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आखिरी सांस तक कॉमरेड ज्योति बसु

जनादेश ब्युरो
नई दिल्ली, जून- जीने का तरीका और अपनी शर्तों पर जीने के तरीके कोई ज्योति बसु से सीख सकता है। अपनी 95वीं साल गिरह मनाई। प्रणब मुखर्जी जैसे पुत्रवत नेताओं ने फोन कर के बधाई दी तो जवाब में पार्टी की सारी आपत्तियां छोड़ कर अच्छा बजट पेश करने की बधाई उन्हें भी दी, फिर सांस फूली, पेट में दर्द हुआ तो अस्पताल में भर्ती हुए और वहां दो बार बेहोश हुए। फिर होश आया तो बगैर किसी को आवाज दिए बाथरूम गए और ये जानते हुए गए कि कमजोरी की बेहोशी में दो बार बाथरूम में गिर चुके हैं, और दिमाग में खून का एक थक्का जमा हुआ है।
इस बार भी बेहोश हो कर गिरने वाले थे कि सहायक रवि और नर्स से उन्हें पकड़ लिया और जब नब्ज पर हाथ रखा तो नब्ज गायब थी और ब्लड प्रेशर पढ़ने में ही नहीं आ रहा था। ये मृत्यु के लक्षण थे मगर सीने पर मालिश की गई तो थोड़ी ही देर में होश में भी आ गए। बात भी की और लंच में सूप भी पिया। विमान बसु, प्रणब मुखर्जी और सोमनाथ चटर्जी मिलने पहुंचे तो उनसे कम ही सही लेकिन धीमी आवाज में बात भी की।
इस उम्र में इतनी जिजीविषा सिर्फ ज्योति बसु दिखा सकते थे। ज्योति बसु कितने पुराने हैं यह इसी से जाना जा सकता है कि वे कुख्यात जालियावाला बाग कांड के पांच साल पहले पैदा हुए थे। उन्होंने भारत में लगातार किसी भी राज्य का सबसे लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहने का रिकॉर्ड भी बनाया है। 1977 से 2000 तक वे बंगाल के मुख्यमंत्री रहे और 1964 में जब माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी बनी थी तो उसके पोलित ब्यूरो में थे और 2008 में स्वास्थ के कारण इस्तीफा दिया।
ज्योति बसु का पूरा नाम ज्योतिंद्र नाथ बसु है। पिता जी बांग्लादेश के बरोदी गांव ढाका जिला से आए थे और डॉक्टर थे। सेंट जेवियर्स और प्रेसिडेंसी कॉलेज से 1935 में ग्रेजुएट हुए जब आज के महारथी माक्र्सवादी नेताओं में से ज्यादातर पैदा भी नहीं हुए थे। फिर इंग्लैंड गए और बैरिस्टर बन गए। बाद में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी बनाने वाले भूपेश गुप्ता उस समय ब्रिटिश कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य थे और उन्होंने ही ज्योति बसु को कॉमरेड बनाया। वकालत की पढ़ाई कर के भारत 1940 में लौटे ज्योति बसु भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के फूल टाइम कॉमरेड हो गए और सबसे पहले मजदूर संगठन चलाए। ज्योति बसु ने रेलवे की यूनियन बनाई थी और कई धुआधार हड़ताले करवाई थी।
1946 में ज्योति बसु भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की ओर से पहली बार विधायक बने और जब भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का विभाजन हुआ तो वे इसके संस्थापक नौ सदस्यों में एक थे। उस समय बंगाल की राजनीति में नए नए प्रयोग हो रहे थे और बंगाल में जब पहली बार यूनाइटेड फ्रंट सरकार बनी तो ज्योति बसु 1967 और 1969 में बंगाल के उप मुख्यमंत्री बने। 1977 में कांग्रेस विरोधी लहर में चुनाव हुए थे तो बंगाल में वाम मोर्चा की सरकार बनी और ज्योति बसु मुख्यमंत्री बनाए गए। आपको याद होगा कि 1996 में जब कांग्रेस के समर्थन से कोई गैर कांग्रेसी सरकार बननी थी तो सबसे पहले ज्योति बसु को प्रधानमंत्री बनने का निमंत्रण दिया गया था। उनकी पार्टी और खास तौर पर उस समय पोलित ब्यूरो के महासचिव स्वर्गीय हरकिशन सिंह सुरजीत ने ऐसा नहीं होने दिया और बाद में खुद कहा कि यह एक ऐतिहासिक भूल थी। ज्योति बसु नहीं बने तो हरदन हल्ली देवेगौड़ा को प्रधानमंत्री बनाया गया।
आज भी ज्योति बसु की गतिविधियां भले ही सीमित हो गई हों, वामपंथी राजनीति में आखिरी राय उन्हीं की मानी जाती है। जब भी कोई बवाल होता है तो लोग ज्योति बसु के चरणों में बैठते हैं। इतना ही नहीं बंगाल से वामपंथ का सफाया कर देने के लिए तत्पर ममता बनर्जी भी लगातार उनसे मिलती रहती है। ज्योति बसु सलाह देते हैं लेकिन यह भी कह देते हैं कि इसे मानना किसी के लिए अनिवार्य नहीं है।
विवाद भी ज्योति बसु के हिस्से में कम नहीं आए। कोलकाता में अभिजात कॉलोनी सॉल्ट लेक कॉलोनी में प्लॉटों के आवंटन को ले कर तो सर्वोच्च न्यायालय तक उन्हें नोटिस दे दिया था। इसके अलावा उनके बेटे चंदन बसु जब सफल उद्योगपति बन गए तो सवाल उठाया गया कि एक मजदूर नेता का बेटा कैसे पूंजीपतियों की कतार में शामिल हो गया है। ज्योति बसु चंदन का घर छोड़ कर एक छोटे से घर में रहने लगे और आज तक वहीं रहते हैं। मुख्यमंत्री रहते हुए भी उन्होंने बंगला नहीं लिया। वे सिर्फ अपने छोटे से फ्लैट में रहते रहे। अपने अवसान के करीब पहुंच चुके ज्योति बसु ने आज भी वामपंथी सरोकारों को जीवित रखने में लगातार जुटे रहने का फैसला किया है और वे लगातार पूरे देश की वामपंथी गतिविधियों पर नजर रखते रहे हैं।
माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी इस समय संक्रमण के उस दौर से गुजर रही है जहां एक ओर इसे जमीनी संघर्ष की जरूरत है तो दूसरी ओर बहादरू फैसले ले सकने वाले नेताओं की। प्रकाश करात और उनकी सुंदर पत्नी बृंदा करात बार बार यह जाहिर कर चुके हैं कि आखिरकार उन्हें जमीनी राजनीति भी नहीं आती और सिध्दांतों के मामलों में भी उनकी स्मृति लोप हो गई है। प्रकाश करात जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय छात्र संघ के अध्यक्ष रह चुके हैं लेकिन वो जमाना दूसरा था। मतदाता भी पढ़े लिखे थे और मुद्दों के आधार पर मतदान करते थे। अध्यक्ष तो सीताराम येचुरी भी रह चुके हैं और वे ज्यादा वोटों से चुनाव जीते थे।
यह सही है कि माक्र्सवादी पार्टी का पोलित ब्यूरो पार्टी की सबसे बड़ी निर्णायक संस्था होती है लेकिन यह भी सही है कि पोलित ब्यूरो का किया हुआ हर काम हमेशा सही नहीं माना जा सकता। प्रकाश करात ने तो धृष्टता की हद तब कर दी थी जब पार्टी में सोमनाथ चटर्जी को ले कर उठे विवाद पर उन्होंने बार बार सलाह दिए जाने के बावजूद ज्योति बसु से मिलने से इंकार ही कर दिया था। बाद में जब हालात हद से बाहर निकल गए तो वे ज्योति बसु के चरणों में जा कर गिरे जरूर लेकिन ज्योति बसु ने जो समझाया वह या तो प्रकाश करात की समझ में नहीं आया या फिर उनके अपने कोई परम क्रांतिकारी विचार है। ज्योति बसु जब नहीं रहेंगे तब भी उनके राजनैतिक और प्रशासनिक फैसलों से पार्टी को प्रेरणा मिलती रहेगी और मुझे नहीं लगता कि कोई और कॉमरेड ज्योति बसु का इतने लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहने का रिकॉर्ड तोड़ पाएगा।

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