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महिलाओं की आंखों में पलते ख्वाब

 मंजू मल्लिक मनु

यूं तो महिलाएं जुटीं थीं ‘लोकगीतों में नारी’ पर विचार-विमर्श के लिए लेकिन कई मौके एेसे आए जब जनगीतों से सभागार गूंज और गांव-ग्राम से आई महिलाओं के साथ-साथ उत्तराखंड आंदोलन से जुड़ी महिलाओं के साथ-साथ सभागार में मौजूद महिला-पुरुष लेखक, क वि और कलाकार ङाूमे। ‘अपनी दुनिया बसाने का वादा करें’ और ‘मनमानी करेंगे आज’ जसे गीतों के माध्यम से महिलाओं ने अपने बुलंद इरादों को भी जहिर किया। इन जनगीतों में महिलाओं की पीड़ा भी थी और उम्मीद व यक़ीन के रंग भी। एेसे मौक़े बहुत कम ही आते हैं जब पूरा सभागार मंच में बदल जता हो। पर देहरादून में ‘महिला सामख्या’ व ‘महादेवी सृजनपीठ’ के इस संयुक्त कार्यक्रम में मंच और दर्शक दीर्घा का फ़र्क कई बार मिटा। तीन दिनों के इस कार्यक्रम में लोकगीतों में जिं़दगी के कई-कई रंग दिखाई दिए और उनमें दिखीं ऊज्र से भरी महिलाएं।
उद्घाटन की औपचारिकता के बीच महिला समाख्या कार्यकर्ताओं का गीत ‘ सजेगी मांग धरती की’ गूंजता रहा। पहले दिन का पहला सत्र महादेी वर्मा की सृजन यात्रा पर कें्िरत था। आलोचक श्निाथ त्रिपाठी ने महादेवी व्याख्यानमाला के तहत अपना वक्तव्य दिया। सत्र की अध्यक्षता मैनेजर पाण्डे ने की। महादेी वर्मा के जीन  रचनाकर्म और सृजन पीठ की गतिधियों पर केन््िरत पुस्तिका ‘मीरा कुटीर से महादेी र्मा सृजन पीठ तक ‘ का मिोचन विश्वनाथ त्रिपाठी ने किया। 
बटरोही ने सगत भाषण में सृजन पीठ की स्थापना  गतिधियों पर संक्षिप्त जानकारी दी और कहा कि यह सुखद संयोग है कि पिछले कुछ सालों से जब महादेी का नया मूल्यांकन हो रहा है, महिला समाख्या के साथ ‘स्त्री अस्मिता‘ ‘पर सृजन पीठ चर्चा आगे बढ़ा रहा है। महादेी ने स्त्री सधीनता का जो सपना देखा था, इस तरह की पहल से उस लक्ष्य को प्राप्त किया जा सकता है।
त्रिपाठी ने व्याख्यान शुरू करते हुये आयोजन में महिलाओं की बड़ी उपस्थिति को प्रशंसनीय बताया और कहा कि यह आयोजन के सार्थक होने की ओर इशारा करता है।
त्रिपाठी ने कहा - महादेी के साहित्य में नारी और दलित की यातना उभरी है और इससे मुक्ति की छटपटाहट दिखाई देती है। उन्होंने कहा कि महादेी की कतिायें आदिासियों के गीत हैं जो जन समुदाय द्वारा गाये जाते हैं। छायाद की कयित्री होते हुये भी ‘स्त्री मुक्ति ‘और देश की सधीनता की चिन्ता करना उनकी सेंदनशीलता को दर्शाता है। बाद में महादेी के रेखाचित्रों में आपातकाल का रिोध भी दिखाई देता है और उनकी छ िएक आंदोलनकारी के रूप में भी सामने आती है। स्त्री की यातना से मुक्ति के लिये महादेी ने स्त्री शिक्षा के महत् को समङा और स्यं महिला द्यिापीठ की स्थापना की। महादेी को उन्होंने प्रथम ‘ स्त्रीादी कयित्री ’ बताया। 
  अध्यक्षीय भाषण में प्रो मैनेजर पाण्डे ने कहा - महादेी का सम्पूर्ण लेखन हमें जीन के बारे में सजग और मानीय सेंदनाओं के साथ ेिकशील  चिार सम्मत बनाता है। उन्होंने कहा कि महादेी का सधीनता आंदोलन से सीधा सम्बन्ध था। ह महात्मा गांधी के सम्पर्क में र्धा में आई थी और इसके भी प्रमाण हैं कि आजादी के समर्थन में द्यिापीठ की गाड़ी से शहर में पर्चे भी बंटाती थी। आजादी के बाद भी उनका यह आंदोलनकारी चरित्र बना रहा। आपातकाल के दौरान जब देश के कई बड़े साहित्यकार इंदिरागांधी से साहित्य पर चर्चा करते थे, महादेी को इलाहाबाद में गिरफ्तार किये जाने की अफाह उड़ गई थी। बाद में केन््रीय हिन्दी संस्थान द्वारा निर्मित  दे प्रसाद मिश्र द्वारा निर्देशित महादेी पर बने ृत्तचित्र का प्रदर्शन किया गया और फिर ‘ सम्भ नाट्य मंच ‘ देहरादून ने महादेी की कहानी ‘ लछमा ’ के नाट्य रूपान्तर का मंचन भी किया। 
दूसरे दिन ‘ परम्परागत लोकगीत गायन एं परिचर्चा ’ षिय पर
बटरोही ने लोक  समाज के सम्बन्ध को रेखांकित किया और कहा कि परम्परागत समाज में लोक  समाज पृथक नहीं था। लोक सामाजिक पहलू था। इस लोक की अभिव्यक्ति लोक साहित्य में होती है। ‘ लोक गीतों में स्त्री ’ षिय पर उन्होंने कहा कि लोक साहित्य हमारी जड़ें हैं लेकिन आधुनिकता की दौड़ में यह पीछे छूट रहा है। लोक साहित्य का क्षेत्र व्यापक है इसलिये एक हिस्से को लिया गया है। क्योंकि लोकगीत अन्य रूपों की अपेक्षा निजि व अंतरंग हैं इसलिए षिय के रूप में ‘ लोकगीतों में स्त्री ’ का चयन किया गया।  बटरोही ने कहा कि लोकगीत स्त्रियों के गीत हैं, जिन गीतों में स्त्री नहीं है े भी किसी न किसी रूप में उनकी भानाओं से जुड़े हुये हैं।  लोकगीतों को साहित्य की मुख्यधारा में लाये जाने पर जोर देते हुये उन्होंने कहा कि लोकदृष्टि से कुछ भी नहीं बचता, प्रेम से लेकर सामाजिक कुरीतियों तक। संचालक डा0 उमा भट्ट ने इस सत्र में लोकगीत गायन हेतु लोकगायकों को आमंत्रित किया। र्सप्रथम श्रीमती कबूतरी देी का गायन हुआ। उन्होने ‘ तु रैण ’ गीत के कुछ अंश गाये। उन्होंने बताया कि सम्पूर्ण गीत २0-२२ घन्टे में पूरा गया जा सकता है।  तु रैण एक ऐसी बहन की व्यथा है जिसका भाई षरें बाद उसे मिलने उसके ससुराल आता है। भिटोली गीत में बेटी की मायके से बुला आने की अभिलाषा और जल्दी हां पहुंचने की छटपटाहट प्रदर्शित होती है। दूूसरा लोक गायन नयननाथ राल का हुआ। उन्होंने तीन गीत गाये-राल के पहले गीत में पतरौल (न भिाग का कर्मचारी) से दरांती ापस देने का अनुरोध, दूसरे गीत में एक बूढ़े से युती के बेमेल ािह की व्यथा और तीसरे गीत (न्योली) में मायके की खुद (याद) प्रकट हुयी। डा0 दिा भट्ट ने भी दो गीत गाये-  पहले गीत में एक बेटी की पिता से एक खास बीहड़ इलाके में न व्याहने का अनुरोध और दूसरे में पिछड़़े इलाके में व्याही गई बेटी की शिकायत है। दोनो गीतों में स्त्री के स्थिापन और पिरीत समाज  ातारण से तालमेल में कठिनाई का दर्द ङालकता है। हीरासिंह राणा के गाए गीत में पढ़ी-लिखी बेटी की दूर पहाड़ में व्याहने पर शिकायत, दूसरे में अलग-अलग काम के लिये काली  गोरी पत्नी का परिचय और तीसरे (ङाोड़ा) गीत में क्षेत्र की साल भर की चर्चित घटना (प्रेम प्रसंग) का ‘ृतान्त है
   इस सत्र में चर्चा शुरू करते हुये डा0 चन््रकला रात ने कहा कि तमाम लोकगीतों में स्त्री के एकाकी जीन  जीन संधर्ष की दास्तां बसी हुई है। समाज में आज भी लड़की पैदा होना जुआ हारने जैसा है। छोटी उम्र में लड़की की इच्छा जानें बिना शादी कर देना आज भी जारी है। कमल जोशी ने कहा कि लोकगीत सेंदनाओं से जुड़े हुये हैं। आज भी ये गाीत महिलाओं की आंखों में आंसू ले आते हैं। इससे साबित होता है कि स्थिति ज्यादा बदली नहीं है। जगतसिंह बिष्ट ने कहा कि नारी सृजक होते हुये भी अहेलना की पात्र बनी रही, इसके पीछे के कारणों को जानना जरूरी है। प्रो0 आर.सी. नौटियाल ने लोकगीतों को समाज के उपेक्षित र्ग का आइना बताया। महीपाल सिंह नेगी ने समाजशास्त्रियों द्वारा लाकगीतों का श्लिेषण और साहित्यकारों   समालोचकों द्वारा स्त्री मिर्ष में लोकगीतों को भी शामिल किये जाने की आश्यकता बताई। द्यिासिंह ने पहाड़ की महिलाओं के दु:खों का मुख्य कारण पलायन को बताया, जो गीतों में भी दिखाई देता है। प्रीति सागर ने कहा कि यह समाज ने गढ़ा है कि औरत ही औरत की दुश्मन होती है जबकि लोकगीतों में ननद-भाभी और सास-बहू के बीच स्नेह भी ङालकता है। शालिनी ने कहा कि ेदना में जीने ाली स्त्री गां में पहुंचने ाले सपेरे, चूड़ी ाले आदि के बहाने आपस में हंसी-मजाक  खुशी के क्षणों को ढूंढ़ लेती है। उर्मि काला ने कहा कि समाज में पत्नी के लिये पति परमेश्र होता है जो ािह होते ही मानीयता खो देता है। दीपा का कहना था कि साहित्यकार स्त्री की कमजोरी को तो खूब दिखाते हैं किन्तु उसकी बहादुरी को नजर अन्दाज करते हैं।          
अध्यक्षीय भाषण में राजेन््र धस्माना ने कहा- साहित्य की असली जड़ें लोक में हैं और लोक स्त्री की उपस्थिति के बिना सम्पूर्ण नहीं है। उन्होंने कहा कि साहित्य में स्त्री ढूंढनें ालों को भी लोक साहित्य में स्त्री को पहले देखना चाहिये। सत्र में गाये गये अधिकांश लोकगीतों को स्त्री ेदना, पीड़ा, रिह  सामाजिक तियों को उजागर करने ाला उन्होंने बताया।        
दूसरे सत्र में की शुरुआत नरेन््रसिंह नेगी को लोकगायन से हुआ। नेगी ने अधिकांश गीत बाजूबन्द शैली के गाये, जिनमें घसियारी का सन्देश भिजाना, बेटा न होकर बेटी होने की शिकायत, अत्यन्त गरीबी और प्रिय से बिछोह का दर्द दिखाई दिया।                     सत्र की चर्चा में भाग लेते हुये प्रो. देसिंह पोखरिया ने कहा- उत्तराखण्ड के लोकगीतों की धुने ैदिक चाओं की धुनों से साम्य रखती हैं।  उन्होंने कहा कि यहां पद्य  गद्य-पद्य(चम्पू) में भी गाथायें गायी जाती हैं, ऐसी गाथायें करीब १५0 हैं।           शेरसिंह पांगती ने कहा कि स्त्री आभूषणों से श्रंगार करती है लेकिन धिा होने पर उसके जेर निकाल दिये जाते हैं, एहसास दिलाया जाता है कि ह धिा हो गई है। क्या यह सही है ? उसकी भानायें कोई नहीं समङाता। योगम्बर बर्तल तुंगनाथी ने अनेक लोकगीतों में  ’ तिलोधार बोल ’ गाये जाने के बारे में बताया कि तिलो नाम की महिला ने उसके अपहरणकर्ता को एक धार (ऊंची चोटी) से धकेल कर स्यं को मुक्त कराया था। लोकगीतों में उस ीरता का गुणगान ’ तिलोधार बोल ’ के रूप में किया जाता है। शैलेश ने लोकगीतों में सामुहिक श्रम के गीतों की कमी की ओर इशारा किया और कहा कि समाज बदलने के लिये ऐसे गीतों की ज्यादा जरूरत होती है। सतीश जायसाल ने कहा कि भिन्न समाजों में लोकगायन की षियस्तु समान ही है और स्त्री का समाज के समक्ष प्रतिरोध का तत् भी सभी जगह रहा है।
महाीर रांल्टा, जहूर आलम, राजकमल जुयाल  महीपालसिंह नेगी सहित महिला समाख्या कार्यकर्ताओं ने भी सत्र की चर्चा में भागीदारी की। चर्चा में स्त्री ेदना के साथ ही उसके जीन में उल्लास के क्षण  ीरता का पक्ष भी उठा।           अध्यक्षीय भाषण में मै˜ोयी पुष्पा ने कहा कि स्त्रियों का जीन कब कैसा रहा है, यह उसके गीत बयां करते हैं।  उन्होंने कहा कि लोकगीतों की परम्परा मौखिक रही है, क्योंकि सदियों से स्त्री पढ़ना-लिखना नहीं जानती थी। लोकगीतों में उसके कष्ट, दु:ख्:ा और शिकायतें दर्ज हैं। एक तरह से ये गीत स्त्री का शिकायतनामा हैं। लेकिन सोचने की बात यह है कि समाज के प्रबुद्घ लोगों ने उसकी शिकायतों पर ध्यान क्यों नहीं दिया ? उन शिकायतों को दूर करने के लिये क्या किया गया ?  उन्होंने कहा कि लोकगीत नहीं होते तो उनका साहित्य भी नहीं होता। स्त्रियों के ेदनामय जीन के अंत को बदल देने का आह्वान करते हुये उन्होंने अध्यक्षीय भाषण का समापन किया।
अंतिम दिन के पहले सत्र में ‘ उत्तराखण्ड के लोक गीतों में व्यक्त समाज’ पर चर्चा हुई। सत्र में टिहरी की समाख्या संघ महिलाओं सौंरा देी  लक्ष्मी देी का लोकगायन ािह के मांगल गीत के रूप में हुआ। चम्पात की छणी देी  सात्रिी देी ने भी लोकगीत गाया। गीता गैरोला ने षिय प्रेश के साथ कहा कि महिलाओं को मुख्य धारा से जोड़ने की चुनौती के साथ महिला समाख्या काम कर रहा है। महिलाओं के गीतों को भी इसलिये देखा जा रहा है कि उनके मनोभा, शोषण, परम्पराओं के प्रतिबन्ध, कुरीतियों और सम्पूर्ण रूप में समाज में स्थिति को ठीक से देखा  समङा जा सके और फिर मुक्ति का रास्ता भी निकाला जा सके। साहित्य को लोक से जोड़ने की आश्सकता पर उन्होंने जोर दिया। यह भी कहा कि महिलाओं के साथ बैठकर उनके मुद्दों पर निरन्तर बात-चीत की जानी चाहिये। अब भी अनेक ऐसे मुद्दे हैं जिन पर महिलाओं के साथ खुलकर बात-चीत की जरूरत है। 
इस सत्र में चर्चा आगे बढत्राते हुये प्रो0 मैनेजर पाण्डे ने कहा कि आयोजन का षिय लोक गीतों में स्त्री से बेहतर  लोकगीत और स्त्री  होगा। ९0: से अधिक लोकगीतों की रचनाकार महिलाओं को बताते हुये उन्होंने कहा कि समाज और संस्ति के निर्माण में स्त्रियों की भूमिका को ठीक से समङाने की आश्यकता है। स्त्रियों के मन में भी यह भा होना चाहिये कि इस सृष्टि को बनाने में उनका अधिक योगदान है। यह भी समङाने की जरूरत है कि सम्पूर्ण श् िमें मातृभाषा र्सत्र होती है, जबकि पितृभाषा कहीं नहीं होती। और यह भी कि धन, बुद्वि  ताकत तीनों की सरेच्च शक्ति लक्ष्मी, सरस्ती  दुर्गा (देयिां) हैं, देता नहीं।
लोकगीतों में किास  पर्तिन का अध्ययन और नीनता की खोज पर जोर देते हुये प्रो0 पाण्डे ने कहा कि १00 र्ष परू स्त्री गीतों में चुनौती के स्र दुलर्भ थे लेकिन अब ह चुनौती देने लगी है। आयोजन में समाख्या कार्यकर्ताओं द्वारा गाये गीत- मनमानी करेंगे हम, आज खुद से ादा किया है़.़.़.़.़.़.़.़.़.़.़.़.़.,की ओर उन्होंने इशारा किया। पंकज बिष्ट ने चर्चा में भाग लेते हुये कहा कि शिष्ट साहित्य में स्त्री ‘टारगेट ‘होती है, ह षिय नहीं होती, जबकि लोक साहित्य में ह पूरी तरह शामिल है। स्त्री व्यथा के लिये पूरी व्यस्था को जिम्मेदार बताते हुये कहा कि पुरूष समाज ने उसे कभी इज्‍जत नहीं दी। पूंजीाद को सामुहिकता नष्ट कर व्यक्तिगत को बढ़ा देने ाला बताते हुये कहा कि इससे लोकगीतों की रचना पर भी दुश्प्रभा पड़ता है। पूंजीाद में स्त्री शोषण के तरीके बदल जाने की बात भी उन्होंने कही।
सुभाष पंत ने कहा कि मशीनीकरण के कारण लोकजीन समाप्त हो रहा है और लोकगीत लुप्त हो रहे हैं। लोकगीतों का संकलन अनुाद सहित किये जाने पर उन्होंने जोर दिया। अतुल शर्मा ने लोकगीतों को साहित्य की जीन रेखा बताया और कहा कि लोकगीत आगे भी रचे जाते रहेंगे। आंदोलनों के गीत भी लोकगीतों की Ÿोणी में चले जायेंगे।
चन््रा सदायत ने कहा कि लोकसाहित्य के संरक्षण में दलितों के योगदान का भी मूल्यांकन होना चाहिये। लोकगीतों को बचाने की चुनौती की ओर इशारा करते हुये तमाम लोकगीतों को रिकार्ड करने की जरूरत भी उन्होंने बताई। नई पीढ़ी को लोकगीतों से जोड़ना भी आश्यक बताया।
लीलाधर जगूड़ी ने कहा कि स्त्री हम सबकी ही नहीं लोकगीतों की भी जनक है। यह उसकी सृजन क्षमता को भी प्रदर्शित करते हैं। उन्होंने आगाह किया कि लोकतत् यदि मर गया तो पूरा साहित्य भी मर जायेगा।
 सत्र के अध्याक्षीय भाषण में किास नारायण राय ने कहा -  पीड़ा भरे स्त्री के लोकगीतों का अन्त अब बदलना चाहिये। उन्होंने कहा कि समाज में बहुत सी चीजों  मान्यताओं को भी बदलना होगा, तब ही स्त्री सधीनता का लक्ष्य प्राप्त कर सकते हैं। उन्होंने यह भी सुङाया के लोकगीतों में जो व्यर्थ है उसे न ढोया जाय इससे आगे का रास्ता आसान होगा।
          साहित्य में स्त्री को पहले देखने की जरूरत पर बल देते हुये श्री राय ने कहा कि स्त्री के बिना लोकगीत सम्भ ही नहीं हैं। स्त्री सधीनता के लिये बेटियों को मुखरता के साथ बोलना सिखाने की जरूरत और मातृपक्ष को यह जिम्मेदारी उठाने पर उन्होंने जोर दिया। स्त्री मुद्दों पर स्यं के अनुभ से बात-चीत और परिेश का मूल्यांकन आश्यक बताया। 
 अंतिम सज्ञ में डा0 चन््रकला भण्डारी ने तीन दिसीय आयोजन के भिन्न सत्रों में हुयी चर्चा का सार प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि चर्चा के दौरान जो बातें निकलकर आई हैं उन पर बहस सृजन पीठ, समाख्या  अन्य मंचों पर भी आगे बढ़े, ऐसा प्रयास होगा। अध्यक्षीय भाषण में सुधा अरोड़ा ने कहा कि  शोषित को शोषण का परिचय करा दो तो शोषित ्िरोह करना स्यं सीख जायेगा। स्त्री को भी शोषित समाज बताते हुये उन्होंने कहा कि सदियों तक औरतों की जगह रसोई में थी जबकि पुरूषों के लिये चौपाल रही। अब कुछ बदला तो आ रहा है लेकिन स्त्री अस्मिता के लिये अब भी काफी काम बाकी है। तीन दिसीय आयोजन में हुयी चर्चा को उन्होंने सार्थक बताया। अंत में समाख्या की राज्य निदेशक गीता गैरोला ने आयोजन में भागीदारी करने ाले सभी प्रबुद्घजन, प्रतिभागियों  सहयोगियों का आभार प्रदर्शित किया। 
       
         
 
 
            
 
 
 
 
        
 
      
 
              
 
 
 
 
 
 
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