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बागियों को शह देते मुलायम गैर भाजपावाद की नई पहल दम तोड़ रही है नैनी झील अखिलेश पर दबाव बढ़ा रहें है मुलायम
कांग्रेस के रुख से नीतीश ने बदली राह ?
 विवेक सक्सेना 
नई दिल्ली .उत्तर प्रदेश के चुनाव नतीजे बहुत दूरगामी परिणाम लाने वाले साबित होंगे. इनका असर उन राज्यों पर भी पड़ेगा जहां निकट भविष्य में चुनाव होने वाले हैं अथवा जो राज्य पड़ोस में स्थित है. ऐसा माना जा रहा है कि यहां के नतीजों को लेकर बिहार की राजनीति में जबरदस्त उथल-पुथल आ सकती है. राजनीति के जानकारो के मुताबिक राजद प्रमुख लालू यादव ने तो मतदान पूरा होने के पहले ही बिसात बिछानी शुरू कर दी है. वे सपा के प्रचार के लिए उत्तर प्रदेश में इस पार्टी द्वारा उपलब्ध करवाये गये हैलीकॉप्टर पर घूम रहे हैं. उनकी पत्नी राबड़ी देवी ने हाल ही में बयान दिया कि बिहार के लोग तेजस्वी को राज्य के मुख्यमंत्री के रूप में देखना चाहते हैं. इसलिए अगर सपा-कांग्रेस उत्तर प्रदेश में सरकार बनाती है तो बिहार में युवा तेजस्वी को मुख्यमंत्री बनाने का अभियान तेज हो जायेगा. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार इस रणनीति से परिचित हैं व उन्होंने खुद को उत्तर प्रदेश में चुनाव अभियान से दूर रखा हुआ है. माना जा रहा है कि उनके वहां न जाने का सीधा लाभ भाजपा को मिलेगा क्योंकि निकट भविष्य में उन्हें इस दल की जरूरत पड़ सकती है.हालांकि जनता दल सूत्रों का यह भी दावा है कि नीतीश कुमार कांग्रेस नेताओं के व्यवहार से आहत होकर यह कदम उठाया है .कांग्रेस ने समय पर नीतीश से संवाद नहीं किया .यहां तक कि  नीतीश का फोन तक उठाने की जहमत नहीं उठाई .फिर बात बिगड़ी तो बिगडती चली गई .समाजवादी पार्टी की तरफ से भी कोई राजनैतिक पहल नहीं हुई .इस सबके चलते नीतीश की रणनीति बदली और उन्होंने अपने को उत्तर प्रदेश चुनाव से अलग कर लिया .
इसी तरह मार्च में होने वाले दिल्ली नगर निगम चुनावों में उन्होंने जद(यू) को उतारने का फैसला किया है. अभी तक जो संकेत मिले हैं उसके अनुसार उनकी पार्टी सभी 272 सीटों पर तीनों निगमों के चुनाव लड़ेगी. इसके लिए महासचिव संजय झा की जिम्मेदारी सौंपी गयी है. मालूम हो कि पिछली बार जद (यू) ने विधानसभा चुनाव में कुछ उम्मीदवार उतारे थे. तब साबिर अली को जिम्मेदारी सौंपी गयी थी जो कि बाद में भाजपा में चले गये.
वे शोएब इकबाल को जद (यू) में लाने में सफल रहे और शोएब चुनाव जीतने के बाद अलग हो गये. बाकी की जमाने जब्त हो गयी. एक उम्मीदवार की तो 100 से भी कम वोट मिले. इस चुनाव में कांग्रेस, महाराष्ट्र की तरह हाशिए पर है इसलिए असली मुकाबला आप और भाजपा के बीच होगा. कांग्रेस का पुराना वोट बैंक पूर्वाचल, दलित, मुस्लिम मतदाता रहता आया है.भाजपा ने भले ही मनोज तिवारी को प्रदेश अध्यक्ष बना दिया हो पर उनके यहां के बिहारी मतदाता पर पकड़ ज्यादा मजबूत नहीं है. इसलिए अगर जद (यू) चुनाव में उतरी तो उसका सीधा लाभ भाजपा को ही मिलेगा. इसे कहते हैं चाणक्य नीति!
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  • दम तोड़ रही है नैनी झील
  • बागियों को शह देते मुलायम
  • गैर भाजपावाद की नई पहल
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  • बांधों को लेकर सवाल बरकरार
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