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शुरुआत तो ठीक ही हुई है महाराज ! केशव प्रसाद मौर्य होंगे यूपी के सीएम ? उत्तर प्रदेश में मोदी का रामराज ! आधी आबादी ,आधी आजादी?
जिसका यूपी उसका देश ....
अंबरीश कुमार 
निघासन (लखीमपुर खीरी ). ' बच्चा बच्चा है अखिलेश ,जिसका यूपी उसका देश ' बीते बुधवार को यह नारा भारत नेपाल सीमा पर इस ब्लाक के पास ही एक छोटे से गांव की सभा में गूंजा. यह नारा उत्तर प्रदेश की राजनैतिक लड़ाई का भविष्य बताने का प्रयास कर रहा था. यह समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव की पहली साझा सभा थी क रीब पांच साल की सत्ता, परिवार के घमासान और कांग्रेस के गठबंधन के बाद अखिलेश यादव का अंदाज बदल चुका है. इस संवाददाता ने पांच साल पहले हुए विधान सभा चुनाव में उनकी पहली रैली कवर की थी. और इस बार पहली साझा रैली में मौजूद था. सत्ता, विवाद और सांगठनिक राजनीति ने अखिलेश को काफी हद तक परिपक्व बना दिया है. अब तो समाजवादी पार्टी के समर्थकों का नारा भी बदल गया है. जो नारा कभी मुलायम के लिए लगता था उसे बदल कर समर्थकों ने कर दिया  ' जलवा जिसका कायम है, उसका बाप मुलायम है .'निघासन की इस खुली सभा में बड़ी संख्या में आसपास के गांव के लोग जुटे. यह कुर्मी बहुल इलाका है जिसमें मुस्लिम बड़ी संख्या में हैं. आसपास से सिख भी आये हुये थे. शायद इसलिये एकमात्र सिख मंत्री बलवंत सिंह रामूवालिया इस सभा में बोले और अपने समाज से समाजवादी पार्टी को जिताने की अपील की.
गांव कस्बे के लोगों के मुताबिक निघासन सीट पर भारतीय जनता पार्टी और समाजवादी पार्टी में कड़ा मुकाबला है. बसपा यहां मुकाबले से बाहर मानी जा रही है. पर अखिलेश यादव का इस क्षेत्र के नौजवानों पर ख़ासा असर है. यह उनके पांच साल के कामकाज का प्रभाव है. अखिलेश यादव ने क्या किया या नहीं किया यह मुद्दा नहीं है. ज्यादातर लोग यह मानते हैं कि वे काम करते नजर आते हैं और आगे भी करेंगे, यह उम्मीद है. हो सकता है मोदी ने जितने वादे किये हों उनमें ज्यादातर उन्हें पूरे होते नजर न आ रहे हों जिसके चलते अब प्राथमिकता बदल रही हो. इसकी वजह महंगाई, खेती किसानी की परेशानी  और नोट्बंदी से हुई कई तरह की दिक्कत भी हो सकती हैं. यह अरहर से लेकर काला नमक समेत कई अच्छी प्रजाति के धान का इलाका भी है. पर पिछले दिनों किसानों को काफी परेशानी का सामना करना पड़ा. नोटबंदी से फसल की बुआई बुरी तरह प्रभावित हुई तो कृषि उपज का मिटटी के भाव बिक जाना भी है .ऐसे माहौल में अखिलेश यादव का लोगों से सीधा संवाद बनाना उन्हें फायदा पहुंचा सकता है. अखिलेश ने अच्छे दिन के बारे में पूछा तो नोट्बंदी से हुई दिक्कत का मुद्दा भी उठाया. उन्होंने इस अंचल की एक नहीं कई दिक्कतों का हवाला दिया. पानी में आर्सेनिक के चलते होने वाली दिक्कत हो या सड़क, बिजली और पुल का सवाल. सभी पर साफ़ नजरिया. यह जंगल का इलाका है जहां आये दिन जंगली जानवरों के हमले में लोग मारे जाते हैं या घायल हो जाते हैं. अखिलेश ने उन दो महिलाओं का जिक्र किया जिनके परिजन बाघ के हमले में मारे गये थे. उन्हें अखिलेश ने दफ्तर बुलाया और पूछा कि क्या वे उन्हें जानती हैं तो जवाब मिला नहीं. इन दोनों महिलाओं को 10 लाख रुपये से ज्यादा का मुआवजा सरकार ने दिया. अखिलेश ने यह घटना इस सभा में इसलिए बतायी ताकि लोग यह समझ सके कि उन्हें इस अंचल की समस्याओं का भी पता है और वे हर संभव मदद का प्रयास करते है.
अखिलेश का गांव के लोगों से संवाद कर अपनी बात रखने का अंदाज नया था. पिछले विधान सभा चुनाव में उनके ज्यादातर भाषण सपाट होते थे जिनमें मायावती सरकार के दमन उत्पीडन के साथ लैपटाप आदि का जिक्र होता था. अब वे अपना कामकाज भी बताते हैं तो भविष्य के कार्यक्रम भी. राजनैतिक दलों के घोषणा पत्र तो न कोई पढ़ता है न उनपर यकीन करता है. पर इसकी दो तीन बातें भी अगर चर्चा में आ जायें तो चुनावी फायदा दे जाती है. जैसे पिछली बार लैपटाप चल गया था. इस बार छोटे बच्चों को देसी घी, बच्चियों को साइकिल और महिलाओं को कूकर इसी तरह चर्चा में है. पर वे गांव में गर्भवती महिलाओं के लिये एंबुलेंस की जानकारी दे रहे हैं तो बीमार मवेशियों के लिये एंबुलेंस के साथ दवा और डाक्टर गांव गांव तक पंहुचाने की बात कर रहे हैं. अखिलेश की एंबुलेंस सेवा कई जिलों में सराही जा चुकी है. इसमें कई जगह शिकायत भी आती है पर इस योजना को लोग चाहते हैं. गांव में गंभीर मरीज खासकर अगर कोई गरीब परिवार का  है तो वह सारी उम्मीद छोड़ देता है. ऐसे में इस तरह की योजना लोकप्रिय हो रही है. यही वजह है कि लोग अखिलेश पर यकीन कर रहे हैं. हालांकि समाजवादी पार्टी के स्थानीय नेताओं का क्षेत्र पर कितना और कैसा असर है यह ज्यादा महत्व रखता है. यदि उनकी छवि ठीक नहीं हुई तो अखिलेश भी कुछ नहीं कर पायेंगे. इसके साथ ही अखिलेश कांग्रेस गठबंधन पर ठीक से फोकस कर रहे हैं. कांग्रेस यानी इंदिरा नेहरू की विरासत के राजनैतिक प्रतिनिधि आज भी गांव-गांव में मौजूद हैं. इनका कुछ हद तक फायदा समाजवादी पार्टी को मिल सकता है. बहरहाल बदले हुए इस अखिलेश से मोदी का लोकसभा चुनाव अभियान याद आता है. इस चुनाव में बाहरी उम्मीदवारों के चलते भाजपा बचाव की मुद्रा में ही तो भीतरी दबाव से मुक्त होकर अखिलेश आत्मविश्वास से लबरेज हैं. यह तो शुरुआत है कुछ दिन इंतजार करे तो माहौल को ठीक से समझ पायेंगे. शुक्रवार 
फोटो -निघासन की सभा में मुस्लिम महिलाएं 
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