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शहीद सौरभ कालिया का नाम याद है आपको?

सुप्रिया रॉय
नई दिल्ली, 4 जुलाई- ऑपरेशन विजय की दसवीं साल गिरह की धूमधाम में किसी को शायद ही सौरभ कालिया का नाम याद होगा? सौरभ कालिया सिर्फ 22 साल के थे और सबसे पहले उन्होंने ही इस खबर की पुष्टि की थी कि पाकिस्तानी सेना और उसके घुसपैठिए भारतीय पहाड़ों की चोटी पर चढ़ आए हैं।
इन्हें खदेड़ने के लिए कैप्टन सौरभ कालिया अपने साथियों अर्जुन राम, भंवर लाल बघेरिया, बीकाराम, मूलाराम और नरेश सिंह के साथ नियंत्रण रेखा पर काफी आगे चले गए और वहां जब पूरे दिन की गश्त के बाद रात को हमला करने की योजना बना कर ये आराम कर रहे थे तो जाट रेजीमेंट के इन सभी अफसरों का अपहरण पाकिस्तानी सैनिकों ने कर लिया। उन्हें बर्बर यातनाएं दी गई, उनकी आंखे निकाल ली गई और फिर गले काट दिए गए। लाशें भारतीय सीमा में फेंक दी गई।
सौरभ कालिया और उनके किसी साथी को वीरता का कोई पदक नहीं मिला। सौरभ लेफ्टिनेंट से कैप्टन बनने के बाद अपना पहला वेतन भी नहीं ले पाए थे। आखिरी चिट्ठी में उन्होंने लिखा था कि मैं दुश्मन को हरा कर और अपना वेतन ले कर घर आऊंगा और तब हम पार्टी करेंगे। सौरभ कालिया का घर हिमाचल प्रदेश के पालमपुर में हैं जहां उनके पिता नरेंद्र कुमार कालिया और मां विजया रहती है। मां को तो बेटे की मौत की खबर सुनते ही दिल का दौरा पड़ गया था और उन्हें अपनी नौकरी भी छोड़नी पड़ी थी।
एक युवा और होनहार अधिकारी की मौत के बदले उसके परिवार को एक रसोई गैस एजेंसी दे दी गई। इस एजेंसी से परिवार को महीने में पांच से आठ हजार रुपए बचते है। अपने बेटे को खो देने का गम श्रीमती विजया कालिया को जरूर है लेकिन इससे भी ज्यादा गम इस बात का है कि सीमा पर जान गंवाने वाले उनके बेटे का नाम शहीदों की सूची में कहीं नहीं है।
कारगिल जिले में द्रास के पास बने विजय स्मारक पर लिखे हजारों शहीदों के नामों में सौरभ कालिया का नाम नहीं है। वहां काम कर रहे सैनिकों को ये नाम याद भी नहीं है। दिल्ली में सेना मुख्यालय से पता किया गया तो बहुत जोर देने पर पता चला कि विजय स्मारक पर द्रास इलाके में यानी टाइगर हिल, तोलोलिंग, थ्री पिंपल्स और प्वाइंट 8617 पर शहीद होने वालों के ही नाम है। सौरभ कालिया और उसके साथियों की लाशें काकसर इलाके में मिली थी और दबी जुबान तकनीकी नियमों का हवाला देते हुए अधिकारी यह भी कहते हैं कि सौरभ और उनके साथी शहीद नहीं हुए बल्कि युद्व बंदी बन गए थे और वहां उनकी जान गई।
इस बात को सही मान भी लें तो सौरभ कालिया और उनके वीर साथियों के साथ पाकिस्तान के जल्लादों ने जो रवैया अपनाया वह अंतर्राष्ट्रीय युद्व अधिनियम और संधि का सरेआम उल्लंघन था और भारत सरकार को हक है कि सौरभ और उसके साथियों को पकड़ कर मारने वाली पाकिस्तानी फौज की टीम को भारत बुला कर जो भी सजा हो वह दें।

 

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