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कहानी एक पहाड़ी शहर की

शैलेंद्र प्रताप सिंह 

मशहूर लेखिका शिवानी की बडी बहन भवाली के हेरिटेज काटेज में रहने वाले डाक्टर के सी पंत जी के साथ ब्याही थी और उनके ही पुत्र जे एन यू प्रोफ़ेसर श्री पुष्पेश पंत जी है . इस सम्बंध में पता चला कि शिवानी जी की बडी बहन का नाम जयंती था और जयंती जी के साथ ही वह शांतिनिकेतन में पढ़ी थी और उनसे बहुत प्रभावित भी रहती थी . जयंती जी का घर शिवानी और उनके बच्चो का भी घर जैसा ही था . इस तरह शिवानी जी का भवाली से भी निकट का नाता रहा है , भवाली खूब आना जाना रहा है . टैगोर जी की बहुत ही या सबसे लाड़ली शिष्या भी जयंती जी थी . 
जयंती और शिवानी जी की माँ लीलावती पंत जी लखनऊ के प्रसिद्ध महिला कालेज की शुरुआती पाँच बिद्यार्थियों में थी और जिन्हें कक्षा 8 में प्रथम आने पर अवध के तत्कालीन ब्रिटिस रेज़ीडेंट हरकोर्ट बटलर द्वारा  पुरस्कृत भी हुई थी . उल्लेखनीय है कि लीलावती जी के पिता श्री ( शिवानी के नाना ) डा हरदत्त पंत जी लखनऊ के बहुत ही प्रसिद्ध चिकित्सक थे . वह अल्मोडा के प्रसिद्ध चम्पा नौला के पंत थे . राजा बलरामपुर के ब्यक्तिगत चिकित्सक होने का फ़ायदा उठाते हुये , उनसे ज़मीन लेकर , वह लखनऊ के प्रसिद्ध बलराम अस्पताल के संस्थापक बने . लाला पुत्तू लाल से एक घर दान में लेकर लखनऊ का महिला कालेज भी खुलवाया था . 
शिवानी के पिता श्री अल्मोडा के अश्वनी कुमार पांडेय रामपुर नवाब के यहाँ गृह मंत्री और फिर ओरछा रियासत के दीवान भी थे . वह अल्मोडा के प्रसिद्ध कुमायुंनी ब्राह्मणों और यहाँ तक कि कसून मोहल्ले की नाक बने अपने पिता के दकियानूसी बिचारों से बिलकुल अलग उदारवादी सोच के एक प्रगतिशील शख़्सियत थे . इसी का फायदा शिवानी , उनकी बडी बहन जयंती और भाई त्रिभुवन को मिला और तीनो पढ़ने के लिये शांतिनिकेतन भेजे गये . वैसे भी शांतिनिकेतन के रहन सहन और वहाँ की पढाई से शिवानी के बाबा को भी ऐतराज़ नही हुआ . वह संस्कृत के बहुत बडे बिद्वान और बी एच यू के संस्थापकों मे से भी थे पर थे बहुत ही दक़ियानूसी ख़यालों के . उन्होने एक बार अपनी पुत्र बधू लीलावती जी का ससुराल जाने पर इस कारण प्रतिबंध लगा दिया कि उनका भाई इंग्लैंड पढ़ने गया था और पिता डाक्टर साहब बहुत ही उदारवादी सोच के है और पुत्रवधू के वहाँ जाने से उनके घर के मूल्य बिगड़ जायेंगे . उन्होने बहू लीलावती को इंग्लैंड से लोटे उस एक मात्र भाई की शादी में भी जाने नही दिया था . इसको लेकर अल्मोडा में कसून के पांडेय और चम्पानौला के पंतो में काफी तनातनी हुई और बोलचाल तक बंद हो गयी थी . वहीं उनके पुत्र और शिवानी के पिता अश्वनी जी , शराब और सिगरेट पीने के शौक़ीन , क्लब की जिंदगी को पसंद करने वाले ब्यक्ति थे . उनके तमाम राजे महराजो से दोस्ती थी . वह जिम कार्बेट के भी अच्छे दोस्त थे .
 
खैरना के आगे अल्मोडा वाली रोड तो 1962 के बाद बनी इसलिये जयंती जी , भाई त्रिभुवन और शिवानी जी को अल्मोडा से शांतिनिकेतन आने जाने के लिये घोड़ों और अपने पैरों पर ही भरोसा करना था . रास्ता भवाली होकर ही जाता था . रास्ते में पड़ाव भी करने पड़ते थे . वर्ष 1923 में जन्मी गौरीपंत ( शिवानी ) जब शांतिनिकेतन पढ़ने गयी थी ( वर्ष 1935 ) , उस समय उनकी उम्र मात्र 12 साल थी . जब वह शांतिनिकेतन में बी ए आनर्स कर ही रही थी कि उनके पिता जी की अचानक मृत्यु हो गयी और घर पर आर्थिक कठिनाइयों का पहाड़ टूट पड़ा . उस समय शिवानी जी की मां   की उम्र भी चालीस वर्ष से कम थी . शांतिनिकेतन के अंतिम वर्ष की पढाई का ख़र्च भी उनकी बडी बहन जयंती और रामपुर के पारिवारिक मित्र हामिद भाई ने उठाया . 
वर्ष 1943 में गौरा पंत जी ने बी ए आनर्स की पढाई पूरी कर अल्मोडा वापस आयी . मां   लीलावती किसी तरह घर के ख़र्च चला रही थी . कभी कभी इस हेतु उन्हे घर के पुराने सामान तक बेचने पड़ते थे . ऐसी बिवशता के बीच गौरा जी को अल्मोडा के ही विधुर शुकदेव पंत जी से शादी करने के प्रस्ताव आये . शुकदेव पंत जी इलाहाबाद विश्व विद्यालय से कमेस्ट्री के टापर थे . आईसीएस  की प्रतियोगिता में शामिल हुये पर चयन न हो सका सो अध्यापक बन बैठे . इस बीच उनका अल्मोडा की अति सुंदरी गंगा से प्यार हो गया और यह पता चलने पर भी कि वह टी वी की मरीज है , अपने पिता जी का घोर विरोध झेलते हुये भी , बहुत ही अंतर मुखी तवियत के सुखदेव जी ने उससे शादी की . शादी की रात ही गंगा बेहोश होकर गिर गयी . अपने बाँहों से उठाकर सुखदेव जी गंगा को अस्पताल ले गये . शादी के एक साल के अंदर पुत्री बीना पैदा हुई . कुछ समय बाद तवियत ज्यादा खराब होने पर उन्हे भवाली के पास गेठिया सेनेटोरियम लाया गया किन्तु उन्हे बचाया नही जा सका . शुकदेव पंत जी के पिताश्री बिटिया की देखभाल के मद्देनज़र शुकदेव को जल्दी शादी करने का जोर डाल रहे थे . आर्थिक परिस्थितियों बस गौरापंत ने उनसे वर्ष 1945 में शादी की हामी भर दी . वर्ष 1946 मे सुप्रसिद्ध लेखिका और सम्पादक मृणाल जी ( मीनू ) पैदा हुयी थी . शिवानी जी ने गंगा से पैदा बेटी बीनू को कभी यह महसूस नही होने दिया कि वह उनकी सगी बेटी नही है . मृणाल के पैदा होने के कुछ दिन बाद ही शुकदेव जी नैनीताल के बिरला विद्या मंदिर में कमेस्ट्री टीचर बन कर आ गये और वही आ गया सारा परिवार . दो तीन साल बाद ही सरकारी सेवा में अल्मोडा के डी आई ओ एस बन सुखदेव पंत जी आ गये अल्मोडा . फिर उनके एक और पुत्री लेखिका ईरा पंत 1951 में पैदा हुई . 
शिवानी और सुकदेव जी अलग अलग प्रकृति के थे . शिवानी घर की रसोई से दूर स्वच्छंद घूमने टहलने वाली मस्त प्रकृति की थी जबकि सुकदेव जी अन्तर्मुखी , मूडी , शोर शराबें से दूर ज्यादातर चुप रहने वाले ब्यक्ति थे और चाहते थे कि पत्नी घरेलू कामकाज में लिप्त रहें . घर के प्राणियों के लिये तमाम तरह के कानून उन्होने बना रखे थे . शुकदेव जी घोर शाकाहारी तो शिवानी जी घोर माँसाहारी . अक्सर हफ़्तों बात न करने वाले पापा से बच्चे बहुत डरते थे . शिवानी जी यद्यपि बच्चों को कुछ बताती नही थी पर उनके चेहरे पर अक्सर आने वाले दुखों को बच्चे ताड़ लेते थे और वे खुद भी उससे प्रभावित होते थे. जयंती जी को तो विशेषरूप से शुकदेव जी का ऐसा आचरण पसंद नही आता था .
 
 
शिवानी जी की दूसरी बेटी इरा पंत ने शिवानी जी के जीवन पर ‘ दीदी ‘ नामक पुस्तिका में यह निष्कर्ष निकाला कि घर के घुटन भरे क़ानूनों के प्रतिरोध स्वरूप ही दीदी ( शिवानी जी ) ने कहानी लिखना शुरू किया . वह यह भी मानती है कि यदि वह अपनी बड़ी बहन भवाली वाली मौसी जयंती जी की तरह स्वच्छंद छोड दी गयी होती , तो शायद वह भी बस क़िस्से कहानी सुनाती हुई अपनी जिंदगी गुज़ारती जैसे जयंती जी गुज़ार रही थी . 
यहाँ इरा जी की बावत मै यह बताना चाहूँगा कि जब मै 1970 में इलाहाबाद यूनीवर्सिटी में पहुँचा था , ईरा जी उस समय एम ए इंग्लिश प्रथम वर्ष की छात्रा थी और बी ए की टापर थी . देखने में बहुत खूबसूरत थी . पढ़े लिखे सम्पन्न घरों की लड़कियाँ अंग्रेज़ी बिषय जरूर पढ़ती है और इस कारण इलाहाबाद के इंग्लिश डिपार्टमेंट में लड़कियों की संख्या बहुत ज्यादा होती थी और वह भी यूनिवर्सिटी की क्रीम लड़कियों की . वहाँ की चहल पहल बहुत लुभावनी होती थी . मैने बी ए में अंग्रेज़ी साहित्य बिषय प्रतियोगिताओं को दृष्टिगत रखते हुये चुना था .गांव के स्कूल में हाई स्कूल तक पढा था जहाँ अंग्रेज़ी बोली नही वरन परीक्षा के मद्देनज़र केवल पढ़ी जाती थी . मैने अंग्रेज़ी को जिया नहीं , वरन उसे मै सीख रहा था . मेरे लिये यह बिषय था जरूरी पर था बहुत कठिन . पढ़ने में बिलकुल रुचिकर न लगता था पर जरूरी होने के कारण ही मैने बी ए के बाद अपनी पढाई का माध्यम अंग्रेज़ी कर लिया था . 
बिषय न सही पर अंग्रेज़ी बिभाग के बडे बडे बरामदों में आती जाती लड़कियों की आमददरफ्त मुझे जरूर भाती थी . वहीं हमने जाना कि यह बी ए की टापर शिवानी जी की पुत्री ईरा पंत जी है . यूनीवर्सिटी में लम्बे अवकाश पर लखनऊ और इलाहाबाद के बीच यात्रा के लिये त्रिवेणी एक्सप्रेस ही बिद्याथियों को मुआफिक पड़ती थी . ईरा जी भी उसी से आती जाती थी . मै भी उसी से रायबरेली में सवार होता या उतरता था . ट्रेन में घूमते टहलते ईरा जी दिख भी जाती थी . हमें बहुत अच्छा लगता था . मै उन्हे पहचानता था पर वह हमें नही पहचानती थी . पहचानने का सवाल भी नही था . हम लोग विभाग में बहुत जूनियर थे . रही बात बात करने कि तो उस समय अंग्रेज़ी में और वह भी किसी लडकी से बात करना मेरे बस का भी नही था . 
ईरा पंत जी के अनुसार शिवानी जी की ‘ लाटी , ‘ ‘ बंद घड़ी ‘ और ‘लाल हवेली ‘ कहानियाँ ‘ उनकी आत्मकथात्मक कहानियाँ हैं . लाटी कहानी भवाली के पास के ही गेठिया सेनेटोरियम की कहानी है जहाँ शुकदेव जी ने पहली पत्नी गंगा का इलाज कराया था . जहाँ दिन भर तमाम चेतावनियों के बाद भी वह पत्नी की सेवा में लगे रहते थे और मरने के बाद भी जिसे वह कभी भूल नही पाये . शिवानी जी को अपनी पूरी जिंदगी ऐसे पति के साथ काटनी थी और वह भी दूसरी वरीयता की पत्नी बनकर . निश्चित ही कितनी कठिन रही होगी शिवानी जी का यह जिंदगी . वह बच्चो को बोझिल नही करना चाहती थी सो कहानी लिखकर ही अपना ग़ुबार निकाल लेती थी , अपने को हल्का कर लेती थी , ख़ाली समय का सदुपयोग कर लेती थी . ज़रा सोचे एक युवा , हुनरमंद , और स्वच्छंद तवियत के प्राणी को , जो शांतिनिकेतन में अपने दिमाग और अपनी आवाज़ के लिये अपने मित्रों में बहुत ही लोकप्रिय रहा हो , वह सब भूल जाना कितना कठिन रहा होगा और वह भी द्वितीय वरीयता की पत्नी बनकर . लाल हवेली कहानी में देश के विभाजन के समय शादी शुदा सुधा फँस जाती है पाकिस्तानी दरिंदो के बीच जहाँ एक नवयुवक उससे शादी करता है , बहुत प्यार करता है पर वह बन जाती है ताहिरा . हिंदुस्तान मे एक शादी में सम्मलित होने वह उसी शहर में आ जाती है जहाँ उसकी ससुराल थी और देखती है अपनी लाल हवेली . बहुत कसमकस से गुज़रती है , खूब रोती है , और सबसे छुपकर एक दिन अपने पति को देखने लाल हवेली भी जाती है . पति को सिर्फ देखती हैं और वापस भाग आती है . शिवानी ने इस आत्मकथात्मक कहानी में पुराना सब कुछ भूलने की प्रक्रिया में नायिका के मन में मच रही उथल पिछले को बहुत ही उम्दा और भावनात्मक तरीके से उकेरा है .लेखक पूर्व आईजी हैं और भवाली का इतिहास टटोल रहे हैं .
 
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