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छत्तीसगढ़ के बांध सूखने की कगार पर

संजीत त्रिपाठी
रायपुर। मानसून के पूरे रंग मे नहीं आने के कारण छत्तीसगढ़ के बांध सूखने की कगार पर पहुंच चुके हैं। हालत यह है कि कुछ बांधों में पांच प्रतिशत से भी कम पानी है। सिंचाई के लिए पानी के लाले पड़ गए हैं। अब तक हुई मामूली बारिश के कारण इन बांधों में पानी की मात्रा काफी कम हो चुकी है। अगर स्थिति जल्द नहीं सुधरी तो आने वाले दिनों में किसानों के साथ-साथ आम नागरिकों को पानी के लिए तरसना पड़ सकता है। चावल महोत्सव मनाने वाला धान का कटोरा पर अकाल की छाया और गहराती तो जा ही रही है लेकिन बांधो में पानी की कमी के चलते अब पेयजल संकट भी और गहरा सकता है।
छत्तीसगढ़ में कुल 41 छोटे-बड़े बांध हैं जिनकी कुल जल संग्रहण क्षमता 6400 क्यूबिक मीटर है। जबकि 7 जुलाई तक के आंकड़ों के मुताबिक इन सभी बांधो में कुल 1605.91 क्यूबिक मीटर पानी ही बचा हुआ है। यह कुल क्षमता का करीब 25 फीसदी ही है। वर्ष 2008 में ठीक इसी वक्त पर इन बांधों में कुल 2085 क्यूबिक मीटर पानी था जो कि कुल क्षमता का 32 फीसदी था जबकि वर्ष 2007 में यह 38 फीसदी था।  मतलब यह कि मानसून छत्तीसगढ़ को तो दगा तो दे ही चुका है और अब राज्य के बांध भी साथ छोड़ने की हालत पर हैं।
बांधों की बात करें तो राज्य के छोटे बांध जैसे कि तांदुला में उसकी कुल क्षमता का सिर्फ एक फीसदी पानी ही बचा । वहीं माडमसिल्ली बांध में भी एक फीसदी, परियानारा में 2 फीसदी,  केदारनाला में 2 फीसदी और केसावा में कुल क्षमता का  3 फीसदी पानी ही बचा हुआ है। राज्य के दो बड़े बांध हसदेव बांगों में कुल क्षमता का 36 फीसदी  और गंगरेल में 25 फीसदी पानी बचा हुआ है।
प्रदेश में अभी तक कम वर्षा के कारण सभी प्रमुख बांध खाली हैं। इस वजह से पहले ही मानसून की दगाबाजी झेल रहे किसानों को खेतों की सिंचाई  के लिए पानी मिल पाना और मुश्किल लगता जा रहा है। वहीं जिन बांधो में जलवुद्यित परियोजनाएं हैं  उन योजनाओं पर भी असर पड़ सकता है। अगर जल्द ही अच्छी बारिश नहीं हुई तो बांधों मे पानी की कमी के चलते राजधानी समेत कई शहरों में पेयजल की दिक्कत आ सकती है। वहीं यह भी ध्यान देने लायक बात है कि भिलाई स्टील प्लांट जैसे संयंत्र भी पानी के लिए बांधो पर ही निर्भर है।

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