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लो फिर बसंत आई

अटल बिहारी शर्मा

बसंत का नाम सुनते ही तन मन में एक खास तरह की उमंग भर जाती है . भारत भूमि परम भाग्यशाली है , हमे प्रकृति ने छह ऋतूओ का वरदान दिया है -वसंत/बसंत ऋतू, ग्रीष्म ऋतू , वेर्षा ऋतू ,शरद ऋतू ,हेमंत ऋतू और शिशिर ऋतू . ऋतूओ के राजा है ऋतुराज बसंत.जैसे ही भगवान सूर्य मकर राशी में प्रवेश कर  उत्तरायण  होते हैं, दिन बड़े और प्रकाशमान होने लगते हैं . वातावरण में एक सुहानी गरमाहट आने लगती है . बसंतराज अपने आने का उद्घोष करने लगते है. पृथ्वी पर धानी चादर पसर जाती है . सरसों के पीले फुल चहूँ और छा जाते हैं . जैसे धरती वसंती चुनर ओढ़े बसंत राज का स्वागत करने को आतुर हो. मंद मंद ब्यार, चहूँ और पल्लव और पुष्पों ने जैसे प्रकृति का श्रृंगार किया हो, वातावरण मदमाती सुगंध से भर जाता है . प्राणियों के कलरव और पक्षियों की चहचाहट वातावरण को संगीत की सुमुधुर लहरियों से गुंजायमान कर देती. मनमोर नाचने लगता है.उदासी दूर होकर, वातावरण आल्हाद से भर जाता है , आनंद और उल्लास से प्राणी मात्र झूम उठता है, तन मन नाचने लगता है.  योगिराज कृष्ण ने  कहा है कि मै ऋतूओ में बसंत हूँ . माघ मास की पंचमी पूरे दक्षिण एशिया के भूखंड में धूम धाम से मनाई जाती है.
माँ सरस्वती और वसंत.
बसंत पंचमी को बड़े धूम धाम से वीणा वादिनी माँ सरस्वती की पूजा की जाती है. लोग देवी मंदिरों में नाचते गाते पूजा अर्चना के लिए जाते हैं और माँ सरस्वती को सरसों के पीले फूल अर्पित करते हैं. शिक्षा आरम्भ करने के लिए यह एक बड़ा पवित्र दिन माना जाता है बच्चो को पाठशाला में प्रवेश दिलाया जाता था . गीत-संगीतकार ,लेखक , वादक चित्रकार आदि सभी इस दिन अपने गुरु से दीक्षा लेकर अध्ययन आरम्भ करते हैं.
ऐसी मान्यता है कि जब ब्रह्मा जी सृष्टि की रचना कर रहे थे. भगवान विष्णु ने ब्रह्मा जी को मनुष्य की रचना करने का आग्रह किया और तदनुरूप ब्रह्माजी ने मनुष्य  की रचना की. परन्तु अपनी इस रचना से ब्रह्माजी को कोई खास समाधान या संतुष्टि नहीं हुई. कुछ सूना सूना महसूस होता था, एक खालीपन की कहीं कुछ कमी रह गई. एक रिक्तता का अहसास महसूस होता था. तब श्री नारायण की सलाह लेकर ब्रह्मा जी ने इस कमी को दूर करने के लिए संकल्प किया और अपने कमंडल से पृथ्वी पर जल छिड़का , जल कणों के पृथ्वी पर गिरते ही धरती में कम्पन होने लगा . एक दिव्य प्रकाश के बीच; एक चारभुजा धारी देवी का स्वरूप प्रकट हुआ . जिनके एक हाथ में वीणा सुशोभित थी दूसरा हाथ वरदान देने की मुद्रा में था , तीसरे हाथ में ग्रन्थ/पुस्तक और चौथे हाथ में मनको की माला धारण की हुई थी. ब्रह्मा जी , माँ सरस्वती का सौम्य और दिव्य दर्शन कर अभिभूत हुये. उन्होंने माँ सरस्वती से वीणा वादन करने का अनुरोध किया . जैसे ही माँ सरस्वती ने वीणा वादन शुरू किया, पूरा वातावरण सुमधुर संगीत लहरी से गुंजायमान हो गया, और ऐसी मान्यता है की संसार के जीव-जन्तुओ  और प्राणियों को वाणीप्राप्त हुई और प्रकृति सुर –संगीत की स्वर लहरियों से सज गई.  तभी ब्रह्मा जी ने उन्हें वाणी की देवी सरस्वती कहा, माँ सरस्वती और विद्या की दात्री देवी हैं. इसी लिए वसंत पंचमी को माँ सरस्वती की पूजा होती है और उनका प्राकट्य दिवस आधुनिक भाषा में कहें तो जन्म दिवस मनाया जाता है.महाऋषि वाल्मीकि ने रामायण में बसंत का अद्भुत और मनमोहक वर्णन किया है . महाकवि कालिदास का बसंत ऋतू का वर्णनं तो अप्रितम है. श्रृंगाररस  के अनेक कवियों को भी ऋतुराज रचना के लिए प्रेरित करते रहे हैं .
लोकरंजन में बसंत
बढ़ते शहरीकरन ने हमें अपनी जड़ों ,संस्कृति और परम्पराओ से विलग कर दिया है. ऋतूओ के परिवर्तन और प्रकृति के सौन्दर्य को महसूस करना तो दूर अब हमें रात दिन का भी भान  नहीं रहता . कब सूर्य उदय हुआ कब अस्त पता ही नहीं चलता. तारों का और आकाश दर्शन तो दूर की बात हैं. पक्षियों का कलरव संगीत तो क्या पक्षियों के दर्शन भी नहीं होते.पहले वसंत पंचमी को एक उत्सव सा माहौल रहता था. लोग वसंती /पीले रंग के कपडे पहनते थे, या कम से कम एक रुमाल ही पीला/पियर रंग में रंगकर अपने कुरते पर टांक लेते थे. घरों में मीठे पीले चावल बनते थे , पीले फूलों को एक दूसरे को देकर अभिन्दन करते थे. गीत संगीत , नाच गाने से उत्साह का वातावरण बन जाता था. ग्रामीण अंचलों मे यह परंपरा अभी भी जारी है.
होली और बसंत
 बसन्त पंचमी के साथ ही होली उत्सव का भी प्रारंभ हो जाता है. सगुन विचार कर जिस स्थान पर होली दहन होता है वहां पांच उपले रख दिए जाते है. इसे वसंत रखना कहते हैं. फिर सभी ग्रामीण अपने अपने सामर्थ्य के अनुसार उसमे ईन्धन रखते जाते है. और इसी के साथ होली गीतों का गायन और नृत्य भी शुरू हो जाता है. कोई मेंहमान भी इस दौरान आ जाये तो उसको पीले और गुलाबी रंग से सरोबार कर दिया जाता है.
सूफी संप्रदाय और बसंत
 
सूफी संप्रदाय और दरगाहों पर भी बसंत धूम धाम से मनाया जाता है . आज भी पाकिस्तान, अफगानिस्तान आदि में भी बसंत मनाने की परम्परा है. लोग इस दिन पीले कपडे पहनते हैं. एक दूसरे को पीले फूल देते हैं  और घरों में पीले मीठे चावल जिसे जर्दा भी कहते है बनाया जाता है. लोग दरगाहों में जाते हैं और पतंगबाजी कर आनंदोत्सव मानते हैं.
इस बारे में किंवदंती प्रचलित है कि एक बार हजरत निजामुद्दीन औलिया अवसाद में चले गये, उन्हें प्रसन्न करने के कोई उपाय कारगर साबित नही हुये. उनके शिष्य और अनुयायी इस स्थिति से व्यथित थे . अपने कुछ साथियों के साथ हजरत के परम शिष्य  अमीर खुसरों उनसे मिलने आ रहे थे. रास्ते में उन्हें हर तरफ सरसों के लहराते झूमते फूलो के दर्शन हुये. मंद मंद ब्यार जैसे फूलों को झूला रही हों. उनका मन पुलकित हो गया. उन्होंने पीले कपडे और हाथों में पीले फुल लिए नर-नारियों को नाचते गाते जाते देखा . जो दिल्ली के प्रसिद्ध शक्तिस्थल कालिका जी मंदिर जा रहे थे.  अमिर खुसरों ने उनसे पूछा की आप इतनी मस्ती में झूमते गाते कहाँ जा रहे है ! लोगो ने बताया की वे देवी मंदिर में माँ सरस्वती की पूजा अर्चना के लिए जा रहे हैं . मंदिर में सरसों के पीले फूल और पीले मीठे चावल अर्पित करेंगे.
अमिर खुसरों ख़ुशी से झूम उठे और उन्होंने कुछ सरसों के फूल अपने साथ ले लिए और उन्हें अपनी पगड़ी कान और कपडे आदि में सजा लिया . और वो नाचते गाते हज़रत निजामुद्दीन के समक्ष उपस्थित हुये. उन्हें इस रूप में देखकर हंसी मजाक का वातावरण बन गया हजरत निजामुद्दीन भी अवसाद से बाहर आ गये. और उन्होंने आनंद की स्थिति में खुसरो से पूछा कि क्या रूप बना रखा है? अमिर खुसरों ने सब बात बताई और उसके बाद आनंदोत्सव शुरू हुआ. आज भी निजामुद्दीन दरगाह में बसन्त पंचमी धूम् धाम से मनाई जाती है , पीले कपडे पहने जाते हैं और एक दुसरे को पीले फूल देते हैं और गीत संगीत होता है.
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