ताजा खबर
एमजे अकबर नपेंगे तो नरेंद्र मोदी कैसे बचेंगे? सरकार के अहंकार ने ली सानंद की जान ! गंगा के लिए मौत मुबारक़! एमपी में भाजपा का सिंधिया कार्ड
अवध का किसान विद्रोह

दलित बहुजन समाज के क्रांतिकारी आंदोलन का दस्तावेज 

विद्या भूषण रावत 
भारत की राजनीति में गाँधी को महात्मा और अहिंसा का पुजारी बनाने वाली तीन महत्वपूर्ण घटनाएं है जो उत्तर प्रदेश और बिहार में हुईं. गाँधी-भक्त इतिहासकारों ने उनका इतना महिमामंडन कर दिया कि  लोग गाँधी की जय जय कर करने के फेर में दलित बहुजन समाज की कुर्बानियों और क्रान्तिकारी घटनाओं को बिल्कुल भुला दिया . उससे ज्यादा यह कि गाँधी महात्म के चलते लोगों को यह भी नहीं पता कि आखिर इन आन्दोलनों और कुर्बानियों का हुआ क्या ? .आज इतिहास के साथ जो छेड़छड हो रही है, उसके लिए मुख्यधारा का तथाकथित ब्राह्मणवादी इतिहासकार कम जिम्मेवार नहीं है .इन्होंने पूरे घटनाक्रमों में दलित, पिछड़ी जातियों के साथ हुए अन्याय को छुपाया है. इतिहास की जगह हमें गाँधीपुराण पकड़ा दिया है. हमारे देश के इतिहास की ये तीन प्रमुख घटनाएं हैं- चंपारण आन्दोलन, चैरी चैरा का विद्रोह और अवध का किसान आन्दोलन . इसने गाँधी को महात्मा बनाया . भक्त इतिहासकारों ने लोगांे को ये कभी नहीं बताया कि  गाँधी ने किस तरीके से इन तीनांे स्थानों पर दलित, पिछडों के मुद्दों को गायब कर, उनके नेतृत्व को खत्म कर, कांग्रेस का ब्राह्मणवादी जमींदारी नेतृत्व, उत्पीड़ित लोगों पर लादा . सुभाष चन्द्र कुशवाहा हिंदी के प्रसिद्ध साहित्यकार हंै लेकिन उनके दो महत्वपूर्ण कार्यों से मैं उनको उन प्रतिष्ठित इतिहासकारों की श्रेणी में रखूँगा, जिन्होंने दलित, पिछड़े समाज के जानबूझकर दबाये गये इतिहास को खंगाला और उसको जनता के समक्ष रखा. उनकी पहली पुस्तक ‘चैरी चैरा का विद्रोह और स्वाधीनता आन्दोलन’ ने इस महान आन्दोलन की पीछे के पूरी पृष्ठभूमि का विस्तारपूर्वक विश्लेषण किया और उसमें दलित, पिछड़े गरीब ओर सीमान्त किसानों में उपजे असंतोष और उनकी कुर्बानियों को बौद्धिक ईमानदारी के साथ प्रस्तुत किया गया . श्री कुशवाहा की दूसरी पुस्तक ‘अवध का किसान विद्रोह-1920-1922 में उन्होंने चैरी चैरा के पूर्व की घटनाओं का न केवल क्रमबद्ध संकलन किया है,अपितु उनको वर्तमान स्थितियों सेे भी जोड़ा है . घटनाओं के मूल दस्तावेजों का विश्लेषण भी किया है.  ये दोनों पुस्तकें देश भर में उन सभी लोगांे के लिए जानना जरुरी है, जो ये शिकायत करते हं कि इतिहास के आईने में दलित, पिछड़े कहां है और दूसरा यह कि उत्तर भारत में सामाजिक, राजनितिक क्रांति क्यों नहीं हुई ? 
ये मेरा सौभाग्य है कि इन तीनो क्षेत्रांे को मुझे नजदीक से जानने और समझने का अवसर मिला. पिछले दो दशकों में मुझे चंपारण से लेकर चैरी-चैरा और अवध किसान आन्दोलन के केंद्र रूरे गाँव तक जाने के कई अवसर मिले और वहां के हालातों और घटनाक्रमों को देखते हुए मुझे हमेशा ये सवाल कचोटते रहे कि आखिर इतने बड़े क्रन्तिकारी आन्दोंलनों का ऐसा हश्र क्यों हुआ और क्यों लोग आसानी से ये कह देते हैं कि उत्तर प्रदेश और बिहार में प्रगतिशील आन्दोलन खड़ा नहीं हुआ ? गाँधी के महात्म के पीछे के कटु सत्य को जनता से हमेशा छुपाया गया क्योंकिइतिहासकार गाँधी के महात्म के इतने दीवाने थे कि उनसे सवाल पूछना तो दूर, दलित, पिछड़ो के क्रान्तिकारी नेतृत्व ध्वस्त कर, स्थानीय सवर्ण जमींदारों को उन पर थोपा और इसकी भनक भी नहीं लगने दी . लिहाजा गाँधी तो महात्मा बन गए लेकिन जिन लोगांे ने जमींदारो के सामंतवादी और जातिवादी  शोषण के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद की, उनके इतिहास को शोध और शब्दों की बाजीगरी का इस्तेमाल कर, गायब कर दिया .  ये सवाल मुझे हमेशा आश्चर्य में डालते हैं कि जिन आन्दोलनों के बारे में दुनिया में इतना महिमामंडन है, उन स्थानों पर दलितों और पिछडांे के हालत बदतर क्यों हैं और गाँधी के उस तथाकथित किसान आन्दोलन से किसानों का भला क्यों नहीं हुआ . मुझे लगता है कि हालाँकि सुभाष जी ने अपने गहन शोध से उन बातों को जनता के समक्ष रखने में कामयाबी प्राप्त की है, जिसे इतिहासकारों ने छुपाया था इसलिए बहुजन आन्दोलन में दिलचस्पी रखने वालों के लिए भी ये पुस्तक उतनी ही जरुरी है, जितना कि वामपंथी विचारकों के लिए. ये सवाल भी पूछने में हमें कोई हिचक नहीं होनी चाहिए की आखिर उन्हांेने दलित, पिछड़ी जातियों के इतने बड़े आन्दोलन के इतिहास को जनता से क्यों छुपाया?
हिंदी में अमूमन गहन रूप से शोधपूर्ण पुस्तकों का अभाव है . बौद्धिकता ब्राह्मणवाद के चंगुल में रही है लिहाजा जो काउंटर नेरेटिव बहुजन लेखकों की तरफ से आये हैं, उनमंे इमोशन ज्यादा और शोध कम है . अधिकांश प्रवचन शैली में होते है . सुभाष चन्द्र कुशवाहा के ये दो ऐतिहासिक दस्तावेज, हिंदी क्षेत्र में बहुजन समाज के इतिहास को खंगालने में, नए लेखकों और इतिहासकारों के काम के होंगे. उन्हें तथ्यों पर आधारित शोध करने के लिए प्रेरित करेंगे. लेकिन मंै ये भी मानता हूँ कि इस शोध को केवल हिंदी तक सीमित नहीं कर दिया जाना चाहिए . इन दोनों पुस्तकों का अग्रेजी अनुवाद भी बेहद जरुरी है . क्योंकि इन घटनाओं ने देश के जनमानस के उपर अमिट छाप छोड़ी है लेकिन वे केवल गाँधी के महात्म के विषय में हैं .  इसलिए देश के दलित बहुजन समाज को खासकर ये जानकारी होनी चाहिए कि कैसे किसानांे ने अपनी लड़ाई लड़ी थी? स्वाधीनता आन्दोलन के समय भी मुद्दा मात्र अंग्रेजों के विरुद्ध लड़ाई नहीं थी अपितु जातीय उत्पीडन, सामंतवाद, छुआछूत और किसानों के शोषण के प्रश्न, उनके लिए किसी आजादी की लड़ाई से कम नहीं थे . आज हम राष्ट्रवाद के जिस वीभत्स स्वरूप को देख रहे हैं, उसकी नींव तो गाँधी की कांग्रेस ने उस वक्त ही रख दी थी जब जमींदारांे के आर्थिक और सामाजिक शोषण के विरुद्ध सीमान्त किसानों के विद्रोह को उन्होंने बड़ी चालाकी से राष्ट्रवाद की चाशनी में डाल कर, उन्हीं जमींदारांे, राजनैतिक प्रतिनिधियों के हाथांे में सौंप दिया था, जिनके विरुद्ध लोगों ने इतना बड़ा संघर्ष किया था.  मुख्यधारा की आज की राजनीति गाँधी के इसी राजनैतिक ‘कला’ के आधार पर चल रही है जिसको पहली चुनौती उत्तर प्रदेश में मान्यवर कांशीराम ने दी और ‘वोट हमारा, राज तुम्हारा नहीं चलेगा’  का नारा दिया. हालाँकि आज उसे भी ब्राह्मणवादी ताकतों ने बड़ी चतुराई से अपने में समाहित कर दिया है .
इस पुस्तक में संयुक्त प्रान्त में किसानों के विद्रोह का न केवल भूमिका का चित्रण है, अपितु अलग-अलग जनपदों में हुए आन्दोलनों को विस्तार से समझाया भी गया है. अवध क्षेत्र में प्रमुख स्थानों जैसे प्रतापगढ़, सुल्तानपुर, फैजाबाद, रायबरेली, एका और हरदोई जिलों में उपजे विद्रोह को गहनता से दिखाया गया है. पुस्तक की भाषा-शैली आपको शुरू से लेकर अंत तक बांधे रखती है . इसमें सुभाष जी की साहित्यिक पृष्ठभूमि चार चाँद लगा देती है.
इस पुस्तक में दो और महत्वपूर्ण जानकारियां है . पहली बार इन पर विस्तार से लिखा गया है .  एक है बाबा रामचंद्र शर्मा, जो महाराष्ट्र से चलकर यहाँ आये थे और पूरे किसान आन्दोलन पर एकाधिकार बना लिए थे. उनकी जाति के बारे में बहुत से सवाल हैं लेकिन जो ज्यादा महत्वपूर्ण है, जिससे मंै  सहमत हूँ कि उन्होंने पूरे आन्दोलन को गाँधी की गिरफ्त में लाने में पूरा योगदान दिया. हालांकि ये बात भी सही है कि उनके देहांत के बाद भी उनकी पत्नी जग्गी देवी को प्रदेश सरकार ने एक टूटा-फूटा इंदिरा आवास दिया था और अब उनका कोई वारिस वहां नहीं है. ज्यादा खतरनाक बात यह है कि  बाबा रामचंद्र के नाम पर एक स्मारक रूरे गाँव के पास था लेकिन अब उसका नाम बदलकर ठाकुर झिंगुरी सिंह बाबा रामचंद्र शर्मा किसान स्मारक रख दिया गया है. मुझे इस आन्दोलन का नेतृत्व बड़े लोगांे में दिखा. ठाकुर झिंगुरी सिंह के परिवार के सदस्य से एक छोटी से बातचीत में मुझे पता चला के वह जमींदार थे, हालाँकि बहुत चतुराई से जमींदार की जगह पर किसान शब्द का इस्तेमाल किया गया है. दरअसल जब अपने समाज में ताकत दिखानी हो तो जमींदारी का जिक्र होता है और जब दूसरे लोगों के वोट या समर्थन लेना होता है तो किसानी का दामन थाम लिया जाता है. उनके पौत्र से ऐसे ही एक मुलाकात में उन्होंने अपनी जमीनों का जिक्र किया था . तब मुझे आभास हुआ कि किस प्रकार से ताकतवर जातियां, अंतरविरोधांे का इस्तेमाल कर, लोगों का नेतृत्व हथिया लेती हैं. भारत के अन्दर राष्ट्रवाद वो आसान यंत्र है, जो समाज के उपेक्षित तबकों में जाग्रति और विद्रोह दबाने के लिए इस्तेमाल किया जाता रहा है. श्री सुभाष चन्द्र कुशवाहा के इस शोध में बाबा रामचंद्र के पूरे चरित्र का बेहतरीन विश्लेषण किया गया है और साथ ही साथ उन्हें आगे करने वालांे की साजिश का भी पर्दाफास किया गया है.
इस पुस्तक में दूसरी बड़ी बात है क्रन्तिकारी मदारी पासी और एका आन्दोलन, जिसके विषय में बहुत कम जानकारी उपलब्ध थी. मदारी पासी हरदोई के रहने वाले थे . उनकी पैदाइश 1860 की बताई गयी है . उनके एका आन्दोलन में अहीर, गड़रिया, तेली, पासी, चमार, मुराव, अरख जैसी उपेक्षित जातियां भाग ले रही थीं . सभी का आन्दोलन, जमींदारी उत्पीडन के विरुद्ध था. मदारी पासी से भगत सिंह की हरदोई जेल में मिलने की बात, बहुत से लेखकों ने की है लेकिन इस पुस्तक में लेखक ने बहुत साफ तौर पर यह सिद्ध किया है कि इसकी कोई सम्भावना नहीं दिखती . क्योंकि भगत सिंह कभी हरदोई जेल में आये ही नहीं . 1922 के आस पास तो भगत सिंह मात्र 15 वर्ष के थे. राजनैतिक तौर पर वह इतना एक्टिव भी नहीं थे . महत्वपूर्ण बात यह कि मदारी पासी, बहुजन समाज में चर्चित व्यक्ति थे और उनके बारे में बहुत सी किवदंतियां बन गयीं थीं जैसे ‘उई हमार पंचन के गांधी आंव’. हालांकि गांधी कभी भी जमींदारोंके विरुद्ध नहीं थे और उन्होंने किसानों से जमींदारांे की यातनाओं को सहने की सलाह दी थी. मदारी पासी का आन्दोलन जमींदारों और सरकार के लिए सरदर्द बना गया था. 2000 से अधिक जवानों को उनकी तलाशी के लिए लगाया गया था . उनकी गिरफ्तारी न हो पाने के विरोध में ये मुद्दा विधान सभा में ठाकुर मशाल सिंह ने 2 मार्च 1922 को उठाया था. यह दिखाता है कि कैसे जमींदारों ने अंग्रेजों के साथ मिलकर छोटे किसानों के विद्रोह को कुचलने का प्रयास किया और कैसे गांधी अहिंसा के नाम पर उनके विद्रोही तेवरों को खत्म कर जमींदारों के प्रति गुस्से को कम कर रहे थे. आज के दौर में हम इस प्रकार का पूरा खेल देख सकते हैं जब जन प्रतिरोध को दबाने के लिए एक तरफ पुलिस प्रशासन और मीडिया साथ-साथ है वहीं ‘आध्यात्म’ की दुकान चलाने वाले भी गाँव-गाँव जाकर अपने शिष्य बनाकर उनके मूलभूत प्रश्नों से लोगांे का ध्यान भटकाकर उनके आन्दोलनों को खत्म करने में गांधीवादी रणनीति का ही इस्तेमाल कर रहे हैं.
मदारी पासी की लोकप्रियता से सभी जमींदार परेशान थे. उनके भाषण का एक अंश देखिये-‘किसान भाइयों, जमीन हमारी, मेहनत हमारी, पैदावार हमारी, लेकिन ले जाता है कोई और, हम सब मिलकर ये शपथ लं कि आगे से ये अत्याचार सहन नहीं करेंगे . किसी को लगान न देंगे. अगर एक किसान जेल जाता है तो बाकि गाँव उसके घर-परिवार और खेती की देखभाल करेंगे. अगर किसी एक किसान की सम्पति या जमीन नीलाम हो जाती है तो दूसरा किसान उसे नहीं खरीदेगा’.
इस पुस्तक में सबसे महत्वपूर्ण बात यह भी है कि इसमें गाँधी की किसानों के प्रति विचारों को अच्छी तरह रखा गया है. हालांकि हम जानते हैं कि इतिहासकारों और अखबारों ने गांधी की थोड़ी भी आलोचना  स्वीकार नहीं किया है. उनको पोप की भूमिका दे दी है लेकिन लेखक ने इस पुस्तक में साफ बता दिया कि आखिर गाँधी ने किस प्रकार से जमींदारों की मदद की . 1922 में बारदोली की बैठक में -‘जमींदारांे को आश्वस्त किया गया कि कांग्रेस की मंशा उनके कानूनी अधिकारों पर चोट करने की कतई नहीं है. किसानों द्वारा लगान न देना देशहित के लिए घातक है. असहयोग आन्दोलन के दौरान जमींदारों, ताल्लुकेदारों के विरुद्ध किसानों के विद्रोह की निंदा की गई.  किसानांे की हिंसा के खिलाफ गांधी खूब चीखते-चिल्लाते थे मगर भूस्वामियो की हिंसा को जो लम्बे समय से किसानांे के विरुद्ध जारी थी, के बारे में एक शब्द भी कहने की जरूरत नहीं समझते थे. वह लगान न देना भी हिंसा मानते थे .’
यह पुस्तक बहुत मेहनत और लगन से लिखी गयी है. सबसे महत्वपूर्ण बात है, लेखक की वैचारिक ईमानदारी . क्योंकि सबूत तो पहले से ही मौजूद थे लेकिन इतिहासकारों ने दलित बहुजन समाज के प्रतिरोध को सामने न लाकर मात्र गांधी का महिमामंडन किया था और उनकी आलोचना को कभी बर्दास्त नहीं किया. सवाल केवल गाँधी का नहीं है. अब नए ‘इतिहास’ का ‘सृजन’ भी किया जा रहा है और जिस तरीके से ठाकुर झिंगुरी सिंह किसान आन्दोलन के नेता हो गए, उनके नाम पर पार्क बना दिया गया वहीं मदारी पासी के बड़े आन्दोलन को छुपा दिया गया. हकीकत तो यह है कि वह अन्दोलन,  बाबा रामचंद्र दास के आन्दोलन से बहुत बड़ा था. क्या आज हमारी इतिहास या समाजविज्ञान की पुस्तकों में मदारी पासी कहीं हैं? आखिर उन्हें पासी समाज और बहुजन किसानों के नायक के तौर पर क्यों नहीं दिखाया जाता ? 
 
पुस्तक-अवध का किसान विद्रोह-1920-1922.
लेखक - सुभाष चन्द्र कुशवाहा 
राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली 
वर्ष-2018
पृष्ठ -327
मूल्य (पेपर बैक)-रु. 299 .
email ईमेल करें Print प्रिंट संस्करण
  • तो अयोध्या पर भारी पड़ेगा कोरेगांव
  • दम है कितना दमन में तेरे देख लिया और देखेंगे
  • विध्वंसकों ने रघुकुल की रीत पर कालिख पोत दी
  • चिनार! तौबा..यह आग !
  • कांग्रेस के आकंठ पाप में डूब गई भाजपा !
  • अंडमान जेल से सावरकर की याचिका
  • हिमालय का चंदन ,हेमवती नंदन
  • कुशीनगर में लोकरंग का रंग
  • सवा चार लाख में बिका था घोड़ाखाल स्टेट
  • साझी नदी , साझी भाषा !
  • चंचल के गांव में दो दिन
  • मैकलुस्की गंज का एक दिन
  • दो रोटी और एक गिलास पानी !
  • मंत्री की पत्नी ने जंगल की जमीन पर बनाया रिसार्ट !
  • आधी आबादी ,आधी आजादी?
  • घर की देहरी लांघ स्टार प्रचारक बन गई डिंपल
  • मायावती का बहुत कुछ दांव पर
  • लो फिर बसंत आई
  • जिसका यूपी उसका देश ....
  • यनम : इतना निस्पंद !
  • Post your comments
    Copyright @ 2016 All Right Reserved By Janadesh
    Designed and Maintened by eMag Technologies Pvt. Ltd.