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उत्तर प्रदेश में राजनीति के नए ध्रुव बने

 नीरज दुबे

उत्तर प्रदेश गत सप्ताह एक बार फिर देश की राजनीति का उस समय केंद्र बिंदु बन गया जब प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष रीता बहुगुणा जोशी की गिरफ्तारी के मुद्दे पर संसद के दोनों सदनों में हंगामा हुआ और कार्यवाही दिन भर के लिए स्थगित करनी पड़ी। मुद्दे की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लग जाता है कि कांग्रेस के आरोपों का जवाब देने के लिए मायावती ने लगातार तीन दिन तक संवाददाता सम्मेलन आयोजित कर अपना पक्ष रखा। 
दूसरी ओर कांग्रेस अब प्रदेश भर में आंदोलन पर उतारू है क्योंकि उसे ऐन उपचुनावों से पहले एक ऐसा मुद्दा मिल गया है जोकि वर्तमान विधानसभा में भी उसके सदस्यों की संख्या बढ़ा सकता है। मूर्तियां लगवाने के मामले में पहले ही विपक्ष के आरोपों से घिरी मायावती सत्ता हाथ में होने के चलते भले ही रीता के खिलाफ कार्रवाई करने में सफल रही हों लेकिन इस प्रकरण ने उनके लिए चुनौतियां बढ़ा दी हैं क्योंकि कांग्रेस उनके खिलाफ अब पहले से ज्यादा मजबूती के साथ सामने आएगी।
दरअसल यह सारी लड़ाई है उन दलित वोटरों पर कब्जा करने की जोकि कभी कांग्रेस के होते थे लेकिन सत्ता में भागीदारी के लिए उन्होंने बसपा का दामन थाम लिया। लेकिन सत्ता का यह सुख वास्तव में निचले स्तर तक पहुंचा ही नहीं। शायद यह भी एक कारण रहा कि हाल में संपन्न लोकसभा चुनावों में बसपा से दलित वोट कुछ टूटकर वापस कांग्रेस की ओर आया। इससे कांग्रेस को लगा कि जरा सा और प्रयास किया जाए तो यह पूरा वोट बैंक फिर से वापस आ सकता है। 
पार्टी महासचिव बनने के बाद से ही राहुल गांधी का दलित बस्तियों में विशेषकर जाना और वहां रात्रि विश्राम ने भी दलितों को पार्टी से फिर से जोड़ने में महती भूमिका निभाई। पहले मायावती राहुल के इन प्रयासों को बचकाना मान रही थीं और इसे गंभीरता से नहीं ले रही थीं लेकिन लोकसभा चुनाव परिणामों ने उन्हें अपने मूल वोट बैंक में हुए बिखराव के प्रति चिंतित कर दिया और इसे दुरुस्त करने का मौका उन्हें तब मिल गया जब रीता ने उनके खिलाफ अमर्यादित टिप्पणी कर दी। 
उन्होंने इसे झट से दलितों का अपमान बता दिया और राज्य पुलिस ने उनके खिलाफ तत्काल एससी एसटी एक्ट तथा भड़काऊ भाषण देने संबंधी धारा के तहत मामला दर्ज कर लिया और उन्हें रातोंरात गिरतार कर जेल भेज दिया। मायावती जहां इस मुद्दे को दलितों के अपमान से जोड़ रही हैं वहीं कांग्रेस आलाकमान ने भी रीता की टिप्पणी से इसलिए किनारा कर लिया कि कहीं उसे दलित विरोधी नहीं समझ लिया जाए। इसलिए ब्राह्मण रीता का खुलकर बचाव नहीं किया गया। 
रीता की गिरफ्तारी के मुद्दे पर प्रदेश कांग्रेस ने गुरुवार सुबह जो आक्रामकता दिखाई वह शाम होते-होते जब दिल्ली में आलाकमान के रीता के बयान पर खेद जताने के साथ धीमी पड़ी तो पार्टी समर्थक भले चौंके हों लेकिन राजनीतिक पर्यवेक्षकों की मानें तो यह सब सोची समझी रणनीति का हिस्सा था क्योंकि पार्टी दलित विरोधी की छवि से पूरी तरह बाहर आना चाहती है। 
खुद रीता ने भी अपनी टिप्पणी पर माफी मांगी लेकिन मुख्यमंत्री उन्हें माफ करने के मूड में बिल्कुल नहीं हैं और उन्होंने साफ कर दिया है कि अदालत से भले उन्हें जमानत मिल जाए लेकिन उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई जारी रहेगी। रीता को अब 29 जुलाई तक के लिए जमानत मिल गई है लेकिन उनके सामने राजा भैया और वरूण गांधी जैसे शख्सों का उदाहरण मौजूद है जोकि माया सरकार के कार्यकाल में कानूनी पचड़ों में बहुत बुरे फंसे।
प्रदेश की राजनीति में इसे बड़ा बदलाव ही कहा जाएगा कि यहां की वर्तमान राजनीति कांग्रेस और बसपा के बीच केन्द्रित हो गई है जबकि कुछ समय पूर्व तक राज्य में सत्ता में रही दो बड़ी पार्टियां समाजवादी पार्टी और भाजपा इस पूरे घटनाक्रम को दूर से बैठे देखकर मुस्कुरा रही हैं। लग रहा है जैसे इनकी कोई भूमिका ही नहीं बची। सवाल कांग्रेस कर रही है तो जवाब बसपा दे रही है। सवाल बसपा कर रही है तो जवाब कांग्रेस दे रही है। सपा और भाजपा इसे इन दोनों दलों की नूराकुश्ती भले ही करार दे रही हों लेकिन यही नूराकुश्ती बसपा और कांग्रेस को ही प्रदेश की राजनीति का केंद्र बिंदु बना रही हैं।
 
प्रदेश में एक बात और देखने को मिल रही है कि यहां पुरुष राजनीति का वर्चस्व तोड़ते हुए सारी लड़ाई महिलाओं के बीच केंद्रित हो रही है। रीता (महिला) ने मायावती (महिला) पर निशाना साधा तो मायावती (महिला) ने सोनिया गांधी (महिला) पर निशाना साधा। कुछ समय पूर्व मेनका गांधी (महिला) भी अपने पुत्र वरुण गांधी के खिलाफ मामलों को लेकर मायावती (महिला) पर निशाना साध चुकी हैं तो लोकसभा चुनावों के दौरान प्रियंका गांधी (महिला) के निशाने पर भी मायावती सरकार ही रही। राहुल गांधी इस समय एकमात्र पुरुष नजर आ रहे हैं जो ज्यादा प्रभावी तरीके से मायावती सरकार को चुनौती दे रहे हैं।
 
मायावती ने रीता के खिलाफ जो कदम उठाये वह कानूनी रूप से कितने सही हैं या गलत इसके बारे में तो कानूनविद् ही बता सकते हैं लेकिन उन्होंने रीता के जिस बयान के लिए उन पर कार्रवाई की है उससे ज्यादा गंभीर और अमर्यादित बयान तो उन्होंने खुद विपक्ष में रहने के दौरान तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव के परिवार की बेटियों के खिलाफ दिया था। राजनीति में आरोप लगाने वालों को आरोप सहने की कला भी आनी चाहिए। 
 
राजनीति में संयम और सहनशक्ति अनिवार्य है जिसका वर्तमान में अभाव दिख रहा है। इसके अलावा मुख्यमंत्री ने रीता के मामले में सोनिया गांधी पर निशाना इसलिए भी साधा क्योंकि वह खुद को उनसे कमतर नहीं आंकती हैं। जब सोनिया गांधी ने खेद जताया तभी उन्होंने कहा कि अब संसद में हंगामा नहीं किया जाएगा लेकिन रीता के खिलाफ कानूनी कार्रवाई जारी रहेगी। दूसरी ओर जब राहुल गांधी ने उन पर विकास कार्य की बजाए मूर्तियां लगवाने में ज्यादा मशगूल होने और विकास का पैसा मूर्तियों पर बर्बाद करने का आरोप लगाया तो उन्होंने एक तरह से अपनी तुलना महात्मा गांधी से करते हुए कहा कि राजघाट और कांग्रेस नेताओं की समाधियों पर इन मूर्तियों से ज्यादा खर्चा हुआ है।
 
रीता का बयान भी सही नहीं कहा जा सकता वैसे भी इस पर सहज ही विश्वास नहीं हुआ क्योंकि यह पढ़ी-लिखी और पूरब का आक्सफोर्ड कहे जाने वाले इलाहाबाद विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग में प्रवक्ता रहीं रीता के मुख से निकला हुआ बयान था जोकि अपने शालीन व्यवहार के लिए जानी जाती हैं। लेकिन यह भी सच है कि यह प्रोफेसर अब राजनेता बन चुकी हैं। समाजवादी पार्टी से अपना राजनीतिक सफर शुरू करने वाली रीता 1996 में इलाहाबाद की महापौर चुनी गई थीं। उस समय वह निर्दलीय प्रत्याशी थीं और उन्हें सपा ने समर्थन दिया था। 1998 में उन्होंने सुलतानपुर से सपा के टिकट पर लोकसभा चुनाव लड़ा लेकिन हार गईं। 
 
इसके बाद हेमवती नंदन बहुगुणा की पुत्री रीता कांग्रेस में शामिल हो गईं जिसने उन्हें 2004 में इलाहाबाद से लोकसभा का चुनाव लड़ाया लेकिन वह हार गईं। यही नहीं 2007 में पार्टी ने उन्हें विधानसभा चुनाव भी लड़ाया लेकिन वह सफल नहीं हो सकीं। हाल में संपन्न लोकसभा चुनावों में उन्हें लखनऊ संसदीय क्षेत्र से हार मिली। यहां उनकी सफलता इस बात की रही कि देर से प्रत्याशी घोषित होने और कई हैवीवेट प्रत्याशियों के मैदान में मौजूद होने के बावजूद वह दूसरे नंबर पर रहीं। 
 
रीता को राहुल गांधी के करीबी नेताओं में भी शुमार किया जाता है इसलिए जब उन्हें प्रदेश अध्यक्ष पद की कमान मिली तो किसी को ज्यादा आश्चर्य नहीं हुआ। रीता के अध्यक्षीय कार्यकाल के दौरान ही कांग्रेस प्रदेश में उठ खड़ी हुई और उसने लोकसभा चुनावों में ऐसी सफलता प्राप्त की जिससे सभी दलों के होश उड़ गये। रीता को शायद यह लग रहा है कि कांग्रेस का प्रदेश में फिर उठ खड़ा होना उनके नेतृत्व का कमाल है लेकिन इसके पीछे असल मेहनत राहुल गांधी की है जिन्होंने सक्रिय राजनीति में कदम रखने के बाद से ही प्रदेश की राजनीति पर अपना विशेष ध्यान केंद्रित किया है। 2004 में उन्होंने 2009 के लोकसभा चुनावों की रणनीति बनाई और अब उन्होंने तीन साल बाद होने वाले विधानसभा चुनावों के लिए पार्टी की तैयारियों पर अपना ध्यान लगा रखा है।
 
रीता के अमर्यादित बयान प्रकरण में उनके घर पर जो आगजनी की गई उसके बारे में इस आरोप कि यह सब सरकार के इशारे पर हुआ, को इस बात से बल मिलता है कि यह सब एक तो लखनऊ के पॉश इलाके में हुआ जोकि विधानसभा भवन से कुछ दूरी पर स्थित है। साथ ही टीवी चैनलों पर पर जो फुटेज दिखाई गई उनके अनुसार जब उपद्रवी हंगामा कर रहे थे तब वहां पुलिसकर्मी उपस्थित थे लेकिन उन्होंने बचाव का कोई प्रयास नहीं किया साथ ही उप द्रवी अपना काम कर आसानी से चले गये और उनकी गिरतारी का भी प्रयास नहीं किया गया। 
 
जब इस मामले में रिपोर्ट लिखाई गई और इस मामले ने तूल पकड़ा तो ही कुछ लोगों की गिरतारी हुई। अब सरकार ने इस मामले की जांच का जिम्मा सीबीसीआईडी को सौंपा है और कहा है कि इस मामले में यदि सत्ताापक्ष के किसी महत्वपूर्ण व्यक्ति, विधायक अथवा सांसद का हाथ पाया गया तो उसके खिलाफ भी कार्रवाई की जाएगी। लेकिन कांग्रेस को शायद इस जांच पर आपत्ति हो क्योंकि वह कह सकती है कि उसे राज्य सरकार के अधीन सीबीसीआईडी की जांच पर भरोसा नहीं है।
 
बसपा बनाम कांग्रेस की यह जंग कहां तक जाएगी यह तो आने वाला समय खासकर प्रदेश में होने वाले विधानसभा और लोकसभा उपचुनाव के परिणाम ही बताएंगे लेकिन इस पूरे प्रकरण ने इन दोनों दलों के लिए संजीवनी का काम किया है खासकर कांग्रेस के लिए तो यह काफी महत्पवूर्ण रहा क्योंकि प्रदेश में संभवत: एकाध दशकों बाद कोई ऐसी स्थिति बनी है जबकि पूरी कांग्रेस एकजुट हो गई हो। अब कांग्रेस प्रदेश भर में आक्रामक हो गई है और बसपा भी कांग्रेस के आरोपों का जवाब देने के लिए पूरी तैयारी के साथ खड़ी है। 
 
रीता ने जेल से बाहर आने के बाद साफ कर दिया है कि वह मायावती की हर चुनौती का सामना करने को तैयार हैं तो मायावती सरकार ने भी साफ कर दिया है कि रीता के खिलाफ विधिक कार्रवाई जारी रहेगी। जाहिर है प्रदेश में इन दो महिलाओं की लड़ाई राजनीति का नया मोड़ प्रदान कर सकती है। लेकिन इन दोनों दलों को चाहिए कि यह लड़ाई लोकतांत्रिक तरीके से लड़ी जाए। अमर्यादित बयानों को जनता पसंद नहीं करती यह सबक लोकसभा चुनावों के परिणाम सभी को दे चुके हैं।
(शब्दार्थ)
 
 
 
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