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दम तोड़ रही है नैनी झील

अंबरीश कुमार 

नैनीताल की मशहूर नैनी झील दम तोड़ रही है  ।इस झील पर ही नैनीताल का अस्तित्व टिका हुआ है  । झील से ही लोगों को पानी भी मिलता है तो शहर का पर्यटन उद्योग भी इसी पर टिका हुआ है । इस झील का पानी अब खतरनाक स्तर तक घट गया है  । तल्लीताल के बस अड्डे से जैसे ही कोई माल रोड की तरफ बढ़ता है उसे नैनी झील की बदहाली नजर आ जाती है  ।  उतराखंड में  इस जाड़े में उम्मीद से कम बर्फ़बारी से किसानो और बागवानों के चेहरे पर चिंता की लकीरे खिंच चुकी हैं ।  बर्फ़बारी कम होने का सबसे ज्यादा असर पानी के परम्परागत स्रोतों पर पड़ना तय है । वैसे भी उतराखंड में पानी के आधे से ज्यादा परम्परागत स्रोत कम वर्षा और बर्फ़बारी के साथ बेतरतीब निर्माण से खत्म हो चुके हैं । पर सबसे ज्यादा चिंता अब उस नैनी झील के अस्तित्व को लेकर है जो कभी फिल्म उद्योग की पसंदीदा जगह रही तो नव विवाहितों की ख़ास पसंद । यह झील सूखती जा रही है  । इस जनवरी में इस झील का जल स्तर करीब चार फुट पर पहुंच गया  । अब अप्रैल में नैनीताल के कलेक्टर दीपक रावत ने माना है कि झील का जल स्तर सामान्य से चौदह फुट नीचे आ गया है  ।  पिछले कुछ वर्षों में यह सबसे कम रहा है  । इस रफ़्तार से नैनी झील का पानी गिरता रहा तो इसका अस्तित्व ही खत्म हो जाएगा  । वर्ष 2012 में नैनी झील का जल स्तर दिसंबर के महीने में 5.95 फुट रहा तो वर्ष 2013 -14 में  यह 6 .60 फुट रहा  । पर इस वर्ष झील के जल स्तर में ज्यादा गिरावट आई है  । मुख्य वजह कम बरसात और बर्फ़बारी में लगातार आ रही गिरावट है  । पर इससे ज्यादा समस्या नैनीताल में वह अंधाधुंध निर्माण भी है जिससे एक तरफ पानी के स्रोत खत्म हो गए तो वह जमीन भी नहीं बची जिसमे बरसात का पानी जा पाए ।सारा का सारा पानी चरों तरफ की पहाड़ियों से गिरता हुआ नीचे चला जाता है ।इसका कुछ हिस्सा झील में जाता तो कुछ आसपास से बहता हुआ बाहर के नाले के जरिए नीचे बह जाता है । इसकी वजह से जो पानी पहले इन पहाड़ियों से रिस कर झील में पहुंचता था वह धीरे धीरे कम होता जा रहा है । बरसात कम होने से अब नैनी झील का झील का जल स्तर उतना भी नहीं भर पा रहा कि इसके गेट को खोल अतिरिक्त पानी को बहा दिया जाए । पिछले पांच साल में दो बार यह स्थिति आ चुकी है ।वर्ष 2012 में भी नैनी झील के निकासी वाले गेट बरसात में नहीं खोले जा सके थे तो पिछले साल भी ये गेट नहीं खोले जा सके ।इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि इस झील का पानी कितना कम होता जा रहा है ।झील के चारों ओर करीब साठ हजार की आबादी रहती है । यह आबादी पिछले दो दशक में दुगनी हो चुकी है । साफ़ है इनकी पानी की जरुरत भी दुगनी हुई तो जंगल और पहाड़ का खुला हिस्सा भी घट गया । आसपास की पहाड़ियों में पानी को जो भी परम्परागत स्रोत थे वे खत्म होते जा रहे हैं । पहले बहुत से  छोटे छोटे ताल और झरने थे जो तेजी से खत्म हो गए । दरअसल प्रदेश सरकार  पर्यटन से अपनी आमदनी तो बढ़ाना चाहती है पर पर्यावरण बचा रहे इसके लिए कोई प्रयास नहीं करती । इस वजह से पर्यावरण और प्रभावित होता जा रहा है । नैनी झील का एक हिस्सा खासकर जो शहर में प्रवेश करते हुए बस अड्डे के सामने पड़ता है वहां झील की सूखी हुई जमीन दिखती है । इसे देख कर सैलानियों का आकर्षण भी कम होता जा रहा है । वे ऐसी जगह नहीं ठहरना चाहते जहां से झील का सूखा हुआ हिस्सा नजर आए । यह शुरुआत है । अगर झील को बचाने के प्रयास समय पर नहीं किए गए तो यह सूखा हिस्सा बढ़ता जाएगा । अगर सैलानियों ने सूखती झील की वजह से मुंह मोड़ा तो नैनीताल का पर्यटन उद्योग भी प्रभावित होगा ।सरकार ने कहने को तो झील प्राधिकरण बना कर मुक्तेश्वर तक बेतरतीब निर्माण पर रोक लगाने का प्रयास किया है ।पर इसपर ढंग से अमल नहीं किया जा रहा ।नैनीताल का मौसम आसपास के जंगल से प्रभावित होता है । पर जब चारो ओर बेतरतीब निर्माण हो ,होटल और रिसार्ट में घंटों जहरीला धुवां छोड़ने वाले जेनरेटर चलाए जाएंगे तो प्रदूष्ण और बढेगा ।जिसका असर चारो तरफ पड़ेगा ।बेतरतीब होटल और रिसार्ट निर्माण से नैनीताल और आसपास का पर्यावरण बुरी तरह प्रभावित हो रहा है  । हैरानी की बात यह है कि इस तरफ नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल का ध्यान भी नहीं गया है  । नैनीताल जिले की मशहूर फल पट्टी रामगढ़ ऐसे बेतरतीब बन रहे होटलों के चलते खत्म हो रही है ।इन होटलों के निर्माण के चलते आसपास के आधे से ज्यादा जल स्रोत बंद हो चुके हैं ।बगल में अल्मोड़ा उदाहरण है जहां के मौसम में पिछले दो दशक में ज्यादा तेज बदलाव आया है । आसपास के जंगल काटे जाने और ज्यादा निर्माण के चलते अब अल्मोड़ा में पंखा चलने लगा है । जबकि मुक्तेश्वर घने जंगलों के चलते आज भी काफी ठंढा रहता है और पानी के स्रोत भी बचे हुए हैं । साफ़ है अगर हरियाली बची रही तो झील झरने सभी बचेंगे ।ऐसे में नैनीताल की इस ऐतिहासिक झील को बचाने के लिए कई तरह की पहल करनी होगी ।
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