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यनम : इतना निस्पंद !
सतीश जायसवाल
हम जिस होटल में ठहरे हैं उसके ठीक सामने 'यनम गेट' है. हमारा होटल आंध्रप्रदेश में है और 'यनम गेट' से पुडुचेरी लग जाता है. दो राज्यों के बीच में बस एक सड़क का फासला है. होटल की खिड़की से देखने पर यनम की बसाहट दूर तक फैली दिख रही है. और उससे भी दूर की तरफ नारियल के पेड़ों का घना हरा विस्तार है. आभास होता है कि उस घने विस्तार के ठीक पीछे समुद्र लहराता होगा. लेकिन समुद्र को तो हम पीछे छोड़ आये थे. वहां, काकीनाड़ा के पास, जहां गोदावरी नदी उससे मिल रही थी.
 
कोई नदी जहां समुद्र से मिलती है, अपने पूरे रूप वैभव से साथ मिलती है. वह दिव्य दृश्य होता है. उसमें एक प्राणिकीय स्पर्श मिलता है. लेकिन यह स्पर्श भूगोल के किसी नक़्शे में नहीं मिल सकता. नक्शा तो बस वहां तक पहुंचने का रास्ता बताकर स्थगित हो जाता है. हम रास्ता ढूंढ रहे थे जहां गोदावरी नदी अपने समुद्र से मिलती है, काकीनाड़ा के पास बंगाल की खाड़ी में. लेकिन हम काकीनाड़ा से आगे निकल आये थे और सीधे यनम पहुंच गये.यनम गोदावरी नदी के डेल्टा में बसा है.  कोई 9-10 किलोमीटर पहले, जहां गोदावरी की एक सहायक नदी कोरिंगा उससे मिलती है वहां, यह डेल्टा बनता है. 'यनम टॉवर' से दोनों नदियों का मिलना दिखता है. स्थूलकाय गोदावरी और कृशकाय कोरिंगा. उससे आगे समुद्र होगा, जो हम पीछे छोड़कर आगे निकल  आये थे. मैंने डेल्टा से और आगे देखने की कोशिश की. लेकिन सामने क्षितिज था. उससे आगे कुछ नहीं. इधर तेल के कुंओं से आग की लपकेँ उठ रही थीं और गोदावरी के जल में आग की परछाइयां पड़ रही थीं. 'यनम टावर' पर से देखने पर पानी में आग दिख रही थीं. गोदावरी नदी के बेसिन में तेल के कुंए हैं. उनसे आग की लपटें उठती रहती हैं. इन कुंओं पर रिलायंस का अधिकार है.
 
फ्रांसीसियों के बाद अब उनके इस उपनिवेश पर रिलायंस समूह का औद्योगिक साम्राज्य है. उस उपनिवेश की स्मृतियों को बचाकर रखने के लिए रिलायंस ने यहां यनम टावर बनवाया है. पेरिस के मशहूर एफिल टावर की प्रतिकृति. इस पर से दूर तक दिखता है. लेकिन इसके लिए टिकट खरीदना पड़ता है. दूर तक फ़ैल रही शाम को इतने ऊपर से निहारना एक मायावी अनुभव था. उस मायावी अनुभव से बाहर निकलना कुछ भारी-भारी सा लगा.नदी के साथ चल रही काली, चिकनी सड़क शाम के समय सूनी थी. दूर तक बस हम थे. उस सूनी सड़क पर हम देर तक अकेले चलते रहे. यहां तक कि रिलायंस की औद्योगिक बस्ती सामने आ गयी. लेकिन रास्ते भर कोई लोग नहीं दिखे. बस नदी थी,साथ पकड़कर चलती हुई. शायद अंधेरे में अकेली छूट जाने से नदी डर रही थी.
 
पता नहीं क्यों, डोर बांधकर सीधी लकीर में खींची हुई सी गोदावरी नदी किसी नदी से अधिक कोई बहुत बड़ी नहर सी लगती रही. हमारे मन में जो नदी होती है वह बांक लेती हुई चलती है. लहराती है. उस पर नावें चलती हैं और लोगों को उस पार उतारती हैं. लेकिन गोदावरी कुछ अलग-अलग सी मिली. नदी से कुछ अलग. फिर भी यह एक गहरी नदी है. इस पर बड़ी, मालवाहक नावें चलती हैं. ये नावें उस पार नहीं उतारतीं बल्कि दूर की तरफ ले जाती हैं. दूर,समुद्र की तरफ.
हमने एक 'स्पीड बोट' ली. और नदी पर चक्कर लगाया. बोट वाले ने गहरी नदी पर तरह तरह के करतब दिखाये. लेकिन नदी के साथ जुडी कोई प्रेम-गाथा नहीं सुनाई. गहरी नदी के पास गहरा मन होता है. और गहरे मन में कोई पुरानी प्रेम कहानी दबी होती है. शायद गोदावरी सूने मन की नदी है. तट पर पुलिस की चौकी है जहां सिपाही तट पर मुस्तैद हैं और बराबर चक्कर लगा रहे हैं. ध्यान रख रहे हैं कि नदी में कोई दुर्घटना ना होने पाये. गोदावरी गहरी नदी है और उसमें डूबने का डर है. 
यनम पुलिस की टोपी अभी तक लाल रंग वाली वही फ्रांसीसी टोपी है जो उन लोगों के समय में रही होगी. महिला सिपाहियों की टोपी भी ऐसी ही है. एक जैसी. और उन पर अच्छी सजती है. 'यनम गेट' से भीतर होते ही मैं उपनिवेश-काल के वो पुराने निशान ढूंढने लगा था जिनका 300 वर्षों का जीवन-काल रहा है. इन 300 वर्षों में यहां डच भी रहे और फ्रांसीसी भी आये. लेकिन उन दिनों के कोई बकाया निशान अभी तक नहीं मिले थे. ना देखने में, ना उनके स्पंदन में. यनम पुलिस की लाल रंग वाली फ्रांसीसी टोपी ने उन दिनों का पहला भरोसा कराया.
 
फ्रांसीसियों से पहले उनके इस उपनिवेश पर, डचों का आधिपत्य था. लेकिन अब यहां डच बचे और ना फ्रांसीसी, सिवाय उन 10 फ्रांसीसी परिवारों के जो अब यहीं के हैं. लेकिन हम उन्हें ढूंढ नहीं पाये. ढूंढते तो उन तक पहुंच सकते थे. मैंने पता भी कर लिया था कि यहां के म्युनिसिपल स्कूल के पास ही कहीं वो लोग रहते हैं. लेकिन मन में एक दुविधा थी. एक मनुष्य जाति को किसी समय के अवशेष की तरह देखना कहीं उनके मन को दुखा गया तो ? सन 1956 के बाद से तो अब यहां फ्रेंच पढ़ाई भी नहीं जाती जो उनके अपने पूर्वजों की मातृभाषा रही है. अब इन  बच गये परिवारों के लोग शायद अपने घरों में ही फ्रेंच में बोलते-बात करते होंगे, जो उनके पास छोड़कर उनके पूर्वज यहां से चले गये.  फिर भी उनको देखना एक मनुष्य जाति को लगभग 300 वर्षों की उस निरंतरता में देखने का रोमांच तो होता ही, जिसे अब इतिहास में स्थगित हो जाना है. वैसे ही, जैसे कहीं तक पहुंचने का रास्ता बताकर किसी नक़्शे का भूगोल में स्थगित हो जाना. इसमें फ्रांसीसियों का आना और डचों का जाना, दोनों शामिल है. यनम सन 1731 में फ्रांसीसियों के अधिपत्य में आया था. तभी वहां के लोग यहां आये होंगे. और उन लोगों ने डचों को यहां से जाते हुए देखा होगा, जो उनसे पहले यहां आये थे. 
फिर भी मेरा अनुमान था कि उन औपनिवेशिक दिनों का कुछ स्पर्श, कुछ गंध, कुछ अनुभूति यहां बाकी होगी.  जैसे वहां, पश्चिम बंगाल के चंदन नगर में वह अब तक बची हुई है. वहां के पुराने घरों के ऊंचे कमानीदार दरवाजों-खिड़कियों में और फ्रेंच स्थापत्य वाले चर्चों के मेहराबों-कंगूरों में. और तो और उन चर्चों में आने वाले धर्मानुयाइयों के दिखने में. और उनके जातीय-सामाजिक संस्कारों में भी. चंदन नगर भी यनम की तरह एक  फ्रेंच उपनिवेश रहा है. और इसकी ही तरह फ्रांसीसियों से पहले डचों के आधिपत्य में रहा.
 
पुदुचेरी का फ्रांसीसी उपनिवेश 4 भौगोलिक-प्रशासनिक खण्डों में बंटा हुआ था -- पुदुचेरी, कराईकल, माहे और यह, यनम. यह पुदुचेरी से 870 किलोमीटर की दूरी है. और आंध्रप्रदेश से लगा है. यहां पहुंचना आंध्र के ही किसी हिस्से में पहुंच जाने जैसा लगा. बोली-बानी में, पहरावे-ओढ़ने में और रीति-रिवाजों में ,भी.दूसरे दिन हमें, यहां के चर्च में हो रहे एक विवाह-संस्कार को देखने का अवसर मिल गया. वर-वधू सहित, उसमें शामिल सभी लोग स्थानीय तेलुगुभाषी ईसाई थे. और विवाह की उनकी विधियां वही देसी-स्थानीय थीँ जो उनके पूर्वजों के समय में भी रही होंगी. इन लोगों ने अपने यहां की विवाह विधियों और अन्य रीति-रिवाजों को उन दिनों में भी बनाये रखा था जिन दिनों यहां फ्रांसीसियों का अधिपत्य था. यहां और आसपास के स्थानीय समुदायों में  बाल- विवाह का चलन लंबे समय तक रहा है. ब्रितानी भारत में बाल-विवाह प्रतिबंधित हो जाने के बहुत दिनों बाद तक भी. आसपास के लोग यहां,यनम में आकर बाल-विवाह कराया करते थे. बाल-विवाह का निषेध करने वाला शारदा कानून यनम में बहुत बाद में लागू हुआ.ऐंग्लो-इंडियनों की तरह फ्रांसीसी और स्थानीय रक्त के मेल-मिलाप से उपजी नस्ल को 'क्रियोल' कहा गया. लेकिन यनम में स्थानीय समुदायों के साथ ऐसा घुलना-मिलना शायद कम हुआ. अलबत्ता यहां के अधिकांश तेलुगुभाषी स्थानीय लोगों ने अपनी स्थानीयता को बनाये रखते हुए फ्रांस की नागरिकता लेना पसंद किया.
 
किसी औपनिवेशिक नगर या पुराने पत्तन की पुरातनता तक पहुंचने का एक आजमाया हुआ तरीका मेरे पास है. वहां की सबसे पुरानी किसी शराब की दुकान तक पहुंचते ही उस पुरातनता की आहट मिलने लगती हैं. मैंने अपना वही तरीका यहां भी आजमाने की कोशिश की. यनम में शराब सस्ती है. इसलिए, विशाखापत्तनम और आसपास के शौक़ीन लोग शराब पीने के लिए यहां चले आया करते हैं. वैसे कुछ शौक़ीन लोग तो दिखे और शराब की दुकानें भी दिखीं. लेकिन शराब की वैसी कोई पुरानी दुकान नहीं मिली जिसके पास उस पुरातनता की आहट हो रही हो. ऐसी कोई पुरानी दुकान यहां होगी जरूर, लेकिन हम वहां तक पहुंचनहीं पाये. यनम 1963 में विधिवत भारत संघ के केंद्र प्रशासन के अंतर्गत आया. लेकिन विलय के इन 50-60  वर्षों के छोटे से समय-काल में ही 300 वर्षों का लंबा उपनिवेश-काल यहां इतना निस्पंद हो चुका है कि उसकी आहट तक नहीं मिल रही है !आज का यनम पूरे तौर पर इन 50-60 वर्षों की एक नयी बसाहट है. किसी मध्यम दर्ज़ा औद्योगिक बस्ती जैसी. करीने से बसाई गयी कालोनियां. साफ़-सुथरी सड़कें. और उन पर तरतीब से की गयी रोशनियां. मुख्य सड़क के दोनों किनारों पर, हमारे अपने समय के राजनेताओं की, प्रतिमाओं की कतारबद्ध सजावट. सभी प्रतिमायें सुनहरे रंग के पानी से एक जैसी रंगी हुई हैं. देखने में, यह सजावट अरुचिपूर्ण लगती हैं. और विचार में, कहीं-कुछ खटकता भी है.
डचों और फ्रांसीसियों के पास उनका अपना मूर्ति शिल्प था. सेरामपुर और चंदननगर जैसे उनके दूसरे उपनिवेशों में उनका अपना मूर्तिशिल्प उनके शासकों और इतिहास नायकों की प्रतिमाओं में दिखता है. लेकिन यहां, यनम में उनकी कोई प्रतिमा नहीं दिखी. शायद हटा दी गयी होंगी. या शायद, हम वहां नहीं पहुंच सके हैं. अभी तक तो हम लोग वहां भी नहीं पहुंच सके थे जहां वो लोग रहा करते होंगे. उनके घर, उनके बाज़ार. कुछ ना कुछ तो वहां फिर भी बाकी होगा ! लोगों की स्मृतियों में, किस्से-कहानियों में.
 
चाहे नदी के पास यहां कोई प्रेम-कहानी नहीं है , लेकिन 300 बरसों के इतने लंबे दिन बिना किसी कहानी के कैसे हो सकते हैं ? यनम में फ्रांसीसी भूतों की कहानियां भी बताई जाती रही हैं. फ्रांसीसी भूत और उनके करतब हमारे यहां के भूतों और उनके करतबों जैसे ही रहे होंगे या उनसे कुछ अलग ? यह जानने की जिज्ञासा होती है. श्मसान और वीराने हमारे यहां के भूत-प्रेतों के रहने और उनके मिलने की जानी-पहिचानी जगहें होती हैं. तो फ्रांसीसी भूत भी यहां ऐसी ही किन्हीं जगहों में रहते होंगे. और रातों में निकलते होंगे.यनम में डच या फ्रांसीसी शासकों और उनके इतिहास नायकों की कोई प्रतिमा नहीं दिखना एक खटकने वाली बात भी थी. लेकिन फ्रेंच शासकों की स्मृति में एक चर्च यहां जरूर है. सेन्ट ऐन्स कैथलिक चर्च फ्रेंच शासकों की स्मृति में बनवाया गया था. यह, यहां के पुराने चर्च से बाद का है. यनम का पुराना चर्च तो 1769 का है.  लेकिन शासकों की स्मृति में बनवाया गया सेन्ट ऐन्स चर्च 1846  का है. यूरोपीय शिल्प में बने इस चर्च का शिलान्यास किन्हीं फादर मिशेल लेकनम ने किया था. लेकिन चर्च के पूरा होने से पहले ही उनकी मृत्यु हो गयी.
 
चर्च के सामने ही पुरानी सिमेट्री है. वह धूप में निस्पंद पड़ी हुई मिली. सिमेट्री के भीतर वीराने का वास था. और दरवाज़े पर पड़ा हुआ ताला, मालूम नहीं कब से नहीं खुला था. शायद अरसे से यहां किसी का आना-जाना नहीं हुआ था. किन्हीं के नाते-रिश्तेदार भी शायद अब उतनी दूर, फ़्रांस से चलकर यहां नहीं आते होंगे.डचों के पास नील की खेती करने का कौशल था. उन्होंने अपना यह कौशल भारतीयों को  सिखाया था. वहां, बंगाल के सेरामपुर और चन्दन नगर में तो स्थानीय लोगों को नील की खेती करने का कौशल डचों ने ही सिखाया था. यहां, यनम में भी सिखाया होगा. उनके समय में यनम नील का एक बड़ा व्यापारिक केंद्र रहा होगा. यहां से उनके व्यापारिक जहाज गोदावरी नदी के रास्ते समुद्र के लिए निकलते होंगे. और दूर देशों तक जाते होंगे. अब यहां उन दिनों के नील के कुंओं के अवेशष भर रह गए हैं. नील का रोज़गार-व्यापार नहीं. 
 
यनम में कोई बड़ा युद्ध हुआ हो, ऐसा कोई उल्लेख नहीं मिलता. फिर भी डचों ने यहां, पास के ही एक गांव -- नीलपल्ली में अपने लिए एक किला बनवाया था. शायद, किले में उनका खजाना रहा होगा. यहां उनकी अपनी टकसाल भी थी. वहां मुद्राएं ढाली जाती थीं. वहां जाने और उस टकसाल को देखने का मन था. लेकिन अब वहां ना उनका किला बचा और ना ही उनकी टकसाल. डचों के जाने के बाद यनम फ्रांसीसियों का हो गया. और नीलपल्ली गांव अंग्रेजों के आधिपत्य में आ गया. 
 
उन दिनों मंगलवार के दिन भरने वाला, यनम का साप्ताहिक हाट 'मंगलावरम' बड़ा प्रसिद्द था. उसकी प्रसिद्धि वहां मिलने वाले इम्पोर्टेड सामानों के लिए थी. और उन दिनों में भी भारतीयों को 'इम्पोर्टेड' सामान ललचाता था. इसके लिए दूर-दूर से लोग यहां आते थे. यह देखकर अंग्रेजों के आधिपत्य वाले नीलपल्ली ने भी अपने यहां 'मंगलवारी हाट' शुरू कर दिया. इस पर अंग्रेजों और फ्रांसीसियों के बीच एक लंबा विवाद चला. यह विवाद, उस समय के मद्रास प्रेसिडेंसी तक पहुंचा, जो अंग्रेजों का मुख्यालय था. वहां इस विवाद का फैसला यनम के पक्ष में हुआ. यनम का वह 'मंगलवारी हाट' तब से चला आ रहा है. क्या उन दिनों की कुछ रौनक वहां आज भी बची हुई होगी ? क्या पता. जिस दिन हम लोग वहां थे, वह मंगलवार का दिन नहीं था.शुक्रवार 
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