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कुशीनगर में लोकरंग का रंग
आशा कुशवाहा
कुशीनगर जनपद के जोगिया जनूबी पट्टी गांव में ग्यारह वर्षों से आयोजित हो रहा लोकरंग कार्यक्रम 13-14 अप्रैल को सम्पन्न हुआ. लगभग डेढ़ सौ लोक कलाकारों के जमावड़े के साथ-साथ देश के जाने-माने साहित्यकार, लोकसंस्कृति मर्मज्ञों ने इस लोक उत्सव में भाग लिया और एक गांव की आंतरिक और बाह्य कलात्मकता से परिचित हुए. लोकरंग के बहाने पूर्वांचल के इस गांव ने गंवई लोक समाज को सुसंस्कृति करने और फूहड़पन के विरुद्ध उठ खड़ा होने का अभियान चला रखा है. आयोजन में शामिल हो रहे देश और विदेश के अतिथियों ने देखा कि पूरा गांव कलाग्राम में तब्दील था और सभी लोक कलाकार, गायक और वादक, मुग्ध हो इस सांस्कृतिक आंदोलन के गैर अकादमिक प्रयास पर अभिभूत थे. यही कारण था है कि लोकरंग से विदा होने के बाद हिन्दी के तमाम वरिष्ठ साहित्यकारों ने सोशल मीडिया पर अपनी अलग-अलग टिप्पणियों में लोकरंग आयोजन को रेखांकित किया . 
लोकरंग की यह विशेषता रही है किजहां लोक संस्कृतियों को संरक्षित करने का प्रयास किया जाता है वहीं उनके सामाजिक पक्ष को प्रमुखता दी जाती है. लोक में जो कुछ स्तुत्य है, उसका स्वागत किया जाता है और जो कुछ अवांछनीय है, उससे परहेज.  हर बार गांव में बेहद सफल वैचारिक गोष्ठी होती रही है इस बार की गोष्ठी  का विषय था-‘सामाजिकता के निर्माण में लोकनाट्यों की भूमिका.’ लोकरंग की वैचारिक गोष्ठी में बोलते हुए सुप्रसिद्ध वयोवृद्ध इतिहासकार डा . लाल बहादुर वर्मा ने कहा कि सामाजिकता के बिना मनुष्य, मनुष्य नहीं रह सकता. आज सारा षड़यंत्र इसी बात का है कि हम सामाजिक न रह जाएं. मनुष्य सामाजिक होने के साथ-साथ सांस्कृतिक प्राणी होता है. नाटक तभी चरितार्थ होता है जब वह दर्शकों के सामने प्रस्तुत होता है. दर्शकभी नाटक को रचते हैं. उन्होंने समाज और देश को लोकतांत्रिक बनाने की लड़ाई घर से शुरु करने का आह्वान किया. वरिष्ठ साहित्यकार प्रेम कुमार मणि ने कहा कि सामाजिकता के निर्माण में समाज और मनुष्यता का एक अन्तर्सम्बन्ध बनता है. हमारे सामने प्राकृतिक न्याय और सामाजिक न्याय के सवाल हैं. प्राकृतिक न्याय, जिसकी लाठी उसकी भैंस का न्याय है, जबकि सामाजिक न्याय, कमजोर पर शासन और शोषण का विरोध है जो सबके लिए न्याय सुनिश्चित करता है. उन्होंने कहा कि लोकनाटकों ने जमींदारी और अमीरीके खिलाफ समानता के पक्ष में आवाज बुलंद की है. संगोष्ठी की शुरुआत करते हुए ग्वालियर से आए नाट्यकर्मी योगेन्द्र चैबे ने कहा कि लोक कलाएं कभी प्रदर्शन के लिए नहीं बनीं . आज लोकनाट्य को परम्परा की पैकेजिंग के नाम पर परोसा जा रहा है. लोक कलाएं, लोकप्रियता के दबाव में आ रही हैं, जिसे मुक्त कराने के लिए संघर्ष की जरूरत है. कवि एवं रीवा विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के अध्यक्ष प्रो. दिनेश कुशवाह ने कहा कि लोकनाट्य में तरह-तरह के प्रतिरोध दिखते हैं. भिखारी ठाकुर ने बेटी बेचवा का प्रदर्शन किया तो इसने एक आंदोलन का रूप ले लिया था. लोकनाट्य सामाजिकता के निर्माण में प्रगतिशील और प्रतिरोध के मूल्य गढ़ते हैं. कवि बलभद्र ने जनकवि रमता को याद करते हुए कहा कि लोकनाट्य से सामाजिकता की पहचान होती है. सामाजिक निर्माण की दिशा क्या हो, उसका विकास कैसे हो, इस पर विचार करने की जरूरत है.  उसके अनुरूप कार्य करने की जरूरत है. वरिष्ठ कथाकार मदनमोहन ने कहा कि नाटक लोगों से संवाद का सबसे प्रभावशाली माध्यम है. भिखारी ठाकुर या हबीब तनवीर की परम्परा का विकास क्यों अवरूद्ध हुआ, यह हमारी चिंता का विषय होना चाहिए . 
जन संस्कृति मंच के महासचिव मनोज कुमार सिंह ने डा  आंबेडकर को उनकी जयंती पर याद करते हुए कहा कि भारत में यदि गैर बराबरी और सामाजिक विषमता खत्म नहीं की गई तो संवैधानिक लोकतंत्र विफल हो जायेगा. आज यह सच होता दिखाई दे रहा है.  सामाजिक विषमता के खिलाफ हजारों सालों की लड़ाई को तीखा और निर्णायक बनाने में सांस्कृतिक आंदोलन की महत्वपूर्ण भूमिका है. इस सांस्कृतिक आंदोलन में लोकनाट्य की प्रतिरोधी परम्परा ने बड़ा योगदान दिया है. हमें इसकी क्रांतिकारी परम्परा को आगे बढ़ाना होगा. 
सामाजिक कार्यकर्ता एवं लेखक विद्याभूषण रावत ने कहा कि डा  आंबेडकर के विचारांे की बुनियाद पर कांउटर कल्चर नैरेटिव को स्थापित करने की जरूरत है. ज्ञान पर एक समुदाय का कब्जा है और वहीदलित साहित्य को व्याख्यायित कर रहा है. सभी पम्पराएं महान नहीं होती हैं.  उन्होंने लोक और आधुनिकता के  फ्यूजन पर जोर दिया. 
देहरादून से आईं सामाजिक कार्यकर्ता गीता गौरोला ने देहरादून में सामाजिक संस्कारों में पितृसत्तात्मक मूल्यों के खिलाफकिएजा रहे कार्यों का उल्लेख करते हुए कहा कि लोकगाथाओं में महिलाओं का चरित्र नकारात्मक है. इसे बदलने की जरूरत है. कवि कथाकार व नाटककार सुरेश कांटक ने कहा कि लोक नाटकों की उपज ही, सामाजिक विषमता के खिलाफ विद्रोह से हुआ . शिष्ट साहित्य ने समाज के बड़े हिस्से को अंधेरे में रखने की कोशिश की है जबकि लोक नाट्य, जिसका वर्तमान रूपनुक्कड़ नाटक है, ने समाज परिवर्तन के लिए बड़ा काम किया है. लेखक व पत्रकार सिद्धार्थ ने कहा कि डाॅ. आंबेडकर ने बहुत साफ तौर पर कह दिया था कि देश के अंदर जाति व्यवस्था और पितृसत्ता के रहते सामाजिकता, बंधुता पनप ही नहीं सकती. लोकनाट्य सामूहिकता और चिंता की उपज है, जो लोक के फार्म में लोक के बीच प्रदर्शित होती है. संगोष्ठी में लेखक मोतीलाल, डाॅ.राम प्रकाश कुशवाहा, डाॅ. जितेन्द्र भारती आदि ने भी विचार रखे और लोकनाटकों के साथ अपने अनुभव को साझा करते हुए समाज परिवर्तन में इसकी भूमिका को महत्वपूर्ण बताया.  धन्यवाद ज्ञापन लोकरंग के आयोजन के अध्यक्ष सुभाष चन्द्र कुशवाहा ने किया और संचालन डाॅ. महेन्द्र प्रसाद कुशवाहा ने. 
लोकरंग आयोजन के मुख्य अतिथि, प्रेम कुमार मणि ने लोकरंग आयोजन की परिकल्पना को अनुभव करते हुए लिखा कि -‘हिंदी के जाने-माने लेखक सुभाषचंद्र कुशवाहा का गाँव है जोगिया जनूबी पट्टी. यह पूरबी उत्तरप्रदेश के कुशीनगर जनपद में है . यहाँ का लोकरंग महोत्सव, जो उनके नेतृत्व में ही पिछले दस वर्षों से आयोजित हो रहा है, पूरे हिंदी संसार में चर्चित है . वर्षों से इसकी चर्चा सुन रहा था . इस दफा उस में शामिल होने का अवसर मिला . यह भागीदारी मेरे लिए कुछ खास थी . कुछ -कुछ खुशकिस्मत होने के अनुभव देने वाली . वाकई मैं अभिभूत था .  इस वर्ष ग्यारहवां उत्सव था, जो पिछले 13-14 अप्रैल को संपन्न हुआ . जोगिया गांव कहने को तो उत्तरप्रदेश में है, लेकिन बिहार से बिल्कुल निकट है . कुशीनगर और तमकुही के बीचोबीच, राष्ट्रीय मार्ग से उतर कर पतली, सांप-जैसी एक सड़क पर चलिए और मुश्किल से दो किलोमीटर की दूरी पर मिलेगा जोगिया गांव . भारत के छह लाख गांवों में से एक गांव-जो अपनी पहचान बनाये रखने के लिए संघर्ष कर रहे हैं . इसी गांव में लोकरंग महोत्सव आयोजित होता है . आयोजकों की परिकल्पना और आग्रह है कि लोक अर्थात जनता की संस्कृति पूरे सांस्कृतिक विमर्श के केंद्र में हो . इससे संस्कृति और लोक की द्वंद्वात्मकता बनी रहेगी . सांस्कृतिक मर्यादाएं बे-लगाम नहीं होंगी . मैंने अनुभव किया, उनकी परिकल्पना साकार हो रही है . देश के विभिन्न हिस्सों से सांस्कृतिक मंडल आये हुए हैं अपने प्रदर्शन के लिए . राजस्थान का कठपुतली नाच और घूमर ह,ै तो मालवा का लोकनृत्य वर्षागीत और फकीरी गायन, रायबरेली की शीलू राजपूत का आल्हा गायन है, तो बिहार का जट-जटिन और कमला पूजा नृत्य, गोडउ-नृत्य, पखावज-नृत्य, भवाई-नृत्य, बंजारा-नृत्य के साथ चन्दन तिवारी के भोजपुरी गीत, सूफी कव्वाली, निर्गुण गायन, बांसुरी वादन और जाने कितने रंगारंग सांस्कृतिक अभिव्यक्तियां हुईं . नाटक भी प्रदर्शित हुए . सात समंदर पार नीदरलैंड से आये सरनामी गायक राजमोहन जी का उत्साह देखने लायक था . अपने देश आकर, यहां की सांस्कृति का हिस्सा बन कर निहाल थे .निहाल तो तमाम अतिथि थे. मुझे स्वयं हैरानी हो रही थी कि पूरे प्रदर्शन में जहां दर्जनों कलाकार लड़कियां थीं, दर्शकों की तरफ से किसी तरह का कोई व्यवधान नहीं . हुल्लड़बाजी तो बहुत दूर की बात है . हजारों की संख्या में दूर-दूर के गांवों से चल कर आई हुई जनता अपने कलाकारों के प्रति पूरा सम्मान प्रदर्शित कर रही थी . उत्सव केलिए पूरा गांव सज-धज कर तैयार था . सम्भावना कला मंच, गाजीपुर के सदस्यों की इसमें बड़ी भूमिका थी . हर गली,हर घर अपने रौनक में था . भित्ति-चित्रों और बन्दनवारों की अपनी अदाएं थीं . खुले खेत, जिसमे चन्द रोज पहले जौ की फसल थी, में मंच सजा था . आकाश में तारों की बारात थी . बादलों की लुका-छुपी भी . पुरवा थोड़ी ठहर गई थी . सौंदर्य और सज-धज का ऐसा सांस्कृतिक अनुशासन कम ही देखने को मिलता है .महोत्सव में जनता की भागीदारी देख, मैं अभिभूत था . दस-बीस किलोमीटर के इलाके में कहीं भी पूछ लीजिए लोग बहुत आदर से आपको मार्ग बतलायेंगे . सब इसे पूरे प्रक्षेत्र का प्रोग्राम बतलाते हैं . - लोकरंग में जाना है ? कोई भी बता देगा आपको जोगिया गांव है, जोगिया जनूबी पट्टी . हर साल होता है यह उत्सव कार्यक्रम . जो लोग यह कहते हैं कि हमारी जनता ही विसंस्कृत हुई है, उनके लिए यह उत्सव देखना जरुरी है . उन्हें पता चल जायेगा कि विसंस्कृतिकरण के लिए कौन जिम्मेदार है .’
कहानीकार मदन मोहन ने लिखा कि-‘गांव से लेकर कार्यक्रम स्थल और मंच तक कलाकारों की अर्थवान, मनोहारी चित्रकारियों से जो एक माहौल बनता है, वह लोकरंग के प्रति हमारी रुचियों - जिज्ञासाओं में रंग- विरंगे पंख लगा देता है और हम देर रात तक सिर्फ और सिर्फ कला की दुनिया में विचरते रहते हैं ! संभावना कलामंच ने इस बार भी दो कल्पनाशील बिंदास प्रयोग किए , जिसमें ‘आजादी’ शीर्षक का प्रयोग अद्भुत रहा.’
डाॅ. रामप्रकाश कुशवाहा ने लिखा कि-‘दिनांक 13-14 अप्रैल को प्रसिद्ध सामाजिक चिन्तक और कथाकार सुभाष चन्द्र कुशवाहा के नेतृत्व में लगातार 11 वर्षों से कुशीनगर के फाजिलनगर के समीपवर्ती गांव जोगिया जनूबी पट्टी में आयोजित लोकरंग का दो दिवसीय सांस्कृतिक-साहित्यिक कार्यक्रम इस वर्ष मुझे किसी नए पौधे की तरह नहीं बल्कि एक बड़े वट-वृक्ष की तरह लगा . यहां आकर प्रतिभाग मात्र से कलाकारों को मिलने वाला सार्थकता बोध उन्हें जैसे धन्यता दे रहा था . खुले थिएटर में खुले आसमान के नीचे बैठी हजारों की भीड़ इस कार्यक्रम के जनस्वीकृति और लोकप्रियता का प्रमाण दे रही थी तो कलाकारों का हम किसी से कम नहीं वाला आत्मविश्वास यह विज्ञापित कर रहा था कि लोकरंग अपने औचित्य को लेकर प्रश्न-काल से बाहर निकल चुका है . एक और बात मैंने नोटिस की कि सुभाषचन्द्र कुशवाहा जिस जुनून से इस कार्यक्रम को यहां तक लाए वे अकेले पूरी ताकत लगा चुकने के बाद वाला विश्राम चाहते से लगे . एक बोझ को लगातार अकेले ढोते रहने के बाद वाला प्रश्नांकन कि आखिर ऐसा कब तक ? उनके भीतर कौंधता हुआ सा लगा . एक ओर लोकरंग के कार्यक्रमों ने जहां लोगों की अपेक्षाओं और आदतों में प्रवेश कर लिया है वहीं इस मिशन से और हाथों और कन्धों के जुड़ने की जरुरत है . आधुनिकता और पर्यावरण विनाश की आंधी को निजी संसाधनांे से रोकने का सपना एक जिद और जुनून से आगे जाने के लिए जन सहयोग पर आधारित आन्दोलनधर्मी विस्तार की प्रतीक्षा और मांग कर रहा है . अपने परिवार की निजी जमीन पर बनाए गए इस खुले थिएटर के प्रांगण का वर्ष भर उपयोग करने के लिए इस समिति को उसी से लगी जमीन पर बच्चों का स्कूल भी खोल देना चाहिए . इससे वर्षभर सुषुप्तावस्था में उनकी खाली पड़ी जमीन नयी पीढ़ी की किलकारियों से गुलजार रहती . संस्था की ऐसी बहुआयामिता जिसमें एक पुस्तकालय-संग्रहालय और कुछ स्थायी कर्मचारियों का होना ही ऐसे आन्दोलनधर्मी मिशनरी कार्यक्रमों को एक दीर्घकालिक नैरन्तर्य और अर्थवत्ता दे सकता है . लोकरंग को अपनी यात्रा के दूसरे चरण में अन्य नगरों मे भी ऐसे ही सांस्कृतिक लोक-मेले आयोजित करने के बारे मे सोचना चाहिए. इस आयोजन की दृश्य-सज्जा मे मुहम्मदाबाद गाजीपुर के कला-प्राध्यापक श्री राजकुमार सिंह के संभावना कला मंच के सहयोगी कलाकारों की भूमिका महत्वपूर्ण है.’
कुल मिलाकर लोकरंग 2018 से विदा होते अतिथि और लोक कलाकारों ने पुनः 2019 में इसके सफल आयोजन की परिकल्पना की . पूरे गांव के कार्यकर्ताओं को धन्यवाद दिया तथा इस सांस्कृतिक मुहिम को जारी रखने पर बल दिया.
 
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