की अवधारणा में बिना बरसने वाले बादलों में सिल्वर आयोडाइड या बर्फ के क्रिस्टल मिलाकर उन्हें बरसने वाले बादल बनाया जाता है। यह भी सच है कि बादलों की बुवाई के प्रभावशीलता के प्रामाणिक आंकड़े अभी उपलब्ध नहीं हैं।
यह प्रयोग विवादों से भी दूर नहीं है क्योंकि पर्यावरणविद इसे प्रकृति के साथ खिलवाड़ मानते हैं। इसके अलावा इसे बारिश की चोरी भी माना जाता रहा है क्योंकि इसमें उन बादलों को एक क्षेत्र विशेष में बरसने के लिए विवश कर दिया जा सकता है जो किसी दूसरे इलाके में बरसने थे। इससे प्रकृति के संतुलन और क्षेत्रीय विवाद बढ़ाने के भी खतरे हैं।
 

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