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माओवादियों के बचाव में पीयूसीएल?

 अंबरीश कुमार

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की भूमिका अब सरकार समर्थक की होती ज रही है। बाटला हाउस मुठभेड़ की रपट से यह बात साफ हो गई है। यह टिप्पणी पीपुल्स यूनियन फार सिविल लिबर्टीज के राष्ट्रीय संगठन सचिव और उत्तर प्रदेश पीयूसीएल के अध्यक्ष चितरंजन सिंह ने की। मानवाधिकार को लेकर पिछले तीन दशक से सक्रिय चितरंजन सिंह ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के साथ-साथ उत्तर प्रदेश राज्य मानवाधिकार आयोग की निष्क्रिय भूमिका पर भी सवाल उठाया। उनकी बातचीत के कुछ अंश:
-मानवाधिकार हनन के मामले में उत्तर प्रदेश की क्या स्थिति है?
उत्तर प्रदेश मानवाधिकार हनन के मामले में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की रिपोर्ट के अनुसार एक नंबर पर है। कुल ६५ हजर मामले २00७-0८ में दर्ज हुए। दुर्भाग्यपूर्ण तथ्य ये है कि कोई भी हुकूमत हो चाहे सपा, बसपा या भाजपा की रही हो, मानवाधिकार हनन के मामले किसी भी सरकार में कम नहीं हुए। चाहे राज्य मशीनरी के दमन का मामला हो या पुलिस उत्पीड़न, हिरासत में मौत, फर्जी मुठभेड़ों में हत्या या फिर हमारा अर्धसामंती ढांचा जिसके चलते सामंतवादी ताकतों द्वारा दलितों के उत्पीड़न का मामला हो या सांप्रदायिक उन्माद का मामला हो। ये तमाम मामले इसलिए भी लगातार बढ़ रहे है कि हमारा शासक वर्ग मानवाधिकार के मामले में संवेदनशून्य है। त्रासदी यह है कि जिस पार्टी की भी हुकूमत उत्तर प्रदेश में होती है, उसमें मानवाधिकार उल्लंघन के मामले भारी पैमाने पर होते हैं लेकिन सरकार बिल्कुल संवेदनहीन बनी रहती है और उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं करती। ज्यों ही सरकार सत्ता से बेदखल होती है, तब उसको मानवाधिकार की चिंता सताने लगती है। और बढ़-चढ़कर के मानवाधिकार उल्लंघन के मामले उठाने लगती है। मुङो ऐसा लगता है कि यह इसलिए है कि उनके अंदर मानवाधिकार को लेकर किसी तरह की कोई जनकारी नहीं है और न ही जनकारी प्राप्त करने की कोशिश करते हैं।
-उत्तर प्रदेश के बाद कौन सा राज्य ऐसा है जहां मानवाधिकार उल्लंघन के मामले सबसे अधिक हैं
राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली। दिल्ली में केन्द्र सरकार की नाक के नीचे मानवाधिकार का बुरी तरह उल्लंघन हो रहा है। दिल्ली में राज्य सरकार भी कांग्रेस की है। यहां पर हिरासत में मौत, फर्जी मुठभेड़, महिला उत्पीड़न, दलित उत्पीड़न, बाल श्रमिक उत्पीड़न के मामले प्रमुख हैं।
-राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की एकतरफा रिपोर्ट को लेकर आजमगढ़ के संजरपुर के लोगों ने सवाल उठाया है?
बाटला हाउस मुठभेड़ कांड के बाद से ही यह सवाल उठना शुरू हो गया था कि यह फर्जी मुठभेड़ हैं। उसमें संजरपुर के जो नौजवान शामिल थे, उन लोगों  का भी यह कहना था कि इनका कोई आपराधिक इतिहास नहीं रहा है। ये छात्र के रूप में वहां पढ़ने गए थे। इसको लेकर पीयूसीएल समेत तमाम मानवाधिकार संगठनों ने इसमें सवाल खड़ा किया था और सीबीआई जंच की मांग की थी। राजनैतिक दल पक्ष-विपक्ष में बंट गए। कुछ तटस्थ हो गए। भाजपा का मानना था कि मुठभेड़ सही है। और इस्पेक्टर शर्मा उसमें शहीद हो गए जबकि सपा का मानना था कि फर्जी मुठभेड़ है। मारे गए लड़कों के परिजन दिल्ली हाई कोर्ट गए। हाई कोर्ट ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग से जंच करने के लिए कहा। आयोग के पास कोई भी प्रशिक्षित जंच एजंसी नहीं है। कुछ आईपीएस और पीपीएस पुलिस अफसर आयोग में नियुक्त होते हैं। उन्हीं के जरिए ये अपनी जंच पूरी करते हैं। समङा ज सकता है कि जब खुद पुलिस अधिकारी ही पुलिस अधिकारियों के खिलाफ जंच करेंगे तो किस तरह की रिपोर्ट देंगे? इसीलिए बाटला हाउस पर जब राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने न्यायालय के समक्ष अपनी रिपोर्ट दाखिल की, तो पुलिस को क्लीन चिट दे दिया। इसको लेकर फिर विवाद शुरू हो गया है और सीबीआई जंच की मांग की ज रही है।
-मानवाधिकार आयोग की रपट को लेकर पीयूसीएल किस तरह की रणनीति बना रही है?
इस रिपोर्ट का अध्ययन पीयूसीएल का केन्द्रीय नेतृत्व कर रहा है। इसके बाद हम अपनी रणनीति तय करेंगे। कभी-कभी ऐसा लगता है कि मानवाधिकार आयोग की भूमिका सरकार समर्थक हो गई है। उत्तर प्रदेश राज्य मानवाधिकार आयोग के लिए पीयूसीएल सड़क से लेकर अदालत तक गया। गठन हुआ भी लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण तथ्य है कि उत्तर प्रदेश राज्य मानवाधिकार आयोग बिल्कुल निष्क्रिय बैठा है।
-पीयूसीएल पर एक आरोप हमेशा लगता रहा है कि वह आतंकवादियों के बचाव में आगे आ जता है। उदाहरण के लिए पहले पंजब में, फिर कश्मीर में और पिछले कुछ समय से इस्लामिक आतंकवाद के बचाव में मानवाधिकार ताकतें सामने आई हैं। इसमें कितनी सच्चई है?
यह आरोप बिल्कुल बेबुनियाद है। सैद्धांतिक रूप से पीयूसीएल किसी भी तरह की हिंसा का विरोधी है। चाहे आतंकवादियों द्वारा की गई हिंसा हो या फिर राज्य मशीनरी द्वारा की गई गैरजरूरी हिंसा। पीयूसीएल का मानना है कि कानून का शासन होना चाहिए। किसी को भी अगर आप जघंन्य से जघंन्य अपराध में गिरफ्तार करते हैं तो न्यायालय के सामने उसके ऊपर मुकदमा चलाईए। दोषी पाए जने पर उसको दंडित करिए न कि फर्जी मुठभेड़ में उसकी हत्या कर दीजिए। पीयूसीएल चाहे वह पंजब का आतंकवाद हो या जम्मू-कश्मीर का आतंकवाद, कभी उसका समर्थन नहीं किया। उसका जोर कानून के शासन पर था।
-क्या वजह है कि मुसलिम नौजवानों का एक तबका आतंकवाद के रास्ते पर जता नजर आ रहा है?
देखिए, अतीत को देखें तो बाबरी मसजिद गिराए जने की जब घटना हुई, उसके बाद से पूरा मुसलिम समाज स्तब्ध रह गया था। उसके बाद भारी विछोभ फूटा। इसका फायदा उठाते हुए मुसलिम आतंकवादी संगठनों ने मुसलिम नौजवानों के भीतर इस्लामिक कट्टरवाद को लेकर अभियान चलाना शुरू कर दिया। जिसके परिणाम स्वरूप कुछ नौजवान उनके प्रभाव में आए। हमारे देश की जो सरकार है, अगर उनकी भावनाओं को नहीं समङाती है तो स्वाभाविक रूप से उनके भीतर एक प्रतिक्रिया पैदा होगी और वे अलगाव के रास्ते पर चले जएंगे। लेकिन ऐसे नौजवानों की संख्या मुट्ठी भर है। आम मुसलिम नौजवान कट्टरपन के प्रभाव में नहीं है। यह दिखना चाहिए कि सरकार उनके साथ न्याय कर रही है। दोषियों को दंडित किया ज रहा है। मात्र एकमात्र तरीका है जिससे इस परिघटना को रोका ज सकता है।
-देश के विभिन्न हिस्सों में माओवादी नए समाज के निर्माण के नाम पर आए दिन लोगों की हत्याएं कर रहे हैं। इनमें पुलिस वाले भी है और आम लोग भी। पीयूसीएल इन लोगों की भत्र्सना क्यों नहीं करता?
पहले तो हम यह कहना चाहेंगे कि सरकार ने शांतिपूर्ण संघर्षो की भाषा को सुनने से हठधर्मितापूर्वक इंकार कर दिया। नतीजतन जिन आदिवासियों का जल, जंगल और जमीन छीना ज रहा है, उनका माओवादियों की तरफ ङाुकाव हो गया है। अब माओवादी उनकी तरफ से संघर्ष कर रहे हैं। जहां तक पीयूसीएल का संबंध है, वह किसी भी तरह की हिंसा के खिलाफ है। 
 
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