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पर गढ़ में भी नहीं बंटे मुस्लिम

रंजीव

आजमगढ़.‘उनकी तो रैली में मंच पर कुर्सी भी एक ही लगी थी. किसी मुस्लिम नेता को तो अपने बगल में बिठाया नहीं. अखिलेश की रैली में ऐसा नहीं था. कई लोग साथ बैठे थे.’आजमगढ़ के दीदारगंज विधानसभा क्षेत्र के फरिहा कस्बे के शाह आलम की यह टिप्पणी बहुजन समाज पार्टी की मुखिया मायावती के लिए थी. चुनाव यात्रा के दौरान ऐसी और भी आवाजें पूर्वांचल के कई विधानसभा क्षेत्रों के मुस्लिम मतदाताओं से सुनने को मिलीं.
उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव से पहले ऐसा अनुमान लगाया जा रहा था कि समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी में मुस्लिम वोट का बड़ा बिखराव होगा. बसपा ने प्रत्याशियों की सूची में करीब सौ मुस्लिम प्रत्याशी देकर इस धारणा को और पुख्ता किया. वहीं, मायावती ने चुनाव प्रचार में दलित-मुस्लिम गठजोड़ की अपनी मुहिम को आगे बढ़ाते हुए मुस्लिम मतदाताओं से खुलकर अपील की कि वे सपा नहीं बल्कि बसपा को वोट करें लेकिन जमीन पर उनकी इस अपील का खास असर नहीं दिख रहा.
छठे और सातवें चरण की कई विधानसभा सीटों पर मुस्लिम मतदाताओं से बात करने पर उन्‍होंने स्‍वीकारा कि वोट का कुछ विभाजन होगा लेकिन ज्यादातर लोगों की पहली पसंद समाजवादी पार्टी ही है. बसपा से उनकी यह आम शिकायत दिखी कि वहां न तो सम्मान मिलता है और न तो जरूरत पड़ने पर सुरक्षा. वहीं, सपा के पक्ष में झुकाव की बड़ी वजह यह बताई गई कि मुश्किल घड़ी में पार्टी के स्थानीय कार्यकर्ता साथ खड़े होते हैं.
दीदारगंज क्षेत्र में शाह आलम की नाराजगी इस बात पर थी कि उलमा कौंसिल ने बसपा को अपना समर्थन भी दिया लेकिन उसके ही प्रभाव वाले जिले में मायावती की रैली में भी मंच पर उलमा कौंसिल के किसी नुमाइंदे को जगह तक नहीं मिली. बकौल आलम, मंच पर सिर्फ एक कुर्सी थी जो मायावती के लिए थी लिहाजा सपा बेहतर है क्योंकि अखिलेश यादव की सभा में कई बाकी नेता भी मंच पर बैठे नजर आए.
कुछ ऐसी ही राय मऊ की मधुबन विधानसभा सीट के बहादुरपुर गांव के फिरोज अहमद की भी थी जिनके मुताबिक सपा की मानसिकता है साथ लेकर चलने की जबकि बसपा झुकाने की मानसिकता रखती है. खास बात यह है कि इस चुनाव में वोट का मन बनाने की प्रक्रिया में मुस्लिम मतदाता समाजवादी पार्टी में पारिवारिक विवाद की भी अपने स्तर पर व्याख्या कर रहा है. मसलन, आजमगढ़ की सगड़ी विधानसभा के बुजुर्ग मोहम्मद आबिद के मुताबिक विवाद से मामूली फर्क जरूर है और मुलायम सिंह यादव पूर्वांचल में प्रचार के लिए आते तो अच्छा रहता. वहीं, इसी क्षेत्र के युवा इमरान के मुताबिक विवाद से कोई फर्क नहीं पड़ा है और अखिलेश यादव बड़े नेता बनकर उभरे हैं. कुछ ऐसी ही राय उनके साथी मुस्तफा की भी थी.
मुस्लिम मतदाताओं से बातचीत में सपा के पक्ष में झुकाव की एक अहम वजह अखिलेश सरकार के काम-काज के प्रति सकारात्मक रूझान है. उनके मुताबिक 108 व 102 एम्बुलेंस सेवा, डायल 100 और समाजवादी पेंशन योजना से सभी को फायदा हुआ है. बसपा की तुलना में सपा को तवज्जो के पीछे इसे वजह मानने वाले मतदाताओं का कहना है कि मायावती सरकार में लोगों की सहूलियत के लिए प्रयास नहीं हुए बल्कि सिर्फ एक वर्ग विशेष को ध्यान में रखकर काम हुआ जबकि सपा की सरकार में काम पर ज्यादा जोर रहा.
 
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