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बिगड़े जदयू-राजद के रिश्ते

गिरधारीलाल जोशी

नयी दिल्‍ली/पटना. आखिरकार सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर बाहुबली शहाबुद्दीन को  बिहार की सीवान जेल से तिहाड़ जेल  शिफ्ट करना पड़ा. रातोरात सीवान से पटना बेउर जेल उसके बाद सम्पूर्ण क्रांति ट्रेन से दिल्ली भेजा. पूरे 25 पुलिसबल की सुरक्षा में उन्हें तिहाड़ रवाना करने में प्रशासन को पूरी मशक्कत करनी पड़ी. मगर इससे एक सवाल तो उठने लगा है कि क्या जदयू और राजद के रिश्तों में खटास आ रही हैं.
 
बता दें कि खटास की नींव तो उसी रोज पड़ गई थी जब बीते साल 10 सितंबर को 11 साल बाद  भागलपुर जेल से निकले बाहुबली पूर्व सांसद शहाबुद्दीन ने  जब नीतीश कुमार को परिस्थितिजन्य मुख्यमंत्री बताया था तो उस रोज जदयू के बेलहर से विधायक गिरधारी यादव भी मौजूद थे. भागलपुर की विशेष केंद्रीय कारा से निकलने पर वे उनकी अगुवाई और खैरमकदम करने यहां आए थे और शहाबुद्दीन के साथ सिवान तक गए थे.
उस वक्त उनकी मौजूदगी से तरह तरह के कयास लगाए जा रहे थे. जिसकी आशंका आज भी कायम है. असल में नीतीश कुमार पर उनकी तल्ख टिपण्णी को किसी आने वाले सियासी भूचाल की ओर इशारा  माना जा रहा था.  फिलहाल तो गठबंधन के नेता कोई भी तल्ख प्रतिक्रिया देने से बच रहे है. लेकिन उसके बाद शहाबुद्दीन के खिलाफ बिहार सरकार का रवैया जरूर सख्त हुआ. इसी का नतीजा है कि उन्हें जल्द ही तिहाड़ जेल जाना पड़ेगा. सुप्रीम कोर्ट का आदेश है.
 
माना जा रहा है कि बिहार के इतिहास में यह दूसरा मौका है. जब किसी कैदी को सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद तिहाड़ जेल शिफ्ट किया जा रहा है. इससे पहले 14 फ़रवरी 2005 को सुप्रीम कोर्ट ने पप्पू यादव को बेउर जेल पटना से तिहाड़ जेल दिल्ली शिफ्ट करने का आदेश दिया था. पप्पू यादव मधेपुरा लोकसभा सीट से फ़िलहाल सांसद है. उस वक्त विधायक अजित सरकार की हत्या के आरोप में बंद थे. और बेउर जेल में इनपर दरबार लगाने की वजह से सुप्रीम कोर्ट ने शिफ्ट करने का आदेश दिया था. शहाबुद्दीन के मामले में सीवान के चंदा बाबू जिनके तीन बेटों की हत्या कर दी गई और पत्रकार राजीव रंजन की पत्नी आशा रंजन की अपील पर शिफ्ट करने का फैसला सुप्रीम कोर्ट ने दिया है.राजीव रंजन की हत्या का आरोप भी इन पर है. इस बात का सबूत यह है कि भागलपुर जेल से बाहर आते ही मोहम्मद कैफ इनके बगल में खड़ा दिखा. जिसकी फोटो छपी. कैफ का नाम राजीव रंजन की हत्या में है.जिसकी फोटू राजद सुप्रीमो लालुप्रसद के बड़े बेटे तेजप्रताप के साथ भी वायरल हुई थी. सुप्रीम कोर्ट में तेजप्रताप पर भी एफआईआर करने के लिए याचिका दायर की है.
 
भागलपुर जेल से निकलते ही शहाबुद्दीन ने नीतीश कुमार को परिस्थिति जन्य मुख्यमंत्री तो बताया ही था साथ ही बोले राजनीति मेरा पेशा नहीं है. मगर मेरे नेता बीते 27 सालों से लालू प्रसाद है. मेरा और कोई नेता नहीं है.  मालूम हो कि शहाबुद्दीन राजद की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य है.  नीतीश कुमार को परिस्थितिजन्य मुख्यमंत्री बोलने का मतलब कुछ तो निकलता है. कहीं न कहीं दाल में काला है? यह संशय आज भी बरक़रार है.
संशय को बल तब मिला जब  जेल गेट पर जुटी  समर्थकों की भीड़ में जद(एकी) के बेलहर से विधायक गिरधारी यादव दिखे.  वे तो उनके साथ सीवान तक गए. राजद के विधायक सांसद का वहां मौजूद होना तो लाजमी था. लेकिन गिरधारी यादव की मौजूदगी सवालिया निशान खड़ा करती है. इस पर जद (एकी) आज तक चुप्पी साधे है.
उस वक्त बिहार के काबीना मंत्री राजीव रंजन उर्फ ललन सिंह पत्रकारों से बोले कि संबिधान में परिस्थितिजन्य मुख्यमंत्री बोलकर कहीं व्याख्या नहीं है. ये जद (एकी) कोटे से मंत्री है. सुलतानगंज के जद (एकी) विधायक सुबोध राय को तो इस बारे में कुछ पता न होने बात बोलते है. गोपालपुर के जद (एकी) विधायक नीरज कुमार उर्फ गोपाल मंडल साफगोई से बोले कि नीतीश कुमार किसी भी हालात जंगलराज की वापसी नहीं होने देंगे. भागलपुर शहरी इलाके के कांग्रेसी विधायक अजित शर्मा बोलते है महागठबंधन पर इसका कोई असर नही होने वाला. भागलपुर के राजद सांसद बुलो मंडल भी उनकी निजी राय बताकर टाल गए.  मगर विरोधी दल खासकर भाजपा के लोग हमला बोलते है. चाहे पटना में सुशील मोदी हो या अश्विनी कुमार चौबे. बोलते है लालू ने छोटे भाई के सुशासन की पोल खोल दी.
 
      यह बात भी पक्की है कि नीतीश कुमार के पहली पाली में मुख्यमंत्री बनने पर बिहार के ए क्लास हिस्ट्रीशीटरों को त्वरित सजा दिलाने के वास्ते विशेष अदलतों का गठन किया था. ए क्लास का मतलब न सुधरने वाले अपराधी. शहाबुद्दीन का नाम इसी सूची में था. दो दर्जन से ज्यादा आपराधिक मामले दर्ज है. आधा दर्जन से जयादा में फैसले के खिलाफ आपराधिक अपील ऊपरी अदालत में दायर है.
 
        नीतीश कुमार ने मुख्यमंत्री बन पहली पारी भाजपा के साथ मिलकर शासन किया. और अबकी यानी दूसरी पारी का शासन जद (एकी)  राजद और कांग्रेस का महागठबंधन के हाथ में है. जिसके मुखिया नीतीश कुमार है. लेकिन शहाबुद्दीन के 11 साल बाद जमानत पर जेल से बाहर आने पर कई सवाल खड़े जरूर  हुए थे. इससे सुशासन  बाबू का शासन कमजोर होने की चर्चा राजनीतिक हलकों  हुई. खासकर परिस्थितिजन्य मुख्यमंत्री वाला शहाबुद्दीन का बयान तो साबित ही कर दिया था . जाहिर है कुछ न कुछ अंदर ही अंदर खिचड़ी पक रही थी. यही बयान नीतीश कुमार को नागवार लगा. और बगैर किसी की परवाह किए बिहार सरकार शहाबुद्दीन मामले में सख्त हो गई.
       
     कयास लगाया जा रहा है कि ' माई ' समीकरण वाले दूसरे दलों के विधायकों को एक जुटकर कुछ गुल खिलाने की विसात बिछाई जा रही है.ताकि तेजस्वी यादव को मुख्यमंत्री बनाया जा सके. जद (एकी) के वेलहर से विधायक गिरधारी यादव की शहाबुद्दीन के काफिले में मौजूदगी भी यह संकेत देती है. मालुम रहे कि गिरधारी यादव की राजनीति धुरी लालूप्रसाद ही है.राजद से विधायक और बांका से सांसद रहे है. इसलिए यह रिश्ता कुछ कहता है. इधर गया विधान परिषद सीट को लेकर भी महागठबंधन में भूचाल आया है. तभी सभी दलों ने अपने प्रत्याशी उतार दिए है. भाजपा भी लड़ रही है.
 
 
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