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ईवीएम से छेड़छाड़ संभव है

गौहर रजा

भारतीय लोकतंत्र के सबसे खूबसूरत तोहफों में से एक है सबको मताधिकार. एक ओर जहां हमें मताधिकार में समानता का अधिकार है वहीं हमें यह अधिकार भी है कि हम उस दल का चयन कर सकें जो देश पर, राज्यों में और स्थानीय निकायों में शासन करेगा. वहीं दूसरी ओर अधिक महत्त्वपूर्ण बात यह है कि इसने हमें असामनता भरे समाज में समानता प्रदान की है.अतीत में मतदान की आजादी को कमतर करने की तमाम कोशिशें हुई हैं. कागज के मतदाता पत्र और बैलेट बॉक्स के दौर में बूथ लूटना और बल प्रयोग तो आम हुआ करते थे. वहीं आज बड़ा सवाल यह है कि क्या इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) के जरिये मतदान असुरक्षित है. हाल के दिनों में ईवीएम से होने वाले मतदान की सुरक्षा-असुरक्षा को लेकर दावों-प्रतिदावों का सिलसिला चला है. ऐसे में इस बहस में मैं भी कुछ जोडऩा चाहूंगा.
 
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के नतीजों ने भाजपा समेत सबको स्तब्ध कर दिया. किसी ने सोचा भी नहीं था कि भाजपा को इतनी सीट मिलेंगी. प्रदेश में किसी के पक्ष में या खिलाफ कोई लहर नहीं थी. यहां तक कि भाजपा समर्थक विश्लेषक भी इतनी बड़ी जीत का दावा नहीं कर रहे थे. ऐसे में चुनाव नतीजों ने संदेह को जन्म दे दिया.सबसे पहले मायावती ने परिणामों पर सवाल उठाये, इसके बाद तो ईवीएम से जुड़ी शंकाओं की बाढ़ ही आ गयी. परिणाम घोषित होने के तत्काल बाद इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के एक हिस्से ने दिखाया कि ईवीएम से छेड़छाड़ संभव है.जल्दी ही सोशल मीडिया पर इसे लेकर तमाम दावों और उनके खंडन का दौर शुरू हो गया.  इस बारे में संदेश, आलेख और वीडियो क्लिप्स बांटे जाने लगे.ईवीएम के पक्ष और विपक्ष में सार्वजनिक बहस की जड़ें सन 1980 के दशक तक गहरी हैं जब पहली बार प्रायोगिक तौर पर इनका इस्तेमाल किया गया. यह बहस जरूरी है क्योंकि अगर ईवीएम से छेड़छाड़ संभव है तो हमारा लोकतंत्र संकट में है.
 
बहरहाल हमें यह याद रखना चाहिए कि ऐसी लड़ाइयां साइबर जगत में या टीवी चैनलों पर नहीं निपटायी जा सकतीं. अंतत: इनको अदालत में या जनांदोलन के जरिये ही हल किया जा सकता है. मैं तकनीक विरोधी नहीं हूं लेकिन तमाम अन्य सामान्य वैज्ञानिकों की तरह मैं भी किसी इलेक्ट्रॉनिक मशीन के छेड़छाडऱहित, बाहरी हमलों से पूरी तरह सुरक्षित होने पर शंका करता हूं.बहरहाल चूंकि निर्वाचन आयोग जैसी जवाबदेह संस्थान और दो विशेषज्ञ समितियों के सदस्यों ने जिस तरह इसके सुरक्षित होने का दावा किया है उस पर एक दृष्टि डालते हैं. दोनों समितियों में से एक का गठन 1990 में किया गया. उसमें सी राव कसरबडा, पीवी इंद्रेशन और एस संपथ का नाम था जबकि 2006 में बनी दूसरी समिति में ए के अग्रवाल और डीटी साहनी के साथ पीवी इंद्रेशन शामिल थे. ये सभी विशेषज्ञ अपने-अपने क्षेत्र में जाना माना नाम रखते थे लेकिन क्या वे कंप्यूटर सुरक्षा के भी विशेषज्ञ थे?
 
कंप्यूटर सुरक्षा के विशेषज्ञों की एक बड़ी टीम जिसमें मिशिगन विश्वविद्यालय के स्कॉट वॉल्हॉक, एरिक वस्ट्रो और जे एलेक्स हैल्डरमैन शामिल थे, ने इन दोनों टीमों की विशेषज्ञता पर संदेह जताया और कहा कि उनकी पहुंच ईवीएम सोर्स कोड तक नहीं हैं और उनकी रिपोर्ट निर्माताओं की प्रस्तुति, उनके द्वारा किए गए प्रदर्शन और मशीन बनने की जगह के दौरों पर आधारित है. इनमें से किसी के पास कंप्यूटर सुरक्षा की कोई विशेषज्ञता नहीं. मिशिगन विश्वविद्यालय के प्रोफेसरों ने यह शोध हैदराबाद के इंजीनियर हरिप्रसाद के निष्कर्षों के बाद किया. हरिप्रसाद वर्ष 2010 में प्रकाशित शोध पत्र भारत में ईवीएम की सुरक्षा का विश्लेषण के लेखकों में से एक थे. 
टीम ने यह भी दिखाया था कि कैसे एक सेल फोन की मदद से आसानी से नतीजों में छेड़छाड़ की जा सकती थी. हरि प्रसाद जांच ने फरवरी 2010 में जांच के नाम पर एक ईवीएम तक पहुंच हासिल की थी और नवंबर में उनको कथित तौर पर मुंबई में जिलाधिकारी के कार्यालय से ईवीएम चुराने के लिए गिरफ्तार कर लिया गया. 
शोध पत्र के मुताबिक भारतीय निर्वाचन आयोग के आंकड़ों के मुताबिक जुलाई 2009 में 1,378,352 ईवीएम का इस्तेमाल किया गया. इनमें से 448,000 मशीनें तीसरी पीढ़ी की थीं जो 2006 से 2009 के बीच बनीं. इनमें से 253,400 मशीनें बीईएल और 194,600 मशीनें ईसीआईएल में बनीं. शेष 930,352 मशीनें दूसरी पीढ़ी की मशीन थीं जो सन 2000 से 2005 के बीच बनीं थीं. इनमें से 440,146 मशीनें बीईएल ने जबकि 490,206 मशीनें ईसीआईएल ने बनवायीं थीं. 
वर्ष 2010 से टीम ने लगातार इस दावे को चुनौती दी कि भारतीय ईवीएम सुरक्षित हैं. उन्होंने अलग-अलग मंच पर अपनी बात रखी. वर्ष 2010 से कई ऐसे वीडियो सामने आए हैं और कई आलेख लिखे गये हैं जो बताते हैं कि ईवीएम में छेड़छाड़ संभव है. फिर भी हरिप्रसाद और उनके साथियों का शोध और उनकी रिपोर्ट इस मामले में सर्वश्रेष्ठï है. इस मसले पर लोगों का विचार बंटा हुआ है. इस बहस में शामिल लोगों को तीन श्रेणियों में बांटा जा सकता है: 
1. पहले वे लोग जो मानते हैं कि ईवीएम से छेड़छाड़ की जा सकती है और यह होता है. इस श्रेणी में तमाम शंकालु, आम नागरिकों का एक हिस्सा, कुछ सामाजिक कार्यकर्ता और चुनाव हारने वाले शामिल हैं. 
2. दूसरी श्रेणी में वे लोग हैं जो मानते हैं कि ईवीएम के साथ छेड़छाड़ संभव है लेकिन चूंकि देश में इतने बड़े पैमाने पर चुनाव होते हैं इसलिए 14 लाख ईवीएम के साथ छेड़छाड़ करना मुमकिन नहीं है. हर ईवीएम जबरदस्त सुरक्षा से गुजरती है और चुनावी प्रक्रिया में शामिल हर सदस्य को रिश्वत देना संभव नहीं है. चूंकि इस प्रक्रिया में बहुत बड़े पैमाने पर लोग शामिल होते हैं इसलिए छेड़छाड़ को गोपनीय नहीं रखा जा सकता। भारतीय मीडिया समेत अधिकांश लोग इस बात पर यकीन करते हैं. 
3. तीसरी और आखिरी श्रेणी में निर्वाचन आयोग और उसके द्वारा नियुक्त विशेषज्ञ हैं जो उचित ही ऐसी संभावनाओं को खारिज कर देते हैं. 
 
पहली श्रेणी
व्यक्तिगत तौर पर मैं पहली श्रेणी में आता हूं. मुझे पता है कि सारी मशीनों से छेड़छाड़ की जा सकती है. हर मशीन में इनपुट और आउटपुट की व्यवस्था होती है जिसकी मदद से हम उक्त मशीन को चलाते हैं. कंप्यूटर और इंटरनेट के युग में दुनिया के किसी भी कोने में बैठकर मशीन से छेड़छाड़ की जा सकती है वह भी अपनी पहचान उजागर किये बिना. 
ऐसे वक्त में जब एक प्रयोगशाला में बैठकर मंगल ग्रह पर किसी रोबोट को मर्जी से संचालित किया जा सकता है तो यह सोचना सही नहीं कि ईवीएम पूरी तरह सुरक्षित है. चूंकि केवल सरकारी संस्थान, निर्वाचन आयोग और भारी भरकम फंड वाले राजनीतिक दल ही विशेषज्ञों और गजेट्स तक पहुंच रखते हैं इसलिए तकनीकी तौर पर यह साबित कर पाना मुश्किल होगा कि ईवीएम सुरक्षित है या नहीं. जाहिर है तकनीकी कवायद का कोई अर्थ नहीं.
आखिरकार ईवीएम से छेड़छाड़ को संभव दिखाने वाले तमाम प्रयास विफल साबित हुए क्योंकि निर्वाचन आयोग अथवा उसके द्वारा नियुक्त विशेषज्ञ तकनीकी या प्रक्रियात्मक गड़बड़ी के बारे में सुझाए गए तरीके से ही काम करते हैं.
ईवीएम की सुरक्षा पर सवाल उठाने वाले किसी भी व्यक्ति के समक्ष पहला संकट तो यह होता है कि उसकी पहुंच इन मशीनों तक नहीं होती. उनको अपने तरीके का परीक्षण किसी वास्तविक चुनाव में करने को नहीं मिलता. अक्सर यह दलील दी जाती है कि जो चुनाव हारते हैं वही ये मुद्दा उठाते हैं. जबकि जीतने पर यही लोग खामोश रह जाते हैं. बतौर एक आम नागरिक हमें जरूर अपने मताधिकार की सुरक्षा सुनिश्चित करने का अधिकार है. 
दूसरी श्रेणी
एक दलील यह है कि हमारे देश में आंकड़े ही सबकुछ हैं. अब वे दिन नहीं रहे जब बूथ लूटे जाते थे. कहने की आवश्यकता नहीं कि बूथ लूटने का काम छिपकर नहीं किया जा सकता है जबकि ईवीएम की बात करें तो हमारा मानना है कि इसे किसी उपकरण की मदद से दूर से नियंत्रित किया जा सकता है. मसलन किसी मोबाइल फोन या लैपटॉप की मदद से. कोई इस बारे में कुछ नहीं जान पायेगा. अगर एक ईवीएम के साथ छेड़छाड़ संभव है तो यह आंकड़ा कितना भी हो सकता है.
आंकड़ों की सुरक्षा का दावा सबसे गलत, भ्रामक और खतरनाक है लेकिन यह सबसे अधिक स्वीकार्य दलील है. इसकी खामियां परखने के लिए हमें मतपत्र आधारित चुनाव प्रक्रिया के लिहाज से बनी मानसिकता से बाहर निकलना होगा.
मैं आपको यह बताने का प्रयास करता हूं कि किसी ईवीएम से छेड़छाड़ संभव है तो मनचाहा नतीजा पाने के लिए सभी 14 लाख मशीनों को हैक करने की आवश्यकता नहीं है. कुछ समझदारी भरे कदम और कुछ सामान्य गणितीय सूत्र अपनाकर कोई भी व्यक्ति वह आंकड़ा निकाल सकता है जिसकी मदद से राष्ट्रीय स्तर के चुनावों के नतीजे प्रभावित किये जा सकें. 
मान लेते हैं कि एक्स एजेंसी के पास ऐसा उपकरण है जो एक खास दूरी से किसी ईवीएम को प्रभावित कर सकता है. इसे किसी राजनीतिक दल ने नियुक्त किया है जो 100 सीटों पर चुनाव लड़ रही है. उसके सामने एक्स, वाई जेड नामक प्रतिद्वंद्वी दल हैं. बहुमत हासिल करने के लिए किसी भी दल को 51 सीटें चाहिये.
पहला चरण: एक्स एजेंसी पिछले चुनाव के आंकड़े एकत्रित करती है. पता करती है कि उस राजनीतिक दल को बड़े अंतर से जीत मिली थी. मान लीजिए दल ए ने उस चुनाव में 25 सीट जीती थीं. इन सीटों पर उसे ईवीएम में छेड़छाड़ करने की जरूरत नहीं. अब उन जगहों की पहचान करें जहां दल ए को दूसरा स्थान मिला था., पहले स्थान पर कोई भी रहा हो.
मान लीजिये ऐसी 20 सीट हैं. इन सीटों में हेरफेर करनी होगी. लेकिन फिर भी 11 सीटों की कमी रहेगी. अब आंकड़ों को गौर से देखिये और उन सीटों को चिह्नित कीजिये जहां एक्स, वाई और जेड ने क्रमश: पहला और दूसरा स्थान पाया था और ए तीसरे स्थान पर था. ये ऐसी सीटें हैं जहां मतों का अंतर काफी कम है. अगर एजेंसी 11 या उससे अधिक ऐसी सीट चिह्नित कर लेती है तो वह इन 20 और 11 सीटों पर ध्यान देगी. 
दूसरा चरण: सभी 100 सीटों पर लोगों का मिजाज भांपने के लिए एक सर्वेक्षण कराएं. अगर पिछले चुनाव जैसा रुझान मिल रहा है तो ठीक वरना चुनिंदा सीटों पर मामला दुरुस्त करें.
तीसरा चरण: चुनिंदा निर्वाचन क्षेत्रों में एक सर्वे करके उन जगहों को चिह्नित तरें जहां लोग बड़े पैमाने पर दल ए को वोट देने जा रहे हैं. उन जगहों को छोड़े दें. अब उन ईवीएम की पहचान करें जो विरोधियों की मजबूती वाले इलाकों में इस्तेमाल हो रही हैं. बस इनके साथ हेरफेर की जरूरत है.
चौथा चरण: उन वोटों का आकलन करें जिनकी मदद से किसी संसदीय क्षेत्र में जीत हासिल की जा सकती है. मान लेते हैं यह आंकड़ा 1000 वोट का है. एक कंप्यूटर प्रोग्राम की मदद से हर ईवीएम के लिए 1000 वोट की व्यवस्था की जाती है. कंप्यूटर प्रोग्राम की मदद से इन वोटों को चुनिंदा ईवीएम में स्थापित किया जा सकता है.
पांचवा चरण: एजेंसी ए मासूम युवाओं को अपने साथ जोड़कर उन्हें निर्देश दे सकती है कि वे खास बूथ पर जाकर मोबाइल फोन या लैपटॉप का एक खास बटन दबाएं. यह बटन संबंधित ईवीएम से संपर्क कर उसके परिणाम में मनचाहा बदलाव लायेगा. 
 
इस छेड़छाड़ को सफल बनाने के लिए यह भी आवश्यक है कि मीडिया में भ्रम उत्पन्न किया जाये. एजेंसी ए कुछ मीडिया चैनलों, चुनाव विश्लेषकों और विशेषज्ञों को खरीदकर ऐसा भ्रम स्थापित कर सकती है जिससे कोई भी व्यक्ति किसी तरह का अंदाजा लगाने की स्थिति में ही न रह जाये. विशेषज्ञों को पैसे देकर अलग अलग अनुमान लगवाये जा सकते हैं ताकि नतीजे आने पर लोग नतीजों की वैधता के बजाय यह बात करते रहें कि कौन सही है और कौन गलत? सर्वाधिक अप्रत्याशित नतीजे आने पर भी हम देखते हैं कि हमारे गंभीर टीकाकार भी उनको परम सत्य मानते हैं और विशेषज्ञ इसके पीछे के तात्कालिक सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक कारकों के बारे में अपनी राय रखते हैं. 
मैंने इस परीक्षण को गुजरात में 2012 में हुए विधानसभा चुनाव में एक जिले के आंकड़ों पर स्थापित करके देखा. परिणाम चौंकाने वाले थे. 
पार्टी ए ने चुनाव जीता था और पार्टी का प्रत्याशी दूसरे स्थान पर आया. ए के पक्ष में 77083 वोट आये और प्रत्याशी बी को 59,677 वोट मिले. इस चुनाव में 217 ईवीएम का इस्तेमाल किया गया. सामान्य गणितीय आकलन करके मैं इस नतीजे पर पहुंचा कि केवल 36 ईवीएम में हेरफेर करके नतीजों को अच्छे अंतर से उम्मीदवार बी के पक्ष में किया जा सकता था. उम्मीदवार बी को जिताने के लिए न्यूनतम 26 ईवीएम में बदलाव की जरूरत थी. अगर मैं यह आकलन कर सकता हूं तो गणित की सामान्य जानकारी रखने वाला कोई भी व्यक्ति यह कर सकता है. 
 
तीसरी श्रेणी
इस श्रेणी के लोगों के साथ तर्क करना सबसे मुश्किल है. उनकी पहली दलील यह है कि ईवीएम का निर्माण एक सरकारी कंपनी द्वारा जबरदस्त सुरक्षा और गोपनीयता के साथ किया जाता है. क्या दुनिया भर के हैकर सरकारी कंपनियों और गोपनीयता से डरते हैं? 
दूसरी दलील यह है कि मशीन की बुनावट ऐसी है कि उसमें बाहर से हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता है। तो फिर हमें इस मशीन के सुरक्षा उपाय मजबूत क्यों करने पड़ते हैं और हम इन्हें दूसरी और तीसरी पीढ़ी की मशीन का नाम क्यों देते हैं? 
तीसरी दलील यह है कि किसी ईवीएम के लिए बूथ निर्धारित करने और परिणाम की घोषणा तक कई चरण होते हैं और हर चरण में एक से अधिक व्यक्ति होता है जिसे इसकी सुरक्षा के लिए प्रशिक्षित किया जाता है. हर स्तर पर मशीन की जांच की जाती है ताकि यह पता लग सके कि वह ठीक से काम करती है या नहीं? इन सबकी वफादारी पर शक करना उचित नहीं है. अगर ऐसा किया भी गया तो कोई न कोई इस खबर को बाहर ला ही देगा. 
लेकिन इलेक्ट्रॉनिक षडयंत्रों की खूबी यही है कि आपको एक बड़ी टीम को इसका हिस्सा बनाने की आवश्यकता नहीं. बहुत सीमित लोगों की मदद से यह काम बेहतर ढंग से किया जा सकता है. हो सकता है इस प्रक्रिया में शामिल लोग खुद कुछ न जानते हों.
(गौहर रजा एसीएसआईआर के पूर्व प्रोफेसर और राष्ट्रीय विज्ञान संचार एवं सूचना संसाधन संस्थान के मुख्य वैज्ञानिक हैं.)
 
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