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बागियों को शह देते मुलायम गैर भाजपावाद की नई पहल दम तोड़ रही है नैनी झील अखिलेश पर दबाव बढ़ा रहें है मुलायम
बनारस में बैठ गई सरकार

धीरेन्द्र श्रीवास्तव

वाराणसी . उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2017 के लिए हो रहे मतदान में 2019 लोकसभा का भी संदेश निहित है. इसी संदेश को अपने पक्ष में 313 क्षेत्रों में मतदान हो जाने के बाद भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भारत सरकार के एक दर्जन से ज्यादा मंत्रियों के साथ हांफ रहे हैं.बनारस की हर गली में  कोई न कोई केंद्रीय मंत्री धूल फांकता नजर आ जाएगा .राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ के बाहर से आए सैकड़ों कार्यकर्त्ता बनारस वमे उतार दिए गए हैं .बनारस में भाजपा ज्यादा आशंकित है इसलिए कोई कोर कसर नहीं छोड़ रही है पार्टी .दूसरी तरफ इसी संदेश के लिए कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी का हाथ समाजवादी साइकिल की हैंडिल पकड़े हुए है. यह चुनाव उत्तर प्रदेश की तकदीर लिखने के लिए हो ही रहा है. इसलिए मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के लिए भी यह चुनाव जीवन-मरण का प्रश्न है. इसे जय में बदलने के लिए वह और उनकी पत्नी सांसद डिम्प्पल यादव दिनरात एक किए हैं. बसपा प्रमुख मायावती को भी पता है कि यह चुनाव उनके लिए अभी नहीं, तो कभी नहीं वाला है. इसलिए वह भी कहीं बुंदेलखण्ड तो कहीं पूर्वांचल राज्य जैसे मुद्दों को भी हवा दे रही हैं.
सच भी यही है कि विधानसभा 2017 का चुनाव उत्तर प्रदेश के लिए ही हो रहा है, लेकिन प्रारंभिक चरण में ही भाजपा की ओर से राज्यसभा में बहुमत का सवाल उठा दिया गया, अगले राष्ट्रपति चुनाव की तरफ इशारा कर दिया गया, इसलिए यह चुनाव राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में भी देखा जाने लगा है. इसकी शुरुआत में ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बात शुरू की,  कास्ट, करप्शन, विकास, बिजली, कर्जमाफी से और चले गए श्‍मसान-कब्रिस्तान तक. उन्होंने बीएसपी की नई परिभाषा भी दी. मायावती ने भी इसका तीखा प्रतिवाद किया और प्रधानमंत्री नरेंद्र दास मोदी के ही नाम का नया विश्लेषण कर दिया. 
इसी दौरान भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष अमित शाह ने कांग्रेस, सपा और बसपा को ‘कसाब’ का नाम दिया. जवाब में मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने सदी के महानायक अभिताभ बच्चन से आग्रह कर दिया कि वे गुजरात के गधों का प्रचार नहीं करें. ये  टिप्पणी भाजपा को बुकी लाल मिर्च की तरह लगी. जवाब में प्रत्यारोप की झड़ी लग गयी. अमर्यादित टिप्पणी करने वाले भी मर्यादित भाषा बोलने की सलाह देने लगे. और इस महत्वपूर्ण चुनाव में गदहा और कसाब जैसे शब्द भी स्थान बनाने में कामयाब रहे.
अच्छी बात यह रही कि आम मतदाता ने इन टिप्पणियों में निहित मंशा को भांप लिया. वह तटस्थ बना रहा और उत्तर प्रदेश में पांच चरणों का मतदान सकुशल सम्पन्न हो गया जहां के बारे में प्रधानमंत्री की राय है कि यहां महिलाएं दिन में भी घर से बाहर निकलने में डरती हैं. अब बारी उन अंतिम दो चरणों की है जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का वाराणसी और समाजवादी पार्टी के संरक्षक मुलायम सिंह यादव का आज़मगढ़ संसदीय क्षेत्र भी है.  
यहां की हार जीत का आंकलन राष्ट्रीय राजनीति में भी भाजपा और सपा की घटती-बढ़ती साख से जोड़कर देखा जायेगा. इसलिए इन दसों क्षेत्रों का महत्व राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में भी है. इसका बोध भारतीय जनता पार्टी को भी है और समाजवादी पार्टी-कांग्रस गठबंधन को भी. इसलिए दोनों क्षेत्रों की सभी सीटें जीतने के लिए दोनों ओर से पूरी ताकत झोंकी गयी है. 
यूं तो भाजपा वाराणसी जिले की सभी सीटें जीतकर संदेश देना चाहती है कि वाराणसी केवल मोदी की है. संसदीय क्षेत्र की पांच सीटें तो वह किसी कीमत पर जीतना चाहती है. इसमें से वाराणसी संसदीय संसदीय क्षेत्र की पांच में से तीन सीटें,  शहर उत्तरी, दक्षिणी और कैंट पर भाजपा का कब्जा है और सेवापुरी तथा रोहनिया पर समाजवादी पार्टी का. गत लोकसभा चुनाव में इन पांचों क्षेत्रों में मोदी को भारी बढ़त मिली थी. भाजपा को पता है कि यह बढ़त घटी या पटकनी मिली तो पूरे देश में मोदी की किरकिरी होगी. इसका 2019 पर भी असर पड़ेगा. इसलिए यहां बढ़त बनाए रखने और जीत के लिए भारत सरकार के बड़े-बड़े वजीर हांफ रहे हैं.
ठीक इसके विपरीत सपा कांग्रेस गठबंधन को पता है कि वाराणसी में शिकस्त माने 2019 के लिए मोदी की उलटी गिनती. इस चुनाव में शहर की तीनों सीटें कांग्रेस के पास हैं, इसलिए कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी के लिए भी यहां जीत काफी मायने रखती है. भाजपा में टिकट को लेकर हुई बगावत को लेकर यहां सपा कांग्रेस गठबंधन काफी उत्साहित भी है. परिणाम है कि गठबंधन के प्रत्याशी शहर की उन सीटों पर भी कांटे के संघर्ष में दिख रहे हैं जो भाजपा के गढ़ माने जाते हैं. 
आज़मगढ़ वह संसदीय क्षेत्र है, जो मोदी लहर में सपा के साथ रहा. यहां से सपा के संरक्षक मुलायम सिंह यादव सांसद हैं. इस जिले की दस में से नौ सीटें सपा के पास हैं. केवल एक सीट मुबारकपुर सपा के पास नहीं है. सभी को पता है कि सपा के संरक्षक मुलायम सिंह यादव इस चुनाव में प्रचार के लिए नहीं निकले हैं. इसके बाद भी यह सीटें सपा के साथ रहती हैं तो इसी चुनाव में ही यह तय हो जायेगा कि सपा के  2019 के भी नेता अखिलेश ही हैं. इसलिए सपा भी यहां किसी भी कीमत पर अपना इतिहास दोहराना चाह रही है. भाजपा को भी पता है कि अखिलेश यादव की साइकिल को पंचर करना है तो आज़मगढ़ में ही पटकनी देनी होगी. इसलिए भाजपा भी जीत के लिए हर हथकंडा अपना रही है.
बहुजन समाज पार्टी को भी पता है कि दिल्ली का रास्ता वाया लखनऊ जाता है और लखनऊ के लिए वाराणसी, आज़मगढ़ के साथ ही  मऊ, बलिया, ग़ाज़ीपुर, चंदौली, मिर्जापुर, सोनभद्र आदि जनपदों में भी हाथी का चलना जरूरी है. इसलिए अंतिम दो चरणों के लिए भी वह पूरी ताकत झोंके हुए हैं.
 
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