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बस्तर में माओवादियों का राज

 विवेक मिश्रा

रायपुर। विपुल खनिज भण्डारों, अक्षय वन संपदा का धनी बस्तर नैसर्गिक संपदा के नाम पर देश के गिने-चुने समृध्द क्षेत्रों में से एक बस्तर की वनस्थली देश के सर्वाधिक जनजातीय वाला क्षेत्र रहा है। इसके बावजूद यह अंचल पिछड़ेपन की त्रासदी में अब तक मुक्त नहीं हो पाया है। बस्तर के विकास में सबसे बड़ी बाधा यहां के जंगलों में फैले माओवादी है जो इस क्षेत्र को विकास की धारा से काटकर अपने कब्जे में रखना चाहते है। आदिवासियों के हितों की बात करने वाले माओवादी असल में आदिवासियों के हितैषी कभी नहीं रहे। 
बस्तर के जंगलों में पिछले 38 सालों से माओवादियों का राज रहा है। यहां उनकी समांतर सरकार चल रही है। माओवादी नही चाहते कि आदिवासी कभी विकास की धारा से जुड़े। एक समय इन्हीं माओवादियों ने आदिवासियों के हितों का मुद्दा उठाते हुए उनकी सहानुभूमि अर्जित की और क्षेत्र में अपनी पैठ बना ली। अब वहीं माओवादी बस्तर में विकास पर रोक लगाए हुए है। केंद्र व राय सरकार द्वारा बस्तर के विकास के लिए अरबों रुपए खर्च किए गए, लेकिन विकास कहीं भी दिखाई नहीं देता। 
सरकार चाहती है कि पूरे बस्तर को सड़क मार्ग से जोड़ा जाए लेकिन माओवादी लगातार सड़कों को उखाड़ने में लगे रहते है। इनके द्वारा सड़क निर्माण में लगी कई गाड़ियों को फूंक दिया व सड़क बनाने आए लोगों की हत्या कर दी। आज के समय में कोई भी ठेकेदार बस्तर में सड़क बनाने का काम नही लेना चाहता। जिन लोगों को ठेका मिला है वे वहां अभी तक गए ही नही है। इसके चलते बस्तर के कई गांवों तक सड़क नहीं बन पाई है। जबकि सड़कों के जरिए सारे सामान का परिवहन होता है। बस्तर के जंगलों में खनिज भंडारों का विपुल भांडर है लेकिन सड़कों के नहीं होने से इन खनिजों को वहां से बाहर नहीं लाया जा सकता। इसी तरह शहर से बनी चीजों को आदिवासियों तक नहीं पहुंचाया जा सकता। 
माओवादियों ने दूसरा निशाना स्कूल भवनों को बनवाया। सरकार द्वारा गरीब आदिवासी छात्रों के लिए बस्तर में नए स्कूल भवनों का निर्माण कर शिक्षकों को नियुक्ति की थी। माओवादियों ने लगातार कई स्कूल भवनों को बम से उड़ा दिया और कुछ को अपनी छिपने की पनाहगाह बना ली। वे लगातार शिक्षकों धमकाते रहते है जिससे कोई भी शिक्षक इन क्षेत्रों में बच्चों को पढ़ाने नही जाना चाहता। जब तक बस्तर के बच्चों को अच्छी शिक्षा नही मिलेगी वह मुख्यधारा से नहीं जुड़ सकते। इसलिए माओवादी आदिवासी बच्चों की शिक्षा को रोककर आदिवासियों की नस्लों को अशिक्षा के अंधेरे कुंए में ढकेलने लगे हुए है। सरकार द्वारा बस्तर में विकास के द्वार खोलते हुए पंचायत भवनों, कृषि की जानकारी व बाहरी दुनिया में हो रही नई खोजो की जानकारी आदिवासी तक पहुंचना चाहते है लेकिन माओवादी इसमें सबसे बड़ा रोड़ा है। 
माओवादियों की सबसे बड़ी दुश्मन आज के समय में पुलिस प्रशासन है। सरकार ने बस्तर क्षेत्र नए थाने खोलकर बड़ी संख्या में पुलिस जवानों को तैनात किया। इसके पीछे आदिवासियों की रक्षा करना और उन्हें अपराध मुक्त जीवन देना था, लेकिन माओवादी पुलिस पर लगातार हमला कर रहे है। पिछले दो सालों में माओवादियों ने 500 से यादा पुलिस कर्मियों की हत्या की है। वहीं कई थानों को बम से उड़ा दिया। 
इस तरह माओवादी बस्तर के विकास को हर तरह से रोकने में लगे हुए है। आए दिन माओवादी बस्तर में बंद का ऐलान करते रहते है जिसका सीधा असर यहां के जनजीवन पर पड़ता है। बस्तर को जीवन देने वाली रेल सेवा इस बंद के चलते रूक जाती है। इस नैसर्गिक संपदा के घनी आबादी वनांचल को विकास की धारा से जोड़ना है तो माओवादियों का सफाया बहुत जरूरी है। 
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