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मोदी को ऐसी भाषा शोभा नहीं देती -गहलौत

धीरेंद्र श्रीवास्तव

लखनऊ. उत्तर प्रदेश में दो चरण के मतदान हो चुके हैं. 140 सीटों पर हुए इस मतदान में तमाम कोशिशों के बावजूद सांप्रदायिक ध्रुवीकरण नहीं हो सका. इसे लेकर भाजपा की हताशा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की भाव-भंगिमा और उनके भाषणों में नजर आ रही है. राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री और अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के महासचिव अशोक गहलौत का मानना है कि प्रधानमंत्री को कितनी भी विपरीत परिस्थिति में ऐसी भाषा नहीं बोलनी चाहिये. प्रदेश कांग्रेस कार्यालय में शाम का वक्त है जब गहलौत वरिष्ठï पार्टी नेता सिराज मेहदी के साथ आते हैं. दिन भर के काम की कोई थकान उनके चेहरे पर नहीं है. कभी शिरकी सल्तनत की राजधानी रहे जौनपुर से ताल्लुक रखने वाले मेहदी भी एकदम तरोताजा दिखे. प्रस्तुत है बातचीत के प्रमुख अंश: 

 
उत्तर प्रदेश के दो चरणों में आपके गठबंधन की क्या स्थिति है?
इस चुनाव में तीन प्रमुख दावेदार मैदान में हैं. पहला,कांग्रेस- समाजवादी पार्टी गठबंधन, दूसरा- बहुजन समाज पार्टी, तीसरा- भारतीय जनता पार्टी. तीनों के नेताओं की भाव-भंगिमा आपको बता देगी कि जमीनी हालात क्या हैं. इस मामले में आपलोग हमलोगों से बेहतर समझ रखते हैं. क्यों सिराज, सही है न? जहां न पहुंचे रवि, वहां पहुंचे कवि, यानी पत्रकार.
 
हम आपके मुंह से इसका जवाब सुनना चाहते हैं? बिना लागलपेट के. साफ-साफ?
हमें देखिये. सुबह से निकले हैं. जैसे कार्यालय में प्रवेश किये, आप लोगों से भेंट हो गयी. प्रसन्न वातावरण में बातचीत हो रही है. यानी दो चरणों की रिपोर्ट हमारे मन माफिक है. हम सफाया कर रहे हैं. उत्तर प्रदेश की जनता कांग्रेस-समाजवादी पार्टी गठबंधन को प्रचंड बहुमत देने जा रही है. इसलिए दिनभर की भागदौड़ के बाद भी हम प्रसन्न हैं.
वहीं नरेंद्र मोदी की भाषा देखिये. भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह की भाषा देखिये. सुनकर बोध होता है कि धमकी दे रहे हैं. हम अमित शाह से हम कोई उम्मीद नहीं रखते लेकिन मोदी तो देश के प्रधानमंत्री हैं. उन्हें अपने पद की मर्यादा का ध्यान रखना चाहिये. उन्हें धमकी वाली भाषा का प्रयोग नहीं करना चाहिये. मायावती सफाई दे रही हैं कि बसपा को बहुमत नहीं मिला तो हम विपक्ष में बैठेंगे. भाजपा के साथ मिलकर सरकार नहीं बनायेंगे. अचानक यह सफाई क्यों? मतलब पता चल गया है कि कांग्रेस और समाजवादी पार्टी का गठबंधन दो चरणों में काफी आगे निकल चुका है.
 
मोदी या अमित शाह धमकी वाली भाषा का प्रयोग क्यों कर रहे हैं?
भाजपा के नेताओं को उम्मीद थी कि वे भड़काऊ भाषण कराकर सांप्रदायिक आधार पर ध्रुवीकरण करा लेंगे. इसके लिए इलाकाई दंगाई नेताओं के साथ साक्षी महाराज और योगी आदित्य नाथ को विशेष तौर पर लगाया गया. इन लोगों को छोडिय़े. भारत सरकार का गृह राज्य मंत्री चुनाव के बीच बयान दे रहा है कि देश में हिंदुओ की संख्या घट रही है. क्या मतलब है इसका? साक्षी महाराज, योगी आदित्यनाथ से लेकर भारत सरकार के गृह राज्य मंत्री के बयान का? इन लोगों के बयान देश के सद्भाव के लिए भी खतरा पैदा करने वाले हैं. अच्छी बात है कि ये प्रलाप करते रहे लेकिन दूसरे पक्ष ने जवाब नहीं दिया. इसीलिए ये विफल रहे. यानी बिहार की तरह उत्तर प्रदेश में भी जीत का सपना चूर. 
ईश्वर की कृपा कहिये. ये लोग एक तरफा प्रलाप करते रहे, दूसरे पक्ष ने इसका जवाब नहीं दिया. इसलिए इन लोगों की हर योजना फेल हो गयी. योजना फेल होने का मतलब है कि बिहार की तरह उत्तर प्रदेश जीतने का सपना भी चकनाचूर. इसलिए प्रधानमंत्री गुस्से में हैं. धमकी की भाषा बोल रहे हैं.
 
आपके प्रचंड बहुमत का आधार केवल भाव भंगिमा ही है क्या?
वह एक पहलू है लेकिन केवल वही नहीं है. इसका ठोस आधार है ग्राउंड रिपोर्ट. मसलन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र को लीजिये. वाराणसी संसदीय क्षेत्र में कुल पांच सीटें हैं. यहां इस बार भाजपा का खाता नहीं खुलने वाला है. इसमें से शहर की तीन सीटों पर तो भाजपा लंबे समय से काबिज रही है. जब वाराणसी की यह स्थिति है तो और जगह की स्थिति की कल्पना खुद कर लीजिये.
 
कांग्रेस और सपा के बीच कितनी सीटों पर मतभेद है?
कुछ सीटों पर मतभेद है. बातचीत से हल निकाला जा रहा है. इसके तहत कुछ को हमने वापस लिया है. कुछ को सपा ने वापस लिया है. कुछ और सीटों पर भी ऐसा हो सकता है.
 
क्या इन सीटों में अमेठी और रायबरेली की सीटें भी हैं?
यह चुनाव है. एक ही दल के कार्यकर्ता इसे अपनी अपनी नजऱ से देखते हैं. कोई किसी को मजबूत बताता है तो कोई किसी को. नेतृत्व इसी में आम सहमति तलाशता है. हर संभव कोशिश के बाद भी कुछ सीटों पर मतभेद विद्रोह तक जाता है. यह तो दो दलों का गठबंधन है. मतभेद होने स्वाभाविक हैं. इसे शार्ट आउट किया जा रहा है. इसके तहत कांग्रेस ने लखनऊ मध्य, बिंदकी, सोरांव, पयागपुर छांव से अपने प्रत्याशी हटा लिए तो समाजवादी पार्टी ने महाराजपुर, कानपुर कैंट, कोरांव, बार तथा महरौनी से अपने प्रत्याशी वापस ले लिए हैं. अमेठी और रायबरेली से हमारे नेता राहुल गांधी और सोनिया गांधी सांसद हैं. हर कांग्रेसी चाहेगा कि इन दोनों क्षेत्रों की सभी सीटें हम लड़ें. यह अंकगणित का हल नहीं है, यह दिल का सवाल है. हम उम्मीद करते हैं कि समाजवादी पार्टी के साथी हमारी इस भावना का सम्मान करेंगे और जो मैदान में बने हुए हैं, अपना नाम वापस लेंगे.
 
प्रधानमंत्री अपनी सभाओं में कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के गठबंधन को अपवित्र गठबंधन बता रहे हैं.
भाजपा ने प्रत्यक्ष रूप से भी कई जाति आधारित दलों से गठबंधन किया है. प्रधानमंत्री को बताना चाहिये कि यह गठबंधन पवित्र है या अपवित्र? प्रधानमंत्री को जुमलों के बल पर पार्टी को सत्ता में लाने का श्रेय है. अब उसकी नैया डुबाने का श्रेय भी उन्हें मिलने वाला है. इसलिए वह डरे हुए हैं. इसी डर में वह अपनी बेचैनी बयां कर रहे हैं. वरना सच यह है कि राहुल गांधी और अखिलेश यादव की दोस्ती यानी कांग्रेस-समाजवादी गठबंधन केवल उत्तर प्रदेश का नहीं, देश के भी भविष्य की दिशा तय करेगा.
 
प्रधानमंत्री बोल रहे हैं कि भाजपा की सरकार बनी तो किसानों की कर्ज माफी की जिम्मेदारी उनकी है. किसान बहुल उत्तर प्रदेश में उनके इस महत्वपूर्ण बयान का असर?
लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री ने कहा था कि विदेशों में रखा कला धन लायेंगे. देश के हर आदमी के खाते में जायेगा 15-15 लाख रुपया. आया क्या? नहीं आया. उलटे नोटबंदी के नाम पर गुल्लक का पैसा भी बैंक में रखवा लिया. अपना ही पैसा निकालने पर पाबंदी लगा दी. पूरे देश को लाइन में खड़ा कर दिया. लोगों की जानें गयीं और प्रधानमंत्री को अपने इस कृत्य पर अफ़सोस भी नहीं है. उन्हें पता है कि लोग अपने वोट का प्रयोग कर इसकी सजा देने वाले हैं तो अब नये वादे कर रहे हैं. 
 
प्रधानमंत्री कांग्रेस से 70 साल का हिसाब मांग रहे हैं. कांगेस क्यों नहीं दे रही है?
आज मंगल पर भी भारत का परचम लहरा रहा है. दुश्मन को सबक सिखा देने वाले मारक हथियार भी हम खुद बना रहे हैं. भारत ने सुई से शुरू किया और अब ऐसी कौन सी चीज है जो भारत नहीं बना रहा है या नहीं बना सकता है. यही नहीं, 18 वर्ष के युवाओं को मत देने का अधिकार, रोजगार की गारंटी, सूचना का अधिकार, पंचायतों को मजबूती, पंचायतों और निकायों में महिलाओं को आरक्षण, दूर संचार क्रांति क्या क्या गिनायें? इस देश में जो कुछ हुआ है, कांग्रेस के कार्यकाल में ही हुआ है. मोदी जी को बताना चाहिये कि उन्होंने ढाई साल में क्या किया? सिर्फ जुमलों की खेती. प्रधानमंत्री की कुछ खुद करने के मामले में स्थिति तीसरे वैज्ञनिक वाली है.
 
तीसरे वैज्ञानिक का मतलब ?
दो दिन पहले एक मिलने वाले ने हमें एक किस्सा सुनाया कि तीन वैज्ञानिक अपनी अपनी शोध क्षमता पर बहस कर रहे थे. इसमें एक ने कहा कि मैं  ऐसा तार बना सकता हूं जिसे कोई देख नहीं सकता है. दूसरे ने कहा कि मैं इस तार में छेद कर सकता हूं. तीसरे ने कहा कि मैं इस तार पर 'मेड बाई मी' की मोहर लगा सकता हूं. प्रधानमंत्री हों या उनके मंत्री या उनके मुख्यमंत्री, सब तीसरे वैज्ञानिक हैं. उदाहरण के तौर पर प्रधानमंत्री की प्रथम कश्मीर यात्रा को लीजिये. वह वैष्णो देवी धाम को जोडऩे के लिए जाने वाली ट्रेन का लोकार्पण कर रहे थे. यह योजना कांग्रेस के कार्यकाल बनी. कांग्रेस के कार्यकाल में काम हुआ. और, प्रधानमंत्री ने ऐसा पोज किया कि जैसे यह कार्य उन्होंने कराया है. उन्होंने इस कार्य पर तीसरे वैज्ञानिक की तरह 'मेड बाई मी' की मोहर लगा दी. जयपुर में मेट्रो का काम मेरे कार्यकाल में शुरु हुआ, चलाने का ट्रायल मेरे कार्यकाल में हुआ. भाजपा की मुख्यमंत्री ने तीसरे वैज्ञानिक की तरह मेट्रो पर मोहर लगा दी 'मेड बाई मी'. 
 
आप मतदाताओं से कोई खास अपील करना चाहते हैं?
केवल एक अपील कि मतदान जरूर करें और यह सोचकर करें कि इस देश की गंगा-जमुनी तहजीब खतरे में है, सद्भाव खतरे में है, लोकतंत्र खतरे में है, जेएनयू का नजीब खतरे में है, रोहित वेमुला जैसो की जान खतरे में है, हिंदुस्तान खतरे में है और आपका अमूल्य मत उसकी रक्षा कर सकता है.
 
 
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