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कहानी एक पहाड़ी शहर की कुशीनगर में लोकरंग का रंग कौन हैं ये तिरंगा वाले रीढ़ वाले संपादक थे निहाल सिंह
ई राज्ज्ज़ा काशी है
चंचल 
हौफ़ा लेकर निकलता है संघी गिरोह. एक से एक अफवाह, भद्दी से भद्दी भाषा का उच्चारण, चरित्र हनन और अंत में पाकिस्तान का समर्थक होने का प्रमाणपत्र. इसके अलावा क्या है इस गिरोह के पास? लेकिन यही इनका अंत भी है. उत्तर प्रदेश डगर दिखा रहा है. पूर्वी उत्तर प्रदेश से हैं. बनारस, जौनपुर, आजमगढ़, मिर्जापुर व सोनभद्र में 'अपसय में' निपट ले रहे हैं. समूचा पूर्वी हिस्सा ही इनके लिए खंडहर हो गया है. हम जहां से वोटर हैं यहां तो बुरी हाल में भाजपा है. चार पीढ़ी से जो परिवार संघ, जनसंघ व भाजपा की अलम्बरदारी करता आ रहा था, सिंगरामऊ राज परिवार, उन्हें इस बार उम्मीदवार न बनाकर एक ठेकेदार को टिकट दिया जो पिछले चुनाव में बसपा का उम्मीदवार था. कुँवर मृगेंद्र सिंहः भाजपा से विद्रोह कर रालोद से उम्मीदवार बनकर जौनपुर के बदलापुर विधानसभा सीट से चुनाव मैदान में हैं और लगता हैं रालोद का खाता यहां से खुल जाएगा. यहां की हर बिरादरी में मृगेंद्र सिंह का परिवार आदर की दृष्टि से देखा जाता है और लोग खुलकर साथ दे रहे हैं. 
जो खांटी कांग्रेसी हैं इस इलाके में उन्हें भी एक अच्छा मौका मिल गया है- भाई जब अखिलेश, राहुल मिलकर सरकार बनाएंगे तो रालोद को मिलाएंगे ही तो हम यहीं से शुरुआत कर दें. राजनीति है. यह केवल दिल्ली और लखनऊ में ही थोड़े होती है, बदलापुर भी राजनीति करता है. और बनारस? 
काशी फगुआ में है और सियासत सौंफ फांक रही है. अगरचे राज बब्बर कहीं मौजूद रहें और लोग चैन की सांस लें? असंभव. राज इन दिनों काशी में है- क्या मजाक करते हो यार! हम काशी में बोलेंगें? हमारी हिम्मत? हम तो काशी को सुनने आये हैं, समझने आये हैं, भैया हम काशी को जानते हैं याचक हूँ जो भी प्रसाद मिल जाएगा लेकर संतोष कर लूंगा.' और राजबब्बर वोट मांगने में व्यस्त हो गए. भाजपा के पास राज के सवालों का जवाब नहीं है. राज आये हैं कांग्रेस के लिए, सपा के लिए, अजय राय के लिए. काशी का तेवर है यह बंदा, पूरे देश ने देखा है. कल काशी मजा लेगी, दंगल देखेगी, युगल जोड़ी राहुल गांधी अखिलेश एक साथ एक मंच पर गली-गली में घूमेंगे. दूसरी तरफ जाएद के नाम ले, अल सुबह? देश दुनिया के सारे पत्रकार काशी में. तीनों तरह के पत्रकार. दमदार, दुमदार और बेदुमदार तीनों आये हैं. मत नाप काशी को अपनी अंगुलियों से, वो कुछ नहीं बोलेगा. यह काशी है घोड़ा नस काट देता है. कटेगी नस गोदौलिया पे और पता चलेगा गोधरा पहुंचने पर. चढ़ चुकी हांडी दुबारा नहीं चढ़ेगी, समझे उचक्कों! 

ई राज्ज्ज़ा काशी है... 

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