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उत्तर प्रदेश में मोदी का रामराज !

अंबरीश कुमार 

लखनऊ. उत्तर प्रदेश में रामराज आ गया है. पूरी ताकत के साथ लोगों ने इसके लिए वोट दिया है. हो सकता है यह किसी प्रतिक्रिया में हो पर यह हिंदू लहर है. इस लहर में अखिलेश का विकास का एजेंडा भी बह गया तो मायावती जैसी आयरन लेडी के कुशल प्रशासन की धमक भी ध्वस्त हो गयी. ऐसी लहर होगी यह कोई नहीं समझ पाया था. हम भी इस लहर को नहीं देख पाये. पर यह लहर मोदी की रणनीति से बनी जिसकी तैयारी उन्होंने काफी पहले शुरू कर दी थी. पहले सोशल इंजीनियरिंग की फिर प्रदेश के समूचे हिंदू मन को प्रभावित कर मजहबी गोलबंदी कर दी. वर्ष 2014 में उत्तर प्रदेश में जो मोदी की लहर चली उसमे हिंदुत्व के चूल्हे पर चढ़ी रोटी को तवे पर एक तरफ से पलट दिया गया  था, इस बार वह रोटी दूसरी तरफ से भी पलट दी गयी है. मोदी ने चुनाव प्रचार में झूठ बोला हो या सच, लोगों ने उनपर भरोसा किया. अखिलेश, राहुल और मायावती पर भरोसा नहीं किया, यह सच है. ये नेता अब आत्ममंथन करें कि आखिर ऐसा क्यों हुआ. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने उत्तर प्रदेश को लेकर हर तरह की रणनीति बनायी और उसमे वे कामयाब भी हुए. पहले पिछड़ों को जोड़ा. एक-एक करके प्रदेश अध्यक्ष बदला. पार्टी के संगठन में गैर यादव पिछड़ी जातियों को जोड़ने का काम किया तो उन्हें उम्मीदवार भी बनाया. ऐसे राजनैतिक दलों से तालमेल किया जो अति पिछड़ी जातियों में जनाधार रखते हैं. भारतीय समाज पार्टी हो या अपना दल. वे तिनका तिनका जोड़ रहे थे, काफी समय से. भाजपा किसी वार रूम के भरोसे नहीं थी. उसके साथ वैचारिक रूप से प्रतिबद्ध कार्यकर्त्ता, पत्रकार और बुद्धिजीवी जमात थी. और अंत में वे उस मजहबी गोलबंदी में भी कामयाब हुए जो उनका अंतिम अस्त्र था. पर यह सब एक के बाद एक रणनीति के साथ हुआ. अमित शाह और मोदी ने एक-एक जिले और एक एक बूथ के समीकरण को समझा .परस्पर विरोधी धारा वाले नेताओं को साथ खड़ा कर दिया .यह सब उनकी जीत की वजह बने. पर समाजवादी तो तिनका-तिनका बिखेर रहे थे. सत्ता,पैसा और आर्थिक लूट को लेकर सरकार लगातार घिरी तो अंत में सैफई का परिवारवाद भी विपक्ष के निशाने पर रहा. इस सबके बावजूद समाजवादी विचार धारा से जुड़े बहुत से नेता ,कार्यकर्त्ता और बुद्धजीवी जो मदद भी करना चाहते थे उनसे भी कोई संवाद करने को तैयार नहीं नजर आया. कुछ समाजवादी धारा के कार्यकर्त्ता जो चुनाव में प्रचार में भी जुटे उन्हें भी किसी ने गंभीरता से नहीं लिया. फिर भी अन्य राजनैतिक दलों के कार्यकर्त्ता अपने स्तर पर काम करते रहे. यही राजनैतिक अहंकार उन्हें ले डूबा. कांग्रेस तो इसमें और आगे थी. इसी अहंकार का नतीजा था कि बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से लेकर बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को किसी ने प्रचार में बुलाने तक की जहमत तक किसी ने नहीं उठाई . इस बारे में केसी त्यागी ने जब खुद फोन किया तो कांग्रेस के एक दिग्गज नेता ने फोन तक नहीं उठाया. समाजवादी पार्टी ने एक बार भी प्रयास नहीं किया कि इन दिग्गज नेताओं की मदद ली जाये. सोशल इंजीनियरिंग का यह हाल था जो अति पिछड़ा बहुल इलाका था वहां अगड़ा उम्मीदवार दे दिया. कई ऐसे उम्मीदवारों का टिकट पारिवारिक विवाद में कट गया जो जीत सकते थे . कौमी एकता दल के साथ तालमेल सिर्फ मुख्तार अंसारी के नाम पर ख़ारिज कर देना बड़ी रणनीतिक भूल थी. अखिलेश यादव सिर्फ मुस्लिम -यादव समीकरण के भरोसे विकास के एजेंडा पर चुनाव लड़ रहे थे वह भी अराजनैतिक किस्म के वार रूम के जरिये. जबकि चुनाव में अन्य जातियों की भी बड़ी भूमिका होती है. दूसरी जातियों के बीच यह धारणा बन चुकी है कि समाजवादी पार्टी के सत्ता में आने के बाद गाजियाबाद से लेकर गाजीपुर तक के थाने में सिर्फ अहीर थानेदार नियुक्त होता है. यह स्थिति कई बड़े पदों पर भी होती है. हालांकि अखिलेश यादव ने समाजवादी पार्टी की जातीय छवि को तोड़ने का प्रयास भी किया पर वे भी इस धारणा को तोड़ नहीं पाये. अखिलेश यादव से कभी यह आभास नहीं मिला कि वे दलितों और अति पिछड़ी जातियों के लोगों को भी सत्ता में हिस्सेदारी देंगे. यह क्यों नहीं हो सकता था. आम लोगों से संवाद तो उन्होंने पहले ही बंद कर दिया था. सिर्फ सड़क बिजली और पानी के जरिये ही चुनाव नहीं जीता जा सकता है यह उन्हें सोचना चाहिये. मायावती तो अपना परंपरागत वोट बैंक भी नहीं सहेज सकी यह और दुर्भाग्यपूर्ण है. हालांकि पहले चरण से यह हवा मीडिया के जरिए फैलाई गयी कि बसपा सत्ता में आ रही है. सिर्फ इसलिए ताकि मुस्लिम वोटों का बंटवारा हो सके और वह हुआ भी. समाजवादी पार्टी इस अफवाह तक का मुकाबला नहीं कर सकी और बहुत सी जगहों पर मुस्लिम वोट ठीक से बंटा भी. साफ़ है राजनैतिक रणनीति में मोदी और शाह की जोड़ी भारी पड़ी.
 
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